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श्रीमद्भागवत कथा द्वितीय स्कन्ध भाग-1 Now read it yourself; Shrimad Bhagwat Mahapuran (A brief description) Second Wing-Part-1

श्रीमद्भागवत कथा द्वितीय स्कन्ध भाग-1 में भगवान के विराट रूप का वर्णन किया गया है।
कहा ये भी जाता है कि जब जन्म जन्मांतर के पुण्य उदित होतें हैं तभी मनुष्य को इस महापुराण की प्राप्ति होती है।
ऐसी पुण्यप्रभावकारी महापुनीत ग्रन्थ का अध्ययन आप स्वयं कर सकते हैं।आपके लिए मेरा छोटा सा प्रयास है।
आप अवश्य लाभान्वित होंगे। अवश्य पढ़ें और जो भी त्रुटियां हुई हो उन्हें क्षमा करें।

इस लेख में आप पाएंगे:

  1. ध्यान की विधि व ॐ की धारणा क्या है।
  2. भगवान का विराट रूप कैसा है।
  3. भगवदरूप की धारणा एवं सद्योमुक्ति व कर्ममुक्ति।
  4. देवोपासना से कामनापूर्ति।
  5. शुकदेवजी द्वारा कथा।
  6. सृष्टि का वर्णन।
  7. दशङ्गुल न्याय।
  8. भगवान के लीलावतार।
  9. दत्तात्रेय अवतार कथा।
  10. बालक ध्रुव की कथा।
  11. विभिन्न अवतार।
  12. गज और ग्राह्य की कथा।

1-ध्यान की विधि व “ॐ”की धारणा! Meditation Method! and The notion of “ॐ”!

  • श्री शुकदेव जी ने कहा- परीक्षित! तुम्हारा यह प्रश्न लोकहित के लिए है।मनुष्यों के लिए, सुनने, स्मरण या
  • कीर्तन करने की जितनी भी बातें हैं, उन सब में यह श्रेष्ठ है।जो अभय पद पाना चाहता है, उसे सर्वात्मा, श्रीकृष्ण
  • की लीलाओं का श्रवण कीर्तन और स्मरण करना चाहिए। मनुष्य जन्म का इतना ही लाभ है,
  • कि जीवन को ऐसा बनाया जाए कि मृत्यु के समय भगवान की स्मृति हो।
  • मृत्यु के समय धैर्य के साथ पवित्र तीर्थ में स्नान कर ‘अ-उ-म’ युक्त प्रणव (ॐ) का, मन ही मन जप करें।
  • योग धारणा से मन को वश में करें। धारणा रजोगुण और तमोगुण के दोषों को मिटा देती है।
  • धारणा स्थिर होते ही ध्यान में योगी भगवान को देखता है। तब उसे तुरंत ही भक्ति की प्राप्ति हो जाती है।
  • इस ब्रह्मांड शरीर में जो विराट पुरुष भगवान है वे ही धारणा के आश्रय हैं। उन्ही की धारणा की जाती है। (श्रीमद्भागवत कथा द्वितीय स्कन्ध भाग-1)

2- भगवान का विराट रूप ! Great form of God!

  • विराट पुरुष के तलवे- पाताल, एड़ियां व पंजे- रसातल हैं एड़ी के ऊपर की गांठे- महातल, पैर के पिडे- तलातल हैं।
  • दोनों घुटने- सुतल हैं,जांघें- वितल व अतल पेड़ू- भूतल है। नाभिरूप सरोवर को आकाश, छाती को स्वर्गलोक,
  • गले को महर्लोक,मुख-जनलोक,ललाट-तपोलोक वउन सहस्त्र सिर वाले भगवान का मस्तक समूह सत्यलोक,
  • देवता-भुजाएं, दिशाएं- कान, शब्द श्रवणेन्द्रिय,दोनों अश्विनी कुमार नासिका, गंध- घ्राणेन्द्रिय आग मुख है।
  • नेत्र-अंतरिक्ष, देखने की शक्ति-सूर्य,दोनों पलकें-रात-दिन, भ्रूविलास-ब्रह्मलोक, तालु और जीभ -रस, वेद-ब्रह्मरंध्र हैं।
  • दाढें- यम, स्नेह-दाँत,जगनमोहिनी माया- मुस्कान, लज्जा ऊपर का ओंठ, लोभ नीचे का ओंठ,धर्म-स्तन,अधर्म-पीठ,
  • प्रजापति- मूत्रेन्द्रिय, मित्रावरुण- अंडकोष, समुद्र- कोख है। बड़े-बड़े पर्वत – हड्डियां, नाडिया- नदियां,वृक्ष-रोम हैं।
  • वायु-स्वास,काल उनकी चाल है। गुणों का चक्का चलाते रहना उनका कर्म है,बादल-केश,संध्या-अनन्त का वस्त्र है।

3-भगवदरूप की धारणा एवं सद्योमुक्ति व कर्ममुक्ति! The notion of God and Sadomukti and Karmukti!

