श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र की हिंदी व्याख्या! नवरात्रि में करें माता भगवती का ध्यान!shri Durgasaptashati (uttar charitra) Total Post View :- 1843

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (उत्तर चरित्र) की हिंदी व्याख्या! नवरात्रि में करें माता भगवती का ध्यान!

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (उत्तर चरित्र) के देवता सरस्वती हैं जो गौरी देवी के शरीर से उतपन्न हुईं है।

देवताओं के संकट हरने के लिए माँ जगदम्बा ने अनेकों रूप धरे और शुम्भ निशुम्भ, चण्ड मुण्ड का संहार किया।

देवी के पराक्रम को दिखाने वाला यह उत्तर चरित्र अत्यंत विस्मयकारी है जो माता के प्रति भक्तिभाव पैदा करता है।

सबको सहारा देने वाली माँ जगदम्बा की प्रसन्नता हेतु श्री दुर्गासप्तशती पढ़ने का विधान है।

यह थोड़ा कठिन जरूर है किंतु भक्ति व लग्न से सब कुछ सम्भव है। इसका पाठ करने का नियम यह है ,

इसे तीन भाग में पढ़ा जाता है पहला प्रथम चरित्र , दूसरा मध्यम चरित्र और तीसरा उत्तर चरित्र।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (प्रथम अध्याय)(प्रथम चरित्र)की हिंदी व्याख्या: नवरात्रि में करें माता भगवती का ध्यान और पाएं सभी क्षेत्रों में सफलता!Hindi interpretation of Shri Durga Saptashati text: Meditate on Mother Bhagwati in Navratri and get success in all areas!

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (मध्यम चरित्र) महिषासुर वध कथा।अध्याय 2,3,4 (हिंदी अनुवाद)Shree Durga Saptashati Path (Medium Character) Mahishasura Slaughter Story. Adhyay 2,3,4 (Hindi translation)

सरलता की दृष्टि से इसका हिंदी अनुवाद आचार्य पंडित श्री शिवदत्त मिश्र शास्त्री द्वारा किया गया है।

शुध्दता की दृष्टि से हमारे द्वारा इसे यथावत प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है ताकि आप सभी लाभान्वित हों।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (उत्तर चरित्र) पंचम अध्याय देवी-दूत संवाद!

  • विनियोगः– ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रुद्रऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्ति प्रामरी बीजम् सूर्यस्तत्वम्, सामवेदः स्वरूपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थी उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः ।
  • विनियोग- इस उत्तर चरित्र के ऋषि रुद्र, देवता महासरस्वती, अनुष्टुप् छन्द, भीमा शक्ति, भ्रामरी बीज, सूर्य तत्व तथा सामदेव स्वरूप है।
  • महासरस्वती की प्रसन्नता के लिए उत्तर चरित्र के पाठ में इसके विनियोग का विधान है।
  • ध्यान- जिनके कर-कमलों में घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र और धनुष-बाण है,
  • जिनके शरीर की दीप्ति शारदीय चन्द्र के समान सुन्दर है, जो त्रैलोक्य की आधारभूता हैं
  • और शुम्भ-निशुम्भ आदि दैत्यों का संहार करने वाली हैं,
  • उन गौरी देवी के शरीर से उत्पन्न महासरस्वती देवी का मैं निरन्तर स्मरण करता हूँ ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (उत्तर चरित्र)

  • ऋषि ने कहा– प्राचीन काल में शुम्भ और निशुम्भ नामक दानवों ने अपने बल के मद में चूर होकर
  • इन्द्र के हाथ से त्रैलोक्य का राज्य एवं यज्ञ भाग छीनकर अधिकृत कर लिया ।
  • वे ही दोनों राक्षस सूर्य, चन्द्र,यम, वरुण आदि देवों के अधिकार भी भोगने लगे ।
  • वायु और अग्नि का कार्य भी वे दोनों ही करने लगे। उन दोनों दानवों ने सभी देवों को पराजित, अपमानित
  • तथा राज्य-च्युत करके उन्हें स्वर्ग से बाहर खदेड़ दिया।
  • उन दोनों बलशाली असुरों से अपमानित होकर देवताओं ने अपराजिता देवी का स्मरण किया ।
  • उन लोगों ने सोचा कि जगदम्बा ने हम लोगों को प्रसन्न होकर वर-प्रदान किया था कि
  • संकटापन्न स्थिति में तुम्हारे स्मरण से मैं तुम्हें संकटमुक्त कर दूँगी । ऐसा निश्चय करके देवता लोग गिरिराज हिमाचल
  • पर्वत पर जाकर भगवती विष्णुमाया की स्तुति करने लगे ।
  • देवताओं ने कहा- देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवा को मेरा सदैव नमस्कार है।
  • प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है। नियम-पूर्वक जगदम्बा को हम लोग प्रणाम करते हैं ।
  • रौद्रा, नित्या, गौरी एवं धात्री को बारम्बार नमस्कार है। ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपिणी देवी को सदैव नमस्कार है ।
  • शरण में आगतों की कल्याणकारिणी, वृद्धि एवं सिद्धिरूपिणी देवी को हमारा बारम्बार प्रणाम है।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र देवताओं द्वारा देवी की स्तुति!

