श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (मध्यम चरित्र) महिषासुरवध कथा अध्याय 2,3,4 (हिंदी अनुवाद) Total Post View :- 4373

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (मध्यम चरित्र) महिषासुर वध कथा।अध्याय 2,3,4 (हिंदी में)

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध) पाठ के करने की विधि यह है कि इसे तीन भागों में पढ़ा जाता है।

पहला प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), दूसरा मध्यम चरित्र (अध्याय 3, 4,5), तीसरा उत्तर चरित्र (अध्याय 6,7,8,9,10,11,12,13) है।

अतः यह पाठ थोड़ा लम्बा जरूर है किंतु इसे विधिपूर्वक पढ़ने से सम्पूर्ण सप्तशती के पाठ का लाभ आप प्राप्त करेंगे।

इसीलिए धैर्यपूर्वक, मन लगाकर माँ महिषासुर मर्दिनी का ध्यान करें, इसका अनन्त पुण्यलाभ है।

इस अध्याय में माता की उत्पत्ति व महिषासुर की सेना के विध्वंश एवं महिषासुर वध व अन्य दैत्यों के संहार का वर्णन है।

इसे पढ़ने व सुनने से जीवन से सारे भय समाप्त हो जाते हैं और सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त होती है।

श्रीदुर्गासप्तशती पाठ महिषासुरवध कथा (अध्याय 2,3,4) मध्यमचरित्र

  • विनियोगः– ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुऋषिर्महालक्ष्मीदेवता, उष्णिक छन्दः, शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्,
  • वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः ।
  • विनियोग-हाथ में जल लेकर ‘ॐ मध्यमचरित्रस्य से आरम्भ कर ‘मध्यमचरित्रजपे विनियोग:’ पर्यन्त विनियोग-वाक्य पढ़कर भूमि पर जल गिरा दे।
  • विनियोगार्थ-इस मध्यम चरित्र के विष्णु भगवान् ऋषि, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक् छन्द, शाकम्भरी शक्ति,
  • दुर्गा बीज, वायुतत्व और यजुर्वेद स्वरूप माना गया है।
  • श्रीमहालक्ष्मी की प्रसन्नता के निमित्त मध्यम चरित्र के पाठ में इसका विनियोग वर्णित हैं।
  • ध्यान – मैं कमलासन पर आसीन प्रसन्नवदना महिषासुरमर्दिनी भगवती श्रीमहालक्ष्मी का ध्यान करता हूँ।
  • जिनके हाथ में रुद्राक्ष की माला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग ढाल, शंख,
  • घंटा, सुरापात्र, शूल, पाश और चक्र सुशोभित हैं। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

श्रीदुर्गासप्तशती पाठ अध्याय 2 महिषासुर की सेना का वध (मध्यम चरित्र)!

  • ऋषि ने कहा- प्राचीन काल में देवताओं और दानवो में एक सौ वर्ष तक तुमुल युद्ध हुआ था।
  • इस युद्ध में दानवों का स्वामी महिषासुर तथा देवताओं के अधिपति इन्द्रदेव थे।
  • उस भीषण द्वन्द्व युद्ध में देवताओं की सेना महाबलवान् दैत्यों के आगे टिक न सकी।
  • समस्त देवताओं पर विजय करके दैत्यराज महिषासुर ने इन्द्र के सिंहासन पर अपना आधिपत्य जमा लिया।
  • तदनन्तर हारे हुए सभी देवगण ब्रह्माजी को अगुआ बनाकर उस स्थान पर गये, जहाँ भगवान् शिव तथा विष्णु विराजमान थे।
  • वहाँ जाकर देवताओं ने महिषासुर के शौर्य तथा अपनी पराजय का आद्योपान्त वर्णन किया।

देवताओं द्वारा भगवान शिव तथा विष्णुजी से महिषासुर के शौर्य का वर्णन!

  • देवताओं ने कहा- भगवन् ! महाबली महिषासुर सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु, इन्द्र, यम, वरुण
  • तथा अन्यान्य देवताओं के अधिकार हस्तगत करके स्वयं ही सब देवों का स्वामी बन गया है।
  • उस विधर्मी महिषासुर ने सभी देवों को उनके स्थान-स्वर्ग से च्युत कर दिया है
  • और अब वे निष्कासित देव भूतल पर मनुष्यों के समान भटक रहे हैं।
  • असुरों की यह सारी घटना मैंने आप लोगों के सम्मुख निवेदित कर दी।
  • अब हम देवगण आपके शरणापन्न हुए हैं। आप विचार करके उस दानव के वध का कोई उपाय बतलाइये।
  • देवताओं के मुख से ऐसी बात सुनकर भगवान विष्णु और शिवजी दैत्यों पर बहुत ही कुपित हुए।
  • इस काण्ड से उन देवाधिदेव की भौहें चढ़ गईं और मुँह टेढ़ा हो गया। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ की हिंदी व्याख्या: नवरात्रि में करें माता भगवती का ध्यान और पाएं सभी क्षेत्रों में सफलता!Hindi interpretation of Shri Durga Saptashati text: Meditate on Mother Bhagwati in Navratri and get success in all areas!

