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दशहरा / विजयादशमी ; जाने महत्व, रोचक तथ्य व अचूक उपाय !

दशहरा / विजयादशमी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है।

दशहरा कैसे मनाते हैं ! ये तो सभी जानते हैं। किंतु दशहरा के सम्बंध में बहुत सी ऐसी बातें है, जिससे आप अनभिज्ञ होंगे।

आइए आज इस पर चर्चा करते हैं। विजय का यह पर्व बताता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, एक दिन पराजित अवश्य होती है।

बुराइयों के दमन के लिए सतत संघर्ष और धैर्य की आवश्यकता होती है।

दशहरा पर्व ऐसी ही प्रेरणादायी स्मृतियों का पर्व है। जहाँ एक ओर श्रीराम की रावण पर विजय, तो दूसरी ओर माँ भगवती द्वारा महिषासुर मर्दन!

दशमी तिथि को घटित अविस्मरणीय घटनाओं को आज भी याद रखते हुए,

परम्पराओं, प्रथाओं को जीवित रखते हुए,आज भी बड़े उत्साह व धूम धाम से दशहरा मनाया जाता है।

दशहरा से जुड़े अत्यंत रोचक तथ्य जानकर आपका मन प्रसन्न हो उठेगा।ऐसे रहस्य जिन्हें सभी को जानना चाहिए।

ऐसे ही कुछ 10 अद्भुत रहस्य जो तिथि की शुभता से अवगत कराता यह लेख अवश्य पसन्द आएगा।

1. दशहरा कब है।
2. दशहरा पूजन मुहूर्त
3. दुर्गा विसर्जन
4. रावण दहन
5. अस्त्र-शस्त्र पूजन
6. शमी वृक्ष पूजन
7. सीमोल्लंघन
8. नीलकंठ दर्शन
9. दशहरे के महत्व
10.दशहरे पर विशेष करने योग्य कार्य

1. दशहरा कब है!

पंचांग(लाल रामस्वरूप) के अनुसार इस वर्ष दिनांक 24 अक्टूबर 2023 को विजयादशमी (दशहरा) मनाया जाएगा।

शास्त्र के अनुसार सूर्योदय व्यापिनी दशमी तिथि श्रवण नक्षत्र युक्त सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।

2.दुर्गा विसर्जन

नवमी तिथि को कन्या पूजन कर, हवन पश्चात जवारे विसर्जन कर वृती वृत का पारायण करते हैं।

तथा दशमी तिथि को देवी विसर्जन किया जाता है। धीरे धीरे विलुप्त हो रही त्यौहारों की श्रंखला में हम भूलते जा रहे हैं कि दशहरा कैसे मनाते हैं !

3. रावण दहन 

विजयादशमी का विशेष आयोजन रावण दहन होता है। जिसमे रावण का पुतला बनाकर एक स्थान पर लगाया जाता है।

श्रीराम, लक्ष्मण,व हनुमान जी की शोभयात्रा निकली जाकर दहन स्थल तक ले जाती है।

तथा श्रीराम जी के द्वारा रावण दहन किया जाता है।

‘ज्योति निबंध’ में ऐसा उल्लेख है कि अश्विन शुक्लपक्ष को दशमी को तारोदय के समय विजय काल होता है ।

जो की समस्त मनोकामना को पूरी करने वाला होता है ।

इसी समय भगवान राम सीता लक्ष्मण हनुमान अधिकृत बड़े सदस्य सज धज के साथ निकाला जाता है।

ऐसा माना जाता है कि इसी समय भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करके रावण पर विजय प्राप्त की थी

अत्यंत रोचक व उत्साह पूर्ण माहौल होता है। मेला भी लगता है। सभी दशहरा देखने आते है। प्रसन्नता देखते ही बनती है।

4. अस्त्र शस्त्र पूजन व वाहन आदि पूजन!

विजयादशमी शक्ति पर्व है, अतः आज के दिन शक्ति पूजा की जाकर उत्तरोत्तर उन्नति की कामना की जाती है।

दशहरा के संबंध में एक प्रचलित कथा है;

एक बार दशहरे के प्रचलन तथा फल के विषय में पार्वती जी द्वारा भगवान शंकर से पूछे जाने पर भगवान शंकर ने बताया कि

हे देवी ; अश्विन शुक्ल पक्ष को सांध्य बेला में तारोंदय के समय विजय कॉल होता है।

जो शत्रु पर विजय प्राप्त करने के इच्छुक राजा के लिए प्रस्थान हेतु महत्वपूर्ण समय होता है।

इस दिन श्रवण नक्षत्र के योग होने पर विशेष शुभ होता है। भगवान रामचंद्र जी ने इसी समय पर लंका पर चढ़ाई की थी । दशहरा /विजयादशमी मेला