  • नैऋति (राक्षसों की लक्ष्मी), राजाओं की लक्ष्मी तथा शर्वाणी-स्वरूपा जगज्जननी को हम प्रणाम करते हैं ।
  • दुर्गा, संकटहारिणी, सर्वसारभूता, सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रादेवी को मेरा सतत् प्रणाम है ।
  • अत्यन्त सौम्या, अत्यन्त रौद्रा देवी को हम बार-बार प्रणाम करते हैं।
  • जगत् की आधारभूता कृति देवी को पुनः पुनः मेरा प्रणाम है ।
  • सब प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से कही जाने वाली देवी को मेरा सतत् नमस्कार है ।सभी प्राणियों में चेतना
  • कहलाने वाली देवी को मेरा अभिवादन है । सभी जीवों में बुद्धिरूप से निवास करने वाली देवी को मेरा बार-बार
  • प्रणाम है।सभी प्राणियों में निद्रारूप में स्थित देवी को मेरा प्रणाम है समस्त जीवों में क्षुधाग्नि रूप से विद्यमान देवी
  • को मेरा प्रणाम है ।सभी जीवों में छाया रूप से स्थित सभी प्राणियों में शक्तिरूप से स्थित सभी जीवों में तृष्णारूप से
  • स्थित, सभी जीवों में क्षमारूप से विद्यमान देवी को मेरा पुनः पुनः प्रणाम है ।
  • जो देवी सभी जीवों में जाति रूप से स्थित, लज्जारूप से स्थित तथा शान्ति रूप से स्थित हैं, उन देवी को मेरा बारम्बार अभिवादन है।
  • सभी प्राणियों में श्रद्धारूप से तथा कान्तिरूप से स्थित देवी को मेरा नमस्कार है।
  • जो सभी जीवों में लक्ष्मीरूप तथा वृत्तिरूप से विद्यमान हैं, उन देवी को मैं पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ।
  • सभी जीवों में स्मृतिरूप से वर्तमान देवी को मेरा बार-बार प्रणाम है ।

देवताओं ने विभिन्न प्रकार से देवी की स्तुति की!

  • जिन देवी की सभी जीवों में दया तथा तुष्टिरूप से स्थिति है, उन देवी को मेरा प्रणाम है ।
  • जो देवी सभी प्राणियों में मातृ तथा भ्रान्तिरूप से विद्यमान हैं, उन्हें मेरा बार-बार नमस्कार है ।
  • जो देवी समस्त जीवों के इन्द्रिय वर्ग की स्वामिनी तथा सभी प्राणियों में व्याप्त रहने वाली हैं, उन्हें मेरा नमस्कार है
  • जिन देवी की इस सृष्टि में चैतन्यरूप से व्याप्ति है, उन देवी को मेरा प्रणाम है ।
  • प्राचीन काल में अपनी इष्ट-सिद्धि की पूर्ति होने से देवों ने जिनका स्तवन तथा देवों के राजा इन्द्र ने बहुकाल तक
  • जिनका सेवन किया, वह कल्याणकारिणी ईश्वरी हमारा हित तथा मंगल करें तथा मेरी सभी आपदाओं का निवारण करें ।
  • जिन परमेश्वरी को हम सब देवगण, दैत्यों द्वारा त्रस्त हो इस समय प्रणाम करते हैं तथा जो भक्तियुक्तचित के
  • पुरुषों द्वारा स्मरण करने से समस्त संकट को तत्काल टाल देती है, वे हमारे संकट को नष्ट करें।
  • ऋषि बोले- हे राजन् । देवताओं के इस स्तुतिपाठ के समय गंगादेव आयी हुई थी।

देवी पार्वती ने स्तुति सुनकर देवताओं से प्रश्न किया !