ब्रम्हा, विष्णु व महेश्वर से उतपन्न तेजपुंज का नारी रूप में प्रकट होना।

  • तदनन्तर अत्यन्त क्रोधित चक्रपाणि विष्णु भगवान् के मुख से एक महान् तेज का आविर्भाव हुआ।
  • फिर ब्रह्मा और शंकर के शरीर से भी वैसा ही तेज निकला इसी प्रकार इन्द्रादि अन्य देवों के शरीर से भी उसी प्रकार का तेजपुंज उत्पन्न हुआ।
  • निकलने के बाद ही वे सभी तेजपुंज परस्पर मिलकर एक हो गये ।
  • वह महान् तेजपुंज ज्वलन्त पर्वत के सदृश जान पड़ने लगा।
  • देवताओं ने देखा कि उसकी ज्वालाएँ समस्त दिग्-दिगन्तों में व्याप्त हो रही हैं।
  • समस्त देवों के शरीर से प्रादुर्भूत वह तेजपुंज अतुलनीय था।
  • उस तेजपुंज के एक साथ मिलित होने से वह नारी के रूप में परिवर्तित हो गया
  • और अपने प्रकाश से प्रकाशित होकर त्रैलोक्य में छा गया।
  • भगवान् शिव के शरीर से निकले हुए तेज के द्वारा महामाया देवी का मुख प्रकट हुआ,
  • यमराज के तेज से देवी के सिर के केश निकले और विष्णु भगवान् के तेज से उनकी भुजाओं दया का निर्माण हुआ ।
  • चन्द्रमा के तेज से स्तनद्वय, इन्द्र के तेज से कटि भाग, वरुण के तेज से जाँघ तथा पैर की पिंडली और पृथ्वी के तेज से नितम्ब की उत्पत्ति हुई ।
  • ब्रह्मा के तेज से दोनों पैर तथा सूर्य के तेज से अंगुलियाँ उत्पन्न हुई। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

अथ तंत्रोक्त देवी सूक्तम

https://youtu.be/scxgKGkWrdg

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र) महिषासुरवध हेतु देवी महामाया की उत्तपत्ति!

  • अष्ट वसुओं के तेज से हाथों को अंगुलियों और कुबेर के तेज से नासिका निर्माण हुआ ।
  • प्रजापति के तेज से दन्तावली तथा अग्नि के तेज से तीन नेत्रों का प्रादुर्भाव हुआ ।
  • सन्ध्या के तेज से भृकुटी (दोनों भौहे), वायु के तेज से कान उत्पन्न हुए थे।
  • इसी प्रकार अन्य सभी देवों के मिलित तेज से देवी की उत्पत्ति हुई ।
  • सम्पूर्ण देवों के मिलित तेज से प्रादुर्भूत उस देवी की मूर्ति को देखकर महिषासुर द्वारा सन्तप्त देवता लोग अत्यन्त प्रमुदित हुए।
  • पिनाकी-शंकर भगवान् ने अपने प्रमुख अस्त्र शूल में से एक शूल उन्हें दिया,
  • फिर भगवान् विष्णु ने अपने चक्र से दूसरे नये चक्र का निर्माण करके देवी को प्रदान किया ।
  • वरुणदेव ने शंख, अग्निदेव ने शक्ति, वायु ने धनुष तथा बाण से पूरित दो तरकस देवी को अर्पित किये ।
  • सहस्रलोचन देवराज इन्द्र ने अपने वज्र से निर्मित एक वज्र तथा ऐरावत हाथी से उतार कर एक घण्टा अर्पण किया।
  • यमराज ने कालदण्ड द्वारा प्रादुर्भूत दण्ड, वरुण ने पाश, प्रजापति ने स्फटिकाक्ष की माला
  • और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने उन्हें अपना कमण्डलु अर्पित किया।

देवी महामाया को देवताओं ने विभिन्न आभूषण व शस्त्रों से सज्जित किया!

  • देवी के समस्त रोम-कूपों में सूर्य ने अपनी रश्मियों का तेज भर दिया। काल ने उन्हें अपनी चमचमाती हुई तलवार और ढाल दे डाला ।
  • क्षीरसागर ने उज्ज्वल हार, कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र, दिव्य चूड़ामणि, दो कुण्डल, कड़े, दिए।
  • समुज्ज्वल अर्धचन्द्र, भुजाओं के लिए केयूर (बाहुओं में धारण करने का एक प्राचीन आभूषण बाजूबन्द) प्रदान किया ।
  • दोनों चरणों में धारण करने के लिए विमल नूपुर (पैजेब), गले की उत्तम हँसुली
  • और सभी उँगलियों में धारण करने के लिए रत्नजटित अंगूठियां भी अर्पित की। विश्वकर्मा ने उन्हें अपना अत्यन्त निर्मल फरसा प्रदान किया ।
  • इसके साथ-ही-साथ उन्होंने अनेकों प्रकार के अस्त्र और कभी विद्ध न होने वाले कवच दिये।
  • अस्त्रों के अतिरिक्त उन्होंने मस्तक और वक्ष पर धारण करने के निमित्त देवी को सदैव हरे-भरे रहने वाले कमलों की बनी हुई मालाएँ भी दीं।
  • सागर ने उन्हें सुन्दर कमल-पुष्प भेंट किये और हिमालय पर्वत ने उनकी सवारी के लिए सिंह तथा अनेकों प्रकार के रत्नादि भेंट किये।
  • धन के स्वामी कुबेर ने मधु से पूरित पात्र दिया। सम्पूर्ण पृथ्वी को धारण करने वाले नागराज शेष ने बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार का उपहार दिया।
  • इसी प्रकार अन्य देवों ने भी अपने-अपने अस्त्र- शस्त्र और आभूषण देकर देवी का सम्मान किया। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

देवी का विकराल स्वरूप देख देवता जयजयकार करने लगे!