  • श्री शुकदेव जी कहते हैं-भगवान के चरण कमलों से लेकर उनके मुस्कान युक्त मुख कमल पर्यंत ,समस्त अंगों की
  • एक-एक करके बुद्धि के द्वारा धारण करनी चाहिए। जैसे जैसे बुद्धि शुद्ध होगी, वैसे-वैसे चित्त स्थिर होता जाएगा।
  • विश्वेश्वर भगवान दृश्य नहीं दृष्टा है। सगुण निर्गुण इन्हीं का रूप है । जब तक इनमें अनन्य प्रेम,भक्ति-योग ना हो जाए
  • तब तक नित्य नैमित्तिक कर्मों के बाद,एकाग्रता सेभगवान के उपर्युक्त स्थूल रूप का ही चिंतन करना चाहिए।
  • सत्यलोक में पहुंचने पर योगी निर्भय हो अपने सूक्ष्म शरीर को पृथ्वी में व पृथ्वीरूपसे जल को,जलरूप से अग्नि को,
  • ज्योतिरूप से वायु को,वायुरूप से आकाशरूप को प्राप्त करता है। इस प्रकार स्थूल आवरणों को पार करते हुए,
  • उसकी इंद्रियां भी सूक्ष्म अधिष्ठान में लीन हो जाती हैं। तब वह अहंकार में प्रवेश करता है। अहंकार से महत्तत्व में,
  • अंत में प्रकृति रूप में परमात्मा को प्राप्त होता है।उसे संसार में नहीं आना पड़तायही सद्योमुक्ति व कर्ममुक्ति है।

4-देवोपासना से कामनापूर्ति! Wish for Devopasana!

  • भिन्न भिन्न प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति हेतु भिन्न भिन्न देवताओं की उपासना की जाती है।
  • ब्रम्हतेज हेतु बृहस्पति, इंद्रियशक्ति की कामना हेतु इंद्र की, संतान हेतु प्रजापतियों की, लक्ष्मी हेतु माया देवी की।
  • तेज हेतु अग्नि, धन हेतु वसुओं की, वीरता हेतु रुद्रो की, अन्न हेतु अदिति की, स्वर्ग हेतु अदिति पुत्र देवताओं की।
  • राज्य हेतु विश्व देवों की, प्रजा अनुकूल हेतु साध्य देवता, आयु हेतु अश्विनी कुमार, पुष्टि हेतु पृथ्वी।
  • प्रतिष्ठा हेतु पृथ्वी और आकाश, सौंदर्य हेतु गंधर्व की, पत्नी हेतु उर्वशी अप्सरा की, सबका स्वामी बनने हेतु ब्रह्मा की।
  • यश हेतु यज्ञ पुरुष की, खजाने के लिए वरुण की, विद्या हेतु शंकरजी की ,पति पत्नी में प्रेम हेतु पार्वती जी की।
  • धर्म उपार्जन हेतु विष्णु, वंश परंपरा की रक्षा हेतु पितरो, बाधाओं से बचने हेतु यक्षों।बलवान होने के लिए मरुदगणो
  • राज्य हेतु मन्वंतरों के अधिपति देवों, अभीचार हेतु निऋति भोगों के लिए चंद्रमा,व निष्कामता हेतु नारायण को भजे। (श्रीमद्भागवत कथा द्वितीय स्कन्ध भाग-1)

5-शुकदेवजी द्वारा कथा! Story by Shukdevji!

  • परीक्षित ने पूछा- भगवान अपनी माया से संसार की सृष्टि कैसे करते हैं।श्री शुकदेव जी कहते हैं- भगवान ज्ञानियों की
  • आत्मा, भक्तों के स्वामी, कर्मकांडियों के लिए वेदमूर्ति धार्मिकों केलिए धर्ममूर्ति,तपस्वियों के लिए तपस्वरूप है।
  • भगवान ही पंचमहाभूतों से इन शरीरों का निर्माण करके इनमें जीव रूप से शयन करते हैं ।और पांच ज्ञानेंद्रिय ,पांच
  • कर्मेंद्रियां पांच प्राण ,एक मन इन 16 कलाओं से युक्त होकर 16 विषयों का भोग करते हैं ।
  • नारद जी ने पूछा- पिताजी इस संसार का लक्षण क्या है? इसका आधार क्या है? और इसका निर्माण किसने किया है?
  •  तथा इसका प्रलय किस में होता है? यह किसके अधीन है? वास्तव में यह क्या वस्तु है? आप इसका तत्व बताइए!
  • ब्रह्मा जी ने कहा- बेटा नारद! द्रव्य कर्म, काल, स्वभाव व जीव वास्तव में भगवान से भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है।
  • वेद नारायण के परायण हैं। देवता भी नारायण के ही अंगों में कल्पित हुए हैं,यज्ञ भी नारायण की प्रसन्नता के लिए हैं।

6-“सृष्टि का वर्णन! “Description of creation!