  • उन सुन्दर भृकुटीली भगवती पार्वती ने देवताओं से प्रश्न किया- आप लोग यहाँ किसको स्तुति कर रहे हैं?
  • तब उन्हीं के शरीर कोश से उत्पन्न हुई शिवा देवी ने कहा- युद्ध में निशुम्भ दैत्य से पराजित तथा
  • शुम्भ से अपमानित होकर ये समस्त देवता मेरी ही स्तुति कर रहे हैं ।
  • पार्वतीजी के शरीरकोश से अम्बिका देवी की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए वे इस त्रैलोक्य में (कौशिकी) नाम से सम्बोधित की जाती हैं ।
  • कोशिकी की उत्पत्ति के बाद पार्वती देवी का शरीर काले रंग में परिवर्तित हो गया,
  • एतदर्थ वे हिमालय पर रहनेवाली कालिका देवी के नाम से प्रसिद्ध हुई ।
  • इसके पश्चात् वहाँ शुम्भ-निशुम्भ के भृत्य चण्ड-मुण्ड ने आकर परम मनोमुग्धकारी रूप वाली अम्बिका देवी को देखा ।

शुम्भ निशुम्भ के भृत्य चण्ड मुण्ड शुम्भ से देवी के स्वरूप के मनोहारी रूप का वर्णन करने लगे!

  • देवी को देखकर वे शुम्भ दानव के पास जाकर बोले-महाराज मैंने हिमालय पर एक अत्यन्त रूपवती स्त्री देखी है,
  • जिसकी कान्ति से हिमालय उद्भासित हो रहा है ,वैसा अनिन्ध रूप कभी किसी ने नहीं देखा होगा।
  • हे असुराधिप! आप पता लगाइए कि वह कौन है और उसे ग्रहण कर लीजिए ।
  • उस स्त्री-रत्न के समस्त अंग बहुत ही कमनीय है और वह अपने अंगों की आभा से समस्त दिशाओं को आलोकित कर रही है।
  • हे दैत्यराज अभी तक वह हिमालय पर ही वर्तमान है, आप उसे चलकर देख सकते हैं।
  • हे प्रभो! इस समय आपके गृह में संसार के सभी रत्न, घोड़े, हाथी आदि शोभित हो रहे हैं।
  • हाथियों में ऐरावत, वृक्षों में पारिजात तथा घोड़ों में उच्चैश्रवा तो आपने ही इन्द्र से छिन लिया है ।
  • हंसों से जुता हुआ ब्रह्माजी का यह रत्नजड़ित अद्भुत विमान अब आपके यहाँ पड़ा है ।
  • महापद्म नामक कुबेर की निधि छीनकर आपने हस्तगत कर लिया है।
  • केसरों से सुशोभित किंजल्किनी नाम की माला समुद्र ने आपको अर्पित कर दी है,
  • जिसके कमल कभी भी नहीं कुम्हलाते और सदा हरे-भरे रहते हैं ।
  • सोना बरसाने वाला वरुणदेव का छत्र भी आपके घर में शोभित हो रहा है।
  • तथा प्रजापति का यह उत्तम रथ भी आपके पास उपलब्ध है ।

(श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र) देवी के रूप का वर्णन सुन शुम्भ ने देवी को लाने के लिए दूत भेजा!(

  • हे दैत्येश्वर ! मृत्यु की उत्क्रान्तिदा नामक शक्ति भी आपने अपने अधिकार में ले ली है तथा वरुण का पाश और
  • समुद्रगर्भ के अनेकों रत्न आपके अनुज निशुम्भ के पास हैं। अग्नि ने स्वतः शुद्ध किये हुए दो वस्त्र आपको अर्पित किये हैं ।
  • हे दैत्यराज ! इस प्रकार आपने समस्त रत्नों का संग्रह कर लिया है,
  • फिर यह स्त्रियों में रत्नमयी देवी को आपने क्यों छोड़ रखा है। इसे भी आप अपने अधिकार में कर लीजिए।
  • ऋषि ने कहा- चण्ड-मुण्ड के मुख से ऐसी बात सुनकर शुम्भ ने अपने महादैत्य सुग्रीव को दूत बनाकर
  • देवी के पास सन्देश कहलाने के लिए भेजा। उस दैत्य से शुम्भ ने कहा कि तुम उसे बातों में बहलाकर
  • मेरे पास अतिशीघ्र लाने का प्रयत्न करना । वह दूत पर्वत के उस मनोरम भाग में गया, जहाँ देवी विराजमान थीं।
  • उनसे उस दैत्य ने मधुर वाणी में कहना प्रारम्भ किया।