  • इसके अनन्तर उच्च स्वर से अट्टहास करते हुए देवी ने बारम्बार गर्जन किया।
  • उनके भयंकर गर्जन से सम्पूर्ण आकाश गुंजायमान हो उठा।
  • देवी के घोर गर्जन से उत्पन्न भयंकर रव (शब्द) कहीं समा न सका,
  • जिससे तीनों लोक क्षुभित हुए और समुद्र भी काँप उठा । पृथ्वी में भूकम्प आ गया और समस्त पर्वत हिलने लगे।
  • उस समय देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवती सिंहवाहिनी देवी का जय-जयकार किया ।
  • इसके पश्चात् महर्षियों ने नतमस्तक होकर देवी की स्तुति की।
  • समस्त विश्व को क्षुब्ध देखकर असुर लोग अपनी सम्पूर्ण सेना को कवचादि से सज्जित कर,
  • हाथों में अपने आयुधों को लेकर एकाएक उठ खड़े हुए, उस समय महिषासुर अत्यन्त क्रुद्ध होकर बोल उठा-
  • ‘आ: यह क्या हो रहा है!’ तदनन्तर सम्पूर्ण असुरों से घिरा हुआ ,
  • वह महिषासुर देवी की भयंकर नाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ पड़ा।
  • उसने सबसे आगे जाकर देखा वह देवी अपनी अलौकिक प्रतिभा से त्रैलोक्य को प्रकाशित कर रही थीं ।
  • उनके पदभार से पृथ्वी रसातल में बोझिल होकर दबी जा रही थी।
  • मस्तक के मुकुट से आकाश में रेखा-सी खिची हुई दिख रही थी।
  • तथा वे अपने धनुष के टंकार से सप्त-पाताल लोकों को क्षुभित कर रही थी।
  • अपनी सहस्र भुजाओं से देवी समस्त दिशाओं को आच्छादित करके खड़ी थी। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

देवी के साथ महिषासुर की सेना के दैत्य व असुरों का युद्ध प्रारम्भ हो गया!

  • इसके पश्चात् देवी के साथ दैत्यों का धनघोर युद्ध प्रारम्भ हो गया ।
  • भाँति-भाँति के अस्त्रों-शस्त्रों के प्रहार से सभी दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं।
  • महिषासुर का सेनापति चिक्षुर नामक महान् असुर था। देवी के साथ उस महाबली दानव का संग्राम होने लगा।
  • चामर नामक असुर दानवों की चतुरंगिणी सेना को साथ लेकर युद्ध में भिड़ गया।
  • साठ हजार रथियों को अपने साथ लेकर उदग्र महाबली दानव भी युद्ध में आ पहुँचा ।
  • एक करोड़ सेना लेकर महाहनु नामक असुर ने युद्ध में भाग लिया।
  • असिलोमा नामक महादानव पाँच सौ रथियों के साथ युद्धस्थल में आ पहुँचा।
  • (उसके शरीर के रोंगटे तलवार की धार के सदृश तीखे और पेने थे) ।
  • उस पर रणभूमि में वाष्कल नामक दैत्य अपने साथ साठ लाख सेना लेकर लड़ने लगा।
  • परिवारित नामक असुर हाथी सवार घुड़सवार आदि की टोलियों के साथ एक करोड़ की विशाल सेना के साथ युद्धभूमि में उतर आया।
  • बिडाल नामक दैत्य पाँच अरब रथियों के साथ लड़ने लगा । इनके अतिरिक्त और भी सहस्रों महादैत्य रथ, हाथी और
  • घुड़सवारों की सेना की सहायता से युद्ध करने में लग गये। उस रणस्थल में कोटि-कोटि सहस्र रथ,
  • हाथी और घोड़ों की सेना से घिरा हुआ स्वयं महिषासुर उपस्थित था। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र)देवी महिषासुर की सेना के दैत्यों के भीषण संहार करने लगीं!

  • वे अगणित दानव देवी के साथ तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति, मुसल, खड्ग, परशु
  • और पट्टिश नामक अस्त्र-शस्त्र का प्रहार करते हुए युद्ध में लगे थे।
  • कुछेक दैत्यों ने मिलकर देवी पर शक्ति का प्रहार किया, कुछेक ने अपने पाश फेंके।
  • अन्य दैत्यों ने देवी के वध के उद्देश्य से उन पर खड्ग का प्रहार किया।
  • देवी ने क्रुद्ध होकर लीला स्वरूप अपने अस्त्र-शस्त्रों की भीषण वर्षा से उन दानवों के निक्षिप्त अस्त्रों को सहज में ही काट दिया।
  • उनके मुख-कमल पर परिश्रम या क्लान्ति का लेशमात्र भी चिह्न नहीं दिखाई पड़ता था।
  • देवताओं और ऋषि उनका स्तुति-गान कर रहे थे तथा वह महामाया परमेश्वरी उन दैत्यों पर अपने अस्त्र-शस्त्रों की
  • बौछार कर रही थीं ।देवी का वाहन सिंह भी क्रुद्ध होकर अपने अयालों (गर्दन के केशों) को हिलाता हुआ,
  • दैत्यों की सेना में इस प्रकार भ्रमण करने लगा मानो किसी वन में दावाग्नि फैलकर क्रमशः बढ़ रही हो।
  • देवी ने रणस्थल में युद्ध करते हुए दानवों के साथ जितने श्वाँस छोड़े, वे सभी सैकड़ों-हजारों गणों के रूप में हो गये।
  • और हाथ में परशु, भिन्दिपाल, खड्ग तथा पट्टिश आदि अस्त्रों द्वारा दानवों से युद्ध करने में लग गये ।
  • देवी की शक्ति से वर्धित गण लोग असुरों का संहार करते हुए नगाड़े, शंख आदि बाजे बजाने लगे। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

महिषासुर की सेना पर देवी काल बनकर टूट पड़ीं!