  • उनकी इच्छा अनुसार उनकी दृष्टि से प्रेरित होकर मैं सृष्टि रचना करता हूं। जिस समय यह पंचभूत इंद्रिय मन और
  • तत्व इन तीनों गुण परस्पर संगठित नहीं थे,व अपने रहने भोगों के साधनरूप शरीर की रचना नहीं कर सके।
  • यह देखकर भगवान ने इन्हें अपनी शक्तियों से प्रेरित किया ,तब वे परस्पर मिल आपस में ,
  • कार्य कारण भाव स्वीकार कर व्यष्टि समष्टिरूप पिंड व ब्रह्मांड दोनों की रचना की।
  • ब्रह्मा जी कहते हैं- उन्हीं विराट पुरुष के मुख से वाणी और उसके अधिष्ठाता देवता अग्नि उत्पन्न हुई।
  • सातों छंद ( गायत्री, त्रिष्टुप,अनुष्टुप, ऊषनिक, बृहती, पंक्ति और जगती) उनकी साथ धातु से निकले हैं।
  • सभी प्रकार के रस व अन्न व उनके अधिष्ठातादेवता विराट पुरुष की जिव्ह्या से,प्राण,अपान,व्यान,उदान समान,
  • यह पांचो प्राण और वायु ।तथा ज्ञानेंद्रियां से,अश्विनी कुमार,औषधीय साधारण व विशेष गंध उत्पन्न हुए हैं।

7-“दशांगुल न्याय” “Dushangul Justice”

संपूर्ण विश्व जो कुछ कभी था, है या होगा।सबको वह घेरे हुए है।उसमें यह विश्व केवल 10 अंगुल परिमाण में ही है।

ब्रह्मांड के साथ आवरणों का वर्णन करते हुए वेदांत प्रक्रिया में ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी से 10 गुना जल है,

जल से 10 गुना अग्नि, अग्नि से 10 गुना वायु, वायु से 10 गुना आकाश, आकाश से 10 गुना अहंकार ।

और अहंकार से 10 गुना महत्तत्व और महत्तत्व से 10 गुनी मूल प्रकृति है। यह प्रकृति भगवान के केवल 1 पाद में है।

इस प्रकार भगवान की महत्ता प्रकट की गई है। यह दशांगुल न्याय कहलाता है। (श्रीमद्भागवत कथा द्वितीय स्कन्ध भाग-1)

8-भगवान के लीलावतार ! Leelavatar of God!

  • वराह अवतार– प्रलय केजल में डूबी पृथ्वी के उद्धार केलिए दैत्य हिरण्याक्ष के, अपने दांतों से टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे।
  • यज्ञ अवतार– रुचि प्रजापति की पत्नी आकूति के गर्भ से जन्म लेकर दक्षिणा नामक पत्नी से सुयम नामक देवता
  • उत्पन्न कर तीनों लोकों के बड़े-बड़े संकटों को हर लिया, इसी से स्वयंभू मनु ने उन्हें हरि के नाम से पुकारा।
  • कपिल अवतार – कर्दम प्रजापति व देवकी के गर्भ से जन्म लेकर अपनी माता को आत्म तत्व का उपदेश दिया ।
  • सनत ,सनन्दन,सनातन और सनत कुमार रूप मे आत्म- ज्ञान का उपदेश देकर परम तत्व का साक्षात्कार कराया।
  • नर नारायण अवतार में धर्म की पत्नी दक्षकन्या मूर्ति के गर्भ से हुये।कुमार्गगामी वैन का नरक गमन होने पर
  • ऋषियों की प्रार्थना पर पृथुरूप लेकर उसे नर्क से उबारा व पृथ्वी को गाय बना जगत से औषधियों का दोहन किया।
  • राजानाभि की पत्नी सुदेवी से ऋषभदेव के रूप में जन्म ले योगचर्या (परमहँसपद/अवधूतचर्या) का पालन किया।

9-दत्तात्रेय अवतार कथा ! Dattatreya Avatar Story

महर्षि अत्रि भगवान को पुत्र रूप में चाहते थे, जिस हेतु भगवान से प्रार्थना की।तब प्रसन्न हो भगवान ने कहा;

मैंने अपने आपको तुम्हें दे दिया इसी से अवतार लेने उनका नाम दत्त (दत्तात्रेय) पड़ा।