5.सीमोल्लंघन

क्षत्रियों के लिए यह परम पवित्र तथा विशिष्ट त्यौहार है। शत्रु पक्ष पर युद्ध की इच्छा ना होने पर भी राज पुत्रों को सीमा उल्लंघन करना चाहिए।

अर्थात संपूर्ण सैन्य समेत सुसज्जित होकर पूर्व दिशा में जाकर शमी वृक्ष का निम्न मंत्र से पूजन करना चाहिए।

6. शमी वृक्ष पूजन

शमी शमयते पापं शमी लोहित कण्टका।धरिभ्यर्जुन बाणानां रामस्य प्रियवादिनी।।

अर्थात हे शमी तू समस्त पापों को नष्ट करने वाला है और शत्रुओं को भी पराजित करने वाला है।

तूने अर्जुन का धनुष बाण धारण किया तथा रामचंद्र जी से प्रिय बानी कहीं ।

पार्वती जी ने प्रश्न किया कि शमी वृक्ष ने कब और किसने मित्र अर्जुन का धनुष धारण किया ?

तथा भगवान रामचंद्र से कब कैसी प्रिय वाणी कही थी ?हे कृपालु इसे भी बताएं;

तब शिवजी ने पार्वती जी को बताया की कौरव पक्षीय दुर्योधन ने पांडवों को जुआ के खेल में परास्त कर.

इस शर्त पर वनवास दिया कि वे 12 वर्षों तक प्रकट रूप से वन में स्वच्छंद विचरण कर सकते हैं।

परंतु 1 वर्ष का अज्ञातवास रहेगा। यदि इस वर्ष में वे पहचाने जाएंगे तो उन्हें 12 वर्ष का दोबारा वनवास दुख भोगना पड़ेगा।

उस अज्ञातवास के समय अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष तथा बाणों को एक शमी वृक्ष पर रखकर.

  बृहन्नाला (स्त्री) के वेश में राजा विराट के यहां रहै थे।विराट पुत्र कुमार ने गांव की रक्षा हेतु वीर अर्जुन को अपने साथ लिया।

तथा उन्होंने शमी वृक्ष से अपने गांडीव उतार कर शत्रु पक्ष पर विजय प्राप्त की।

इस प्रकार शमी वृक्ष ने अर्जुन के हथियार की रक्षा की थी।

भगवान रामचंद्र के लंका चढ़ाई करने के समय भी शमी वृक्ष ने विजय कामना की थी।

इसीलिए विजय काल में शमी वृक्ष के पूजन का विधान है।

श्रीकृष्ण द्वारा शमी का महत्व


एक समय का प्रसंग है कि पांडव श्रेष्ठ युधिष्ठिर के पूछने पर श्री कृष्ण ने बतलाया कि;

हे राजन विजयदशमी के दिन राजा को वस्त्र आभूषण से स्वयं अलंकृत होकर,

अनुचरों तथा हाथी घोड़ों को सजाना चाहिए।

वाद्य मंडली समेत राजपुरोहित को साथ लेकर पूर्व दिशा में प्रस्थान करके सीमा उल्लंघन करना चाहिए।

तथा वहां अष्ट दिग्पालोंं  तथा पार्थ  देवता की  पूजा करना चाहिए।

शत्रु की प्रतिमूर्ति पुतला स्वरूप बनाकर उसके वक्ष स्थल पर बाण चलाकर वैदिक मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए।

ब्राह्मणों की पूजा करके हाथी घोड़े अस्त्र-शस्त्र आदि का निरीक्षण करना चाहिए।

जो राजा यह सब क्रिया सीमांत में करके महल को लौटता है वह शत्रु पर विजय प्राप्त करता है।

7.नीलकण्ठ दर्शन

नीलकण्ठ तुम नीले रहियो,मेरी खबर भगवान से कहियो

 

नीलकंठ दर्शन की परंपरा वर्षो से रही है। इस परंपरा को आज भी लोग निभा रहे हैं ।

ऐसा माना जाता है कि रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम पर ब्राह्मण हत्या का ब्रहम हत्या का पाप लगा था।

ब्रह्म हत्या का अर्थ है एक ऐसे व्यक्ति की हत्या जैसे संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञान होता था,

और उस ज्ञान के आधार पर वह समाज का मार्गदर्शन करता था।

तब ब्राह्मण की हत्या करने का मतलब एक ग्रंथालय को जलाने के बराबर महापाप होता था।

जिससे समाज को दिशा मिलना ही बंद हो जाएगी  ।

ऐसी स्थिति में ब्राह्मण हत्या, ब्रहम हत्या महापाप के समान मानी जाती थी ।

और रावण परमज्ञानी तथा शास्त्रों का ज्ञाता था, जिसका वध श्रीरामजी के द्वारा किया गया था।जो ब्रम्हहत्या के समान था।

जिसके शमन हेतु श्री राम ने अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ भगवान शिव की आराधना की थी।

जनश्रुति !