  • उस समरांगण में कितने ही गण मृदंग आदि बाजे बजा रहे थे। इसके पश्चात् देवी ने त्रिशूल, गदा, तलवार चलाकर
  • तथा शक्ति की वर्षा करके सैकड़ों असुरों का विनाश कर दिया।
  • कितने ही राक्षसों को घण्टे की भयंकर आवाज से अचेत करके बध कर दिया ।
  • अनेकों दैत्यों को देवी ने अपने पाश में बाँधकर भूमि पर घसीटा
  • और कितने ही दानव उनकी पैनी तलवार के प्रहार से दो-दो टुकड़ों में विभक्त हो गये ।
  • कितने ही राक्षस उनकी गदा के आघात से आहत होकर धराशायी हो गये,
  • कितने ही मुसल की चोट खाकर आहतावस्था में मुँह से खून उगलने लगे ।
  • शूल के प्रहार से वक्षःस्थल फट जाने के कारण कितने ही दैत्य भूमि पर गिर गये।
  • देवी की बाणवृष्टि से कितने ही दैत्यों का कटिप्रदेश भंग हो गया।
  • बाज पक्षी की तरह वेग से झपटने वाले दानव अपने प्राणों का त्याग करने लगे।
  • कितने ही राक्षसों को भुजाएं आघात से छिन्न-भिन्न हो गयीं, कितनों की गरदने कट गयी।
  • कितनों के मस्तक खण्ड-खण्ड होकर भूमि पर गिरने लगे। कुछ दैत्यों के शरीर बीच के भाग से ही विदीर्ण हो गये।
  • कितने राक्षस जाँघहीन हो जाने से धरती पर गिर गये । देवी ने कितने ही दैत्यों के एक बाँह, एक पैर
  • तथा एकाक्ष करके दो टुकड़ों में विदीर्ण करके उनका संहार कर डाला। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

देवी ने विकराल रूप धरकर महिषासुर की विशाल राक्षस सेना का पल भर में नाश कर दिया।

  • कितने ही योद्धा राक्षस देवी के द्वारा छिन्न-मस्तक होकर भी पुनः सँभलकर उठते थे ।
  • और केवल धड़ के सहारे ही अच्छे-अच्छे अस्त्र-शस्त्रों को हाथ में लेकर युद्ध करने में तत्पर हो जाते।
  • कटे हुए कबन्ध युद्ध के बाजों के स्वर पर नाचने लगते थे। कटे हुए कितने ही धड़ हाथों में खड्ग, शक्ति
  • और ऋष्टि नामक हथियार लिये दौड़ते थे और कितने अन्य दैत्य ठहरो !ठहरो !’ कहकर देवी को युद्ध के लिए प्रेरित करते थे।
  • जिस भूमि पर यह घनघोर युद्ध हुआ था, वहाँ की जमीन देवी द्वारा निक्षिप्त रथ, हाथी, घोड़े
  • और दानवों की लाशों से ऐसी आच्छन्न हो गयी थी कि वहाँ पर किसी का गमनागमन सम्भव नहीं था।
  • दानव दल में हाथी, घोड़े, और मृतक असुरों के शरीर से इतना रक्त प्रवाह हुआ था कि ,
  • वहाँ कुछ ही क्षणों में खून की बड़ी-बड़ी नदियाँ प्रवाहित होने लगीं ।
  • जिस प्रकार तृण-समूह और काष्ठ की विशाल राशि को अग्नि कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है,
  • उसी प्रकार जगज्जननी जगदम्बा ने असुरों के उस विशाल सैन्यसमूह को क्षणभर में नष्ट कर डाला ।
  • देवी का सिंह भी अपने गरदन के बालों को हिला हिलाकर घोर गर्जन कर रहा था।
  • कितने ही दैत्यों की उस गुरु गर्जन से ही मानो प्राण पखेरू निकले जा रहे थे।
  • देवी के गणों ने भी उन दानवों के साथ ऐसा भीषण युद्ध किया,
  • जिससे आकाश में दर्शक बने देवतागण भी बहुत ही प्रसन्न हुए और उन पर आकाशमार्ग से सुमन की दृष्टि करने लगे ।

इस प्रकार आचार्य पण्डित श्रीशिवदत्तमिश्र शास्त्रिकृत ‘शिवदत्ती’ हिन्दी व्याख्या में मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा केअन्तर्गत देवीमाहात्म्य में वर्णित महिषासुर की सेना का वध नामक द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ।

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र) (अध्याय 3) महिषासुर की सेना का वध !

  • ध्यान- जगदम्बिका के श्री-अंगों की शोभा सहस्रों उदित होते हुए सूर्यो के तुल्य है।
  • उनकी रक्तवर्ण की साड़ी के साथगले में मुण्डमाला सुशोभित हो रहा है।
  • दोनों स्तन उनके रक्त चन्दनार्चित हैं। उनके कर-कमलों में अपमाला, विद्या, अभय तथावर नामक ये चार मुद्राये शोभा पा रही है।
  • उनके मुखकमल त्रिनेत्रों से युक्त होकर शोभायमान हो रहे हैं। मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट के साथ ही चन्द्रमा भी विराजमान हैं।
  • वे स्वयं कमलासन पर आसीन हैं। ऐसी देवी को मैं भक्तियुक्तचित्त से नमस्कार करता हूँ।
  • ऋषि ने कहा- इस प्रकार दानवी सेना का संहार होते हुए देखकर सेनापति चिक्षुर क्रोधित होकर
  • अम्बिकादेवी से युद्ध करने के लिए उनके सम्मुख आया।
  • सुमेरु पर्वत के शिखर पर होने वाली मेघों की वर्षा की भाँति वह दानव देवी पर अपने बाणों की वर्षा करने लगा ।
  • तत्पश्चात् देवी ने अपने बाणों से उसके बाणसमूहों को अनायास ही नष्ट करके उसके सारथि और रथ के घोड़ों को मार डाला ।
  • इसके साथ ही उसके धनुष तथा ध्वजा को भी काटकर फेंक दिया।
  • धनुष के कट जाने पर उसके समस्त अंगों को अपने बाणों से छेद डाला। अपने धनुष, रथ, घोड़े और सारथि के नष्ट
  • हो जाने से वह दानव अपने तलवार और ढाल को लेकर देवी की ओर झपटा ।
  • उसने तेज धारवाली तलवार से सिंह के मस्तक पर आघात करके देवी की बॉयी भुजा में अत्यन्त वेग से प्रहार किया।
  • श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