(श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र) दूत द्वारा देवी को शुम्भ का संदेश!

  • दूत ने कहा- हे देवि ! इस समय दैत्यराज शुम्भ ही इस त्रिभुवन के एकमात्र स्वामी हैं।
  • मैं उनका दूत बनकर उनकी आज्ञा से तुम्हारे पास आया हूँ। उनकी आज्ञा का पालन देवता लोग सदैव निर्विरोध रूप से करते आये हैं।
  • कोई भी उनकी आज्ञा टालने का दुस्साहस नहीं कर सकता है। उन्होंने समस्त देवों पर विजय प्राप्त की है
  • और तुम्हारे लिए जो सन्देश दिया है, उसे दत्तचित्त होकर सुनो । समस्त विश्व मेरे अधीनस्थ है,
  • देवता भी मेरी आज्ञा का पालन करते हैं। सम्पूर्ण यज्ञांशों को मैं ही भिन्न-भिन्न रूपों से ग्रहण करता हूँ ।
  • तीनों लोकों के श्रेष्ठतम रत्न सभी मेरे अधिकार में हैं। देवराज इन्द्र का वाहन श्रेष्ठरत्न ऐरावत नाम का हाथी मेरे पास है ।
  • क्षीरसागर के मन्थनकाल में उत्पन्न अश्वरत्न उच्चैःश्रवा को अब देवताओं ने मुझे अर्पित कर दिया है ।
  • हे सुन्दरि! इन पदार्थों के अतिरिक्त और भी जितने अमूल्य रत्न या पदार्थ देवों, गन्धर्वो या नागों के अधिकार में थे,
  • वे सब अब मेरे पास उपलब्ध हैं । हे देवि! हम लोग तुम्हें स्त्रियों में रत्न मानते हैं। अतएव तुम हमारे पास आओ।
  • क्योंकि उन अधिकृत रत्नों का उपयोग करने वाला एकमात्र में ही हूँ ।
  • हे चंचल चितवसुन्दर तुम मेरे या मेरे आई महापराक्रमी निशुम्भ के पास रहकर दुर्लभ सुखों का उपयोग करो,
  • क्योंकि तुम रत्नस्वरूपिणी हो ।
  • मेरा वरण करके तुम अतुल सम्पत्ति तथा ऐश्वर्य की उत्तराधिकारी बनोगी।
  • अपनी बुद्धि से ऐसा विचार कर तुम मेरी पत्नी बनना स्वीकार करो।

दूत के ऐसे वचन सुन देवी ने उत्तर दिया! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • ऋषि ने कहा- दूत के मुख से ऐसी उक्ति सुनकर कल्याणमयी भगवती जगद्धात्री दुर्गा मन में गम्भीर भाव से
  • मुस्कुराते हुए उस दूत से कहने लगीं । देवी ने उस दूत को सम्बोधित करते हुए कहा- हे दूत तुमने जो बात कही है,
  • वह बिल्कुल सत्य है, इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है। शुम्भ तीनों लोकों का इस समय स्वामी है।
  • और उसका भाई निशुम्भ भी उसी के सदृश पराक्रमशील है किन्तु इस विषय में मैंने पहले जो प्रतिज्ञा ठान ली है,
  • उसे किस प्रकार
  • तोड़ सकती हूँ। मैंने अपनी अल्पज्ञता के कारण जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे तुम्हें सुनाती हूँ।

देवी ने दूत को अपनी प्रतिज्ञा सुनाई जिसे सुनकर दूत ने बड़ी धृष्टता की!

  • मेरी प्रतिज्ञा है कि जो भी प्राणी मुझे समर में पराजित करेगा, जो मेरे अभिमान का खण्डन करेगा तथा
  • जो मेरे ही समान