जिनसे राजा यदु और सहस्त्रार्जुन आदि ने योग की भोग और मोक्ष की दोनों ही सिद्धियां प्राप्त की। (श्रीमद्भागवत कथा द्वितीय स्कन्ध भाग-1)

10-“बालक ध्रुव की कथा” “The legend of the boy dhruv”

5 वर्ष के बालक ध्रुव को अपने पिता उत्तानपाद की गोद में बैठा देखकर सौतेली मां सुरुचि ने कड़वे वचन कहे।

जिसे सुन, ग्लानि से ध्रुव तपस्या करने को वन चले गए। तब भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें ध्रुवपद का वरदान दिया।

 

अवश्य पढ़े,

श्रीमद्भगवत कथा (पंचम स्कन्ध)

श्रीमद्भगवत कथा चतुर्थ स्कंध

 

(हयग्रीव,मत्स्य,कच्छप, नरसिंह! )(Hayagreeva, Matsya, Kachhap, Narasimha!)( बुद्ध , व कल्कि अवतार!)(Buddha, and Kalki avatar!)

  • हयग्रीव के रूप में यह विग्रह वेदमय,यज्ञमय सर्वदेवमय है। जिसकी नासिका से श्वास के रूप में वेद वाणी प्रकट हुई।
  • चाक्षुष मन्वंतर के अंत में भावी मनु सत्यव्रत ने मत्स्यरूप में प्रलय के जल मेंं गिरे वेदोंको ले उसी में विहार करते रहे।
  • देवता दानव द्वारा क्षीरसागर को मथने हेतु मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर कच्छप रूप लेकर धारण किया।
  • नरसिंह का रूप लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर देवताओं को भय रहित किया।
  • जब देवताओं के शत्रु दैत्य वेद मार्ग का सहारा ले मयदानव के बनाए,नगरों में रहकर लोगों का विनाश करेंगे,
  • तब बुद्ध के रूप में उपधर्मों का उपदेश करेंगे। कलयुग के अंत में जब संत पुरुषों के घर भगवान कथा में बाधा होंगी।
  • ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, पाखंडी हो जाएंगे, शूद्र राजा होंगे, स्वाहा स्वधा और वषट्कार की ध्वनि देवता पितरों के यज्ञ
  • श्राद्ध की बात तक कहीं भी सुनाई नहीं पड़ेगी। तब कलयुग का शासन करने वाले भगवान कल्किअवतार लेंगे।

11-“गज व ग्राह्य की कथा” “Story of Gaja and Graha”

“एक बार सरोवर में महाबली ग्राह ने गजेंद्र का पैर पकड़ लिया, जिसे गजेंद्र नहीं छुड़ा पाया ।

तब उसने भगवान से प्रार्थना की तथा अपनी सूंड में कमल लेकर उन्हें पुकारा ,तब भगवान आए

और अपने चक्र से ग्राह का मस्तक उखाड़ डाला था।”

(वामन,हंस,धन्वन्तरि,परशुराम!) (Vamana, Hans, Dhanvantari, Parashurama(श्रीराम,बलराम,श्रीकृष्ण,व्यास!)(Shriram, Balarama, Shri Krishna, Vyas!)

  • वामन का रूप लेकर राजा बलि से तीन पग पृथ्वी मांगी।
  • हंस के रूप में अवतार लेकर स्वयं नारद जी को योग ज्ञान व आत्म तत्व बताने वाले भागवत तत्व का उपदेश दिया।
  • धनवंतरी का रूप ले संसार में आयुर्वेद का प्रवर्तन किया।
  • परशुराम अवतार लेकर संसार में ब्राह्मण द्रोही क्षत्रियों का 21 बार फरसे से संहार किया।
  • भरत शत्रुघ्न और लक्ष्मण के साथ श्री राम के रूप में इक्ष्वाकु के वंश में अवतरित हुए।
  • जब झुंड के झुंड दैत्य पृथ्वी को रौंद डालेंगे तब अपने सफेद व काले केश को बलराम ,श्री कृष्ण के रूप में ,
  • वे अपनी महिमा से इतना अद्भुत चरित्र करेंगे कि लोग उनकी लीलाओं को बिल्कुल भी नहीं समझ पाएंगे।
  • लोगों की आयु व समझ कम होने पर सत्यवती के गर्भ से,व्यास रूप में वेद को विभाजित करेेंगे।
जय श्री कृष्णा

श्रीमद्भागवत कथा महात्म्य: जयाकिशोरीजी

https://youtu.be/HHNW0kKqzNM

यह आलेख श्रीमद्भागवत महापुराण से संकलित कर मेरे द्वारा संक्षिप्तीकरण किया गया है।

जो भी त्रुटियां हो क्षमा करें । जय श्री कृष्णा।

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