देवी ने महिषासुर के सेनापति चिक्षुर का प्राणान्त कर दिया।

  • राजन्! देवी की बाँह के स्पर्श से वह तलवार भग्न हो गयी।
  • अपना प्रहार निष्फल होते देखकर उस राक्षस ने क्रोध से रक्त नेत्र करके हाथों में शूल उठाया।
  • तब उस महादानव ने देवी भद्रकाली के ऊपर अपना शूल चलाया।
  • वह आकाशमण्डल से गिरते हुए सूर्यमण्डल के समान अपने तेज से देदीप्यमान हो गया।
  • बड़े वेग से उस शूल को अपनी ओर आते देखकर प्रत्युत्तर में देवी ने भी अपना शूल चलाया।
  • देवी के शूल के प्रहार से दानव-शूल के सैकड़ों खण्ड हो गये,
  • साथ ही उस शूल के द्वारा महाबली सेनापति चिक्षुर का प्राणान्त हो गया।
  • महिषासुर के महावीर सेनानायक चिक्षुर वधोपरान्त देवताओं का पीड़क चामर नामक राक्षस
  • हाथी पर सवार होकर लड़ने के लिए आया। उसने आते ही देवी पर शक्ति का आघात किया,
  • परन्तु जगदम्बिका ने उसे केवल हुँकार मात्र से ही घायल एवं निष्प्रभ करके तत्क्षण भूमि पर सुला दिया।
  • अपनी खण्डित शक्ति को देखकर चामर परम कुपित हुआ।
  • क्रोध में भरकर उसने शूल का वार किया, किन्तु देवी ने उस शूल को अपने बाणों द्वारा काट गिराया ।
  • इतने में अवसर पाकर देवी का सिंह हाथी के मस्तक पर उछल पड़ा और दानव के साथ बाहु युद्ध करने को उद्यत हुआ । श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

परमेश्वरी ने अपने क्रोध के प्रचंड प्रहार से चामर, उदग्र, कराल, बिडाल नामक अनगिनत दैत्यों का संहार कर दिया!

  • वे दोनों लड़ते-लड़ते हाथी से भूमि पर उतर आये और अत्यन्त क्रोधित होकर परस्पर प्रचण्ड प्रहार करते हुए लड़ने लगे।
  • तत्पश्चात् देवी का सिंह आकाश की ओर प्रबल वेग से उछल पड़ा ,
  • और गिरते समय अपने पैने पंजों के प्रहार से चामर का सिर धड़ से भिन्न कर दिया।
  • इसी प्रकार उदग्र दैत्य पत्थरों और वृक्षों की चोट खाकर रणस्थल में देवी के हाथों मारा गया
  • और कराल राक्षस भी दाँतों, घूँसों एवं थप्पड़ों की मार से भूमि पर गिर पड़ा ।
  • गदा के प्रहार से देवी ने उद्धत नामक राक्षस को चकनाचूर कर दिया।
  • भिन्दिपाल से बाष्कल एवं बाणों से ताम्र तथा अन्धक को यमराज के घर भेज दिया।
  • त्रिनयना परमेश्वरी ने अपने त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु नामक दानव को मार गिराया ।
  • बिडाल दैत्य के मस्तक को तलवार के आघात से मुण्डहीन कर दिया।
  • दुर्धर और दुर्मुख नामक दोनों राक्षसों को अपने बाणों से बींधकर यमालय में भेज दिया । श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

महिषासुर भैंसे का रूप धरकर देवी पर आक्रमण करने लगा! श्रीदुर्गासप्तशती मध्यम चरित्र महिषासुरवध

  • इस प्रकार अपनी सेना का क्षय होते देखकर महिषासुर ने भैंसे का रूप बनाकर देवी के गणों को त्रस्त करना प्रारम्भ किया।
  • वह राक्षस किसी-किसी को थूथुन से मारकर, किसी-किसी पर खुरों के प्रहार से,
  • किसी-किसी को पूँछ की चोट से और कुछ को अपने सींगों से विदीर्ण कर दि।
  • कुछ गणों को प्रबल वेग से, किसी को सिंहनाद के द्वारा किसी को घुमाकर
  • और कितने को ही अपने निःश्वास वायु के झोके से भूमि पर गिरा दिया।
  • इस प्रकार गणों की सेना को तितर-बितर करके वह राक्षस भगवती के सिंह को मारने के लिए वेग से झपट पड़ा।
  • इससे महामाया को अतीव क्रोध उत्पन्न हुआ ,उधर महाबलशाली महिषासुर भी क्रुद्ध होकर ,
  • भूमि को अपने खुरों से खोदने लगा और अपने सींगों से उठा-उठाकर बड़े-बड़े पर्वतों को फेंककर गर्जन करने लगा।
  • उसके वेग से घुमाने के कारण पृथ्वी अत्यन्त क्षुभित होकर फटने सी लगी।
  • उसकी पूँछ से टकराकर सागर पृथ्वी को जलमग्न करने लगा।
  • हिलते हुए सींगों के प्रहार से बादलों के समूह छिन्न-भिन्न हो गये।
  • उसके श्वाँस की प्रबल वायु के कारण उड़ते हुए सैकड़ों पर्वत आकाश से भूमि पर गिरने लगे ।
  • उस महादानव को क्रोध की मुद्रा में अपनी ओर लक्ष्य देखकर,
  • चण्डिका देवी ने भी उसको मारने के लिए उस पर महान् क्रोध प्रकट किया। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

मायावी राक्षस महिषासुर रूप बदल बदलकर देवी से युद्ध करने लगा!