ऐसी जनश्रुति है कि तब भगवान शिव नीलकंठ का रूप लेकर के धरती पर आए थे,

और श्रीराम के ब्रम्हहत्या के पाप का विमोचन किया था।

इसीलिए आज भी विजयादशमी के दिन नीलकंठ के दर्शन करना भगवान शिव के दर्शन के समान माना जाता है ।

नीलकंठ तुम नीले रहियो, मेरी खबर भगवान से कहियो।

नीलकण्ठ के दर्शन कर अपना संदेश व मनोकामना ईश्वर तक पहुंचाने का बड़ा ही प्यारा तरीका है। (दशहरा कैसे मनाते हैं !)

 8. दशहरा/ विजयादशमी का महत्व!

विजयादशमी का पर्व विशेष रुप से क्षत्रियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है ।

साथ ही आज के दिन की गई पूजा पाठ और विधि विधान का अर्थ अपने शत्रु पर विजय पाना होता है।

अतः शत्रु पर विजय पाने के लिए अपने शस्त्र उपकरण अपनी शक्ति- सामर्थ्य ,वाहन ।

मशीनरी व फैक्ट्री के कलपुर्जे अन्य सभी आवश्यक वस्तुओं का पूजन कर तैयार किया जाता है।

ताकि आवश्यकता पड़ने पर सभी चीजें उपयुक्त एवं सही स्थिति में उपलब्ध हो सके ।

विजयादशमी के दिन क्योंकि महाकाली महासरस्वती और महालक्ष्मी तीनों ही देवियों की पूजा की जाती है ।

अतः आज का दिन अत्यंत ही शुभ एवं मंगलकारी होने से नई चीजों की खरीदी, नए भवनों के निर्माण इत्यादि का मुहूर्त।

और नए कार्यों की शुभारंभ तथा विशेष कार्य के लिए की गई यात्रा शुभ फलदाई होती है।

दशहरे के दिन का पूरे वर्ष भर में अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान है।

9. दशहरा या विजयादशमी के अचूक उपाय !

1.दशहरे के दिन दोपहर को घर के ईशान कोण में चंदन कुमकुम और पुष्प से अष्टदल की आकृति बनाएं ,

और देवी जया और विजया का स्मरण कर उनका पूजन करें। (दशहरा कैसे मनाते हैं !)

2. शमी वृक्ष की पूजा कर वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं एवं वृक्ष के नीचे की मिट्टी लाकर घर में रखना चाहिए।

ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से सभी रुके हुए काम बनते हैं और गरीबी नहीं आती।

3. आज के दिन शमी पत्र एक दूसरे को देने का भी विधान है जो आपसी सद्भाव को दर्शाता है ।

क्योंकि शमी को  सोना के रूप में माना जाता है इसे सोना पत्ती भी कहते हैं।

अतः शमी पत्र घर लाकर भगवान को चढ़ाकर अपने धन रखने के स्थान पर रखना चाहिए। इससे धनवृद्धि होती है।

अंत में

ऐसी ही जनमान्यताओं के साथ बड़े ही धूमधाम से दशहरे की पूजा की जाकर विजय काल, नीलकण्ठ दर्शन।

अस्त्र शस्त्र पूजन, वाहन मशीनरी पूजन, नई वस्तुओं की खरीदी, शमीपत्र का आदान-प्रदान, दशहरा जुलूस।

मेला आदि की परम्परायें जीवन को नई ऊर्जा और उत्साह से सराबोर कर देती हैं।

दशहरे का रंगबिरंगा त्यौहार जनमानस में खुशियों की लहर लाकर ,

कुछ पल के लिए जीवन के कुछ तनावों को दूर करने में अत्यंत सहायक है।

अंत मे आपको विजयादशमी की अनन्त हार्दिक शुभकामनाएं!

जीवन मे बुराइयों का अंत हो। स्वयं के भीतरी व बाहरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें। विजयकाल चिरस्थायी हो।

तथा अनेकानेक सफलताओं को प्राप्त करने का यह पर्व हमेशा जीवन मे अपने महत्व के साथ बना रहे।

दशहरा कैसे मनाते हैं !लेख में प्रस्तुत जानकारी अच्छी लगी हो तो कमेंट अवश्य करें।

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ताकि हमारी आगे आने पीढ़ी तक यह सन्देश अवश्य 

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