  • सर्वप्रथम देवी ने अपने पाश फेंककर उस महाबली असुर को बाँध लिया।
  • अपने को उस महारणस्थल में बँध जाने पर उस राक्षसराज ने भी अपने बनावटी महिष स्वरूप का परित्याग कर दिया
  • तुरन्त ही वह दैत्य मायावी सिंह के रूप में देवी के सामने आ गया।
  • ऐसी स्थिति में जैसे ही अम्बिका ने उसका शिरच्छेदन करना चाहा, त्योंही वह राक्षस खड्गधारी पुरुषभेष में दिखाई पड़ने लगा।
  • देवी ने तत्काल ही बाणवृष्टि करके ढाल और तलवार के सहित उस महिषासुर को बेध दिया।
  • तब वह मायावी राक्षस गजराज के रूप में परिवर्तित हो गया । गजराज के वेश में वह राक्षस, अपनी सूँड़ से देवी के
  • विशाल सिंह को खींचने और गरजने लगा। खींचने का प्रयास करते ही देवी ने अपनी तलवार से उसकी सूँड़ काट ली।
  • तदनन्तर उस महादानव ने पुनः अपने पहले वाले भैंसे के रूप को ग्रहण कर लिया
  • और पहले की तरह चराचर प्राणियों सहित त्रैलोक्य को आतंकित करने लगा।
  • तत्पश्चात् जगज्जननी चण्डिका भवानी बारम्बार उत्तम मधुपान करते हुए आँखें
  • लाल करके हँसने लगी । वह राक्षस बल और पराक्रम के मद में उन्मत्त की भाँति घोर गर्जन करने लगा
  • और अपने सीगो पर उठा-उठाकर पर्वतों को देवी पर निक्षेप करने लगा । श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र) देवी ने प्रचंड क्रोध के साथ महिषासुर का वध कर दिया!

  • उस समय उसके चलाये हुए पर्वतों को देवी अपने बाणों से विचूर्ण करते हुए बोली।
  • मधु के मद से बोलते समय उनका मुख लाल हो रहा था और जिह्वा लड़खड़ा रही थी।
  • देवी बोलीं- ओ मूढ़ मैं जब तक मधुपान करती हूँ, तब तक तू खूब मनमानी गरज ले।
  • मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु होने पर अब शीघ्र ही देवगण भी गरजन करेंगे।
  • ऋषि ने कहा- ऐसा कहकर देवी उछलकर उस दैत्य पर चढ़ बैठीं।
  • अपने पैरों से उसे दबोच कर देवी ने शूल से उसके कण्ठस्थल में प्रहार किया ।
  • दबाव के शिकंजे में जकड़ा होने पर भी महिषासुर अपने मुख से (दूसरे रूप में बाहर होने लगा)।
  • अभी वह शरीर के अर्धभाग से ही बाहर निकल सका था कि देवी ने अपने बल से उसे रोक दिया।
  • वह दैत्य अर्ध निर्गतावस्था में ही देवी मस्तक का छेदन कर दिया । साथ युद्ध में लग गया।
  • तब देवी ने बहुत बड़ी तलवार से उसके मस्तक का छेदन कर दिया। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र) महिषासुरवध से सभी देवता हर्षित होकर देवी की स्तुति करने लगे!

  • महिषासुर के मरते ही उसकी बची-खुची सेना हाहाकार करती हुई भाग खड़ी हुई।
  • तथा समस्त देव अत्यन्त आनन्दित हुये। देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ मिलकर भगवती दुर्गा की स्तुति की।
  • गन्धर्वराज प्रमुदित होकर गान करने लगे। तथा अप्सराएँ भी नाचने लगीं।

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में वर्णित

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र ) का महिषासुरवध नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ।

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र) महिषासुरवध (अध्याय 4)

  • ध्यान-जिन देवी को देवगण चारों ओर से आवृत्त रखते हैं और सिद्धिलाभ की आकांक्षा वाले मनुष्य जिनकी सेवा ● में तत्पर रहते हैं,
  • उन ‘जया’ नामवाली दुर्गादेवी की आराधना करना उचित है। उनके अंगों का वर्ण काले मेघों के सम्मान श्याम रंग का है।
  • उनके कटाक्षमात्र से ही शत्रुसमूह भयाकुल हो उठता है, उनके मस्तक पर चन्द्रमा की रेखा बद्ध होकर शोभायमान होती है।
  • उनके हाथों में शंख, चक्रे, तलवार, त्रिशूल आदि शोभित है।
  • वे तीन नेत्रों वाली देवी अपने के कन्धों पर सवार होकर अपने प्रभाव से प्रैलोक्य को पूर्ण कर रही है।
  • ऋषि ने कहा- अत्यन्त बलशाली पापात्मा दैत्य महिषासुर तथा उसकी दानवी सेना का देवी के हाथ से संहार हो जाने
  • पर इन्द्रादि देवता नतमस्तक होकर भगवती दुर्गादेवी की स्तुति करने लगे।
  • ऐसे समय में उनके सुन्दर अंगों में प्रफुल्लता के कारण रोमांच हो रहा था ।
  • देवताओं ने कहा-आपका स्वरूप ही सब देवों की शक्तिसमूह है,
  • आपने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त कर रखा है, आप समस्त देवों तथा महर्षियों के द्वारा परमपूज्य हैं।
  • श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध) में देवताओं द्वारा माता की स्तुति की गई।

महिषासुरवध व उसकी सेना का वध हो जाने पर देवता गण माता जगदम्बा की स्तुति करने लगे! श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र)

  • हे जगदम्बा! हम आपको भक्तिभाव से प्रणाम करते हैं। आप हम लोगों का कल्याण कर।
  • जिन देवी के अतुलनीय प्रभाव और शौर्य का वर्णन करने में भगवान् शेषनाग, ब्रह्मा और शिवजी भी असमर्थ हैं,
  • वे ही भगवती चण्डिका समस्त विश्व का पालन तथा अशुभकारी भय के नाश का विचार कर।
  • जो धर्मात्माओं के गृह में लक्ष्मी रूप से, दुरात्माओं के यहाँ निर्धनता रूप से, विशुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषों के हृदय में
  • बुद्धि रूप से, सज्जनों में श्रद्धारूप से तथा कुलीन मनुष्यों में लज्जा के रूप से विराजमान रहती हैं,
  • उन महामाया भगवती दुर्गा को हम सब प्रणाम करते हैं। हे देवि! आप समस्त विश्व का पालन करिए ।
  • हे देवि! हम आपके इस अचिन्तनीय रूप का असुरों के संहारक शौर्य तथा सम्पूर्ण देव-दानवों के सम्मुख
  • उत्पन्न किये हुए अद्भुत चरित्र का वर्णन नहीं कर सकते । आपही विश्व की उत्पत्ति में कारणस्वरूप हैं,
  • आपमें तीनों गुण (सत्व, रज और तम) विद्यमान हैं, फिर भी दोषों के साथ आपका सम्पर्क नहीं होता।
  • भगवान् विष्णु तथा शिवजी भी आपकी महिमा को नहीं जान सकते। यह चराचर विश्व आपका अंश है,
  • आपही सब जीवों के लिए आश्रयभूत हैं, क्योंकि एकमात्र आपही सब की मूलभूत अव्याकृता परा प्रकृति है।
  • हे देवि जिसके, उच्चारण से सभी यज्ञों में देवताओं की तुष्टि होती है, वह ‘स्वाहा’ आपही हैं।
  • इसके अतिरिक्त आप पितरों को भी तृप्ति प्रदान करती हैं। श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

देवताओं द्वारा देवी को विभिन्न नामों से पुकारा गया!

  • इस कारण सभी लोग आपको ‘स्वधा’ के नाम से सम्बोधित करते हैं । हे देवि! आपही परा विद्या है,
  • जिससे मोक्ष की प्राप्ति, अचिन्त्य महाव्रत स्वरूपता, समस्त दोषों से हीनता, जितेन्द्रियता,
  • तत्व की सारता होती है और सभी मुनिजनजिसके लिए निरन्तर अभ्यासशील रहा करते हैं।
  • आप शब्दस्वरूपा, अत्यन्त निर्मल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा उद्गीथ
  • (छन्द के रूप में गाया जाने वाला एक प्रकार का वेद मन्त्र) के मनोरम पद्य के पाठ से युक्त सामवेद की आधार हैं।
  • आपही देवी, तीनों वेद और छहों ऐश्वर्य से सम्पन्न भगवती हैं। विश्व की उत्पत्ति एवं पालन के निमित्त आपही वार्ता
  • (कृषि एवं जीविका) के रूप में प्रादुर्भाव हुई हैं। आप जगत् को महान् पीड़ा को नाशकर्त्री है।
  • हे देवि ! सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आप मेधा शक्ति हैं।
  • दुस्तर संसार-सागर से तारने वाली नौकास्वरूपिणी दुर्गादेवी आपही हैं। आपकी किसी पदार्थ में आसक्ति नहीं है।
  • आपही कैटभ के शत्रु भगवान् विष्णु के वक्ष में निवास करने वाली लक्ष्मी तथा शिव द्वारा सम्मानित गौरी देवी भी है ।श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

देवताओं द्वारा देवी के कल्याणकारी स्वरूप की स्तुति की गई।

  • आपका मुखकमल मृदु हास्य से युक्त, निर्मल, पूर्णचन्द्र बिम्ब के समान और उत्तम स्वर्ण की सुन्दर आभा से भासित हैं,
  • फिर भी आपके इस अनुपम लावण्य को देखकर महिषासुर ने कुपित होकर आप पर आघात कर दिया,
  • यह बात आश्चर्य में डाल देने वाली है । हे देवि! वही मुख जब क्रोध की मुद्रा में उदयकालीन चन्द्रमा के समान अरुण
  • तथा चक्र भौहों के कारण भयंकर हो उठा, तब उस रूप को देखकर महिषासुर का सहसा प्राणान्त नहीं हुआ,
  • यह और भी अधिक आश्चर्य की बात है, क्योंकि क्रुद्ध यमराज के सामने कौन प्राणी जीवन धारण करने में समर्थ हो सकता है।
  • हे परमात्मस्वरूपा देवि! आप प्रसन्न हो, आपके प्रसन्न होने पर विश्व का उत्थान होता है।
  • और कुपित होने पर कितने ही वंशों का नाश हो जाता है, यह बात अनुभव द्वारा ही प्रत्यक्ष प्रमाणित हुई है।
  • आपके क्रोधाग्नि में महिषासुर की विशाल वाहिनी (सेना) भी क्षणमात्र में भस्म हो उठी है।
  • आप सदैव अभ्युदयकर्त्री हैं, आप जिन लोगों पर कृपादृष्टि रखती हैं, वे ही लोग देश में सम्मान, धन और ख्याति प्राप्त करते हैं।
  • उन लोगों का धर्म कभी शिथिल नहीं होता तथा वे ही अपने स्त्री, पुत्र और भृत्यों के साथ रहकर धन्य होते है ।
  • हे देवि! आपकी ही कृपाकटाक्ष से धर्मात्मा व्यक्ति श्रद्धापूर्वक
  • धर्माचरण में संलग्न रहता है और उसके प्रभाव से स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।
  • अतएव आप निश्चय ही त्रैलोक्य की मनवांछित फल प्रदान करती हैं ।श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

देवतागण माँ के दुःख-दरिद्र और भयहारी स्वरूप की स्तुति करने लगे!

  • हे माँ दुर्गे। आप स्मरण मात्र से ही सब जीवों का भय निवारण करती है।
  • और स्वस्थ मनुष्यों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणकारी बुद्धि देती हैं।
  • दुःख-दरिद्र और भयहारी देवि ! आपका चित्त परोपकार के निमित्त सदैव द्रवित रहता है, ऐसा दूसरा कौन है ?
  • हे देवि ! जो राक्षस अनन्त काल तक नरक भोग करने के लिए पापाचार करते रहे,
  • उन्हें युद्ध में वध करके स्वर्ग भेजने तथा संसार को सुखी करने के उद्देश्य से ही आप उनका वध करती हैं ।
  • आप अपने शत्रुओं पर शस्त्रों का आघात क्यों करती हैं ?
  • आप केवल अपने दृष्टिपात से ही सम्पूर्ण दैत्य समूहों को भस्म कर सकती हैं,
  • तो भी आप ऐसा न करके युद्धस्थल में उनका संहार करती हैं। इस बात में भी कुछ रहस्य जान पड़ता है।
  • वह यह है कि मेरे शस्त्रों के प्रहार से पवित्र होकर ये सब स्वर्गपुरी में जायें,
  • इस प्रकार उनके प्रति भी आपके उत्तम विचार होते हैं खड्ग के तेजोराशि की भयंकर दीप्ति
  • तथा आपके त्रिशूल के अग्रभाग की घनीभूत कान्ति से चकाचौंध होने पर भी असुरों की आँखें नष्ट नहीं हुई,
  • क्योंकि वे सब मनोरम किरणों से युक्त आनन्द प्रदान करने वाले आपकेमुखचन्द्र का दर्शन कर रहे थे ।
  • हे देवि ! आपका शील दुरात्माओं के दुर्व्यवहार का निवारक है।

माँ महिषासुर मर्दिनी के अतुलनीय रूप की स्तुति!

  • आपका रूप अचिन्तनीय तथा अतुलनीय है, आपका पराक्रम देवताओं के विजेता दैत्यों का नाशक है।
  • इस प्रकार आपने अपने शत्रुओं पर सदैव दया हो दर्शायी है ।
  • हे वरदात्री देवि! आपके इस शौर्य की तुलना कहीं भी नहीं हो सकती,
  • शत्रुओं को त्रस्त करने वाला एवं अत्यन्त मनोहारी रूप अन्यत्र कहाँ दिखाई पड़ सकता है।
  • हृदय में दयालुता और युद्ध में निर्देयता- ये दोनों बातें एक साथ होने का भाव केवल त्रैलोक्य में आपके सिवा और किसी में नहीं है
  • हे अम्बे। आपने शत्रुओं का वध करके उन्हें अमरपद दिलाया है, उनसे प्राप्त होने वाले भय को हम लोगों से दूर किया है,
  • हमारा आपको नमस्कार है। हे देवि ! आप शूल के द्वारा हमारा रक्षण करें।
  • हे अम्बिके! आप अपने खड्ग, घण्टा-ध्वनि और धनुष की टंकार से हमारी रक्षा कीजिए। हे चण्डिके!
  • आप हमारी पूर्व, पश्चिम, दक्षिण तथा उत्तर में अपने त्रिशूल को घुमाकर हमारा परित्राण करें। आपके जो परम सुन्दर
  • एवं अत्यन्त भीषण रूप त्रिभुवन में विचरण करते हैं, उसके द्वारा आप हमारी तथा भूतल की रक्षा करें।
  • हे अम्बिके। आपके कर-कमलों में सुशोभित होने वाले खड्ग, शूल, गदा आदि
  • जो भी अस्त्र-शस्त्र हो, उन सभी द्वारा आप हम लोगों का रक्षण करें ।श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)

श्रीदुर्गासप्तशती (मध्यम चरित्र महिषासुरवध)देवताओं द्वारा स्तुति करने प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें वरदान दिया!

  • ऋषि ने कहा – इस प्रकार सब देवो ने उस जगत माता का मिलकर स्तवन तथा नन्दनकानन
  • (इन्द्रदेव के बगीचे का नाम) के दिव्य पुष्पों एवं गन्ध-चन्दनादि के द्वारा पूजन किया।
  • तदनन्तर दिव्य धूपों का सुगन्ध अर्पित किया। तब देवी ने करबद्ध होकर प्रणाम करते हुए उन देवताओं से कहा ।
  • देवी ने कहा- हे देवगण । तुम सब लोग मुझसे अपना अभीष्ट पदार्थ माँग लो ।
  • तब देवताओं ने कहा- भगवती की कृपा से हम लोगों की सभी आकांक्षाएँ पूर्ण हो गयी है,
  • अब कुछ भी इच्छित वस्तु माँगने के लिए नहीं है । हे महेश्वरि ! हम लोगों का यह परम शत्रु महिषासुर मारा गया है,
  • इतने पर भी आप यदि हम लोगों को कुछ देना ही चाहती है तो हम लोगों की यही इच्छा पूरी कीजिए कि
  • जब कभी भी हम आपका स्मरण करें तब आप दर्शन देकर हम लोगों को संकट से मुक्त करें। हे प्रसन्नवदना अम्बिके ।
  • जो भी व्यक्ति इन स्तोत्रों के द्वारा आपकी आराधना करे उसे धन-धान्यादि तथा स्त्री पुत्रादि से सम्पन्न करें
  • तथा सदैव हम लोगों पर आप प्रसन्न रहें ।
  • ऋषि बोले- हे राजन् ! देवों ने अपने तथा विश्व के कल्याणार्थ जब भद्रकाली देवी को स्तुति द्वारा प्रसन्न किया,
  • तब वे ‘तथास्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर वहीं अन्तर्निहित हो गयीं।
  • हे राजन् पूर्वकाल में त्रैलोक्य की हितकांक्षिणी देवी जिस प्रकार देवों के शरीर से प्रादुर्भूत हुई थी,वह सब कथा मैंने तुम्हें सुना दी ।

अंत में

इसके पश्चात् देवों की हितकारिणी देवी दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ और निशुम्भ नामक राक्षसों के संहार के लिए

जिस प्रकार गौरी देवी के अंगों से अवतरित हुई थीं, उसका वर्णन मैं तुमसे सुनाता हूँ।

इस प्रकार मार्कण्डेय पुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा के अन्तर्गत देवी माह में वर्णित इन्द्रादि-स्तुति नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ।

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माता महिषासुर मर्दिनी की जय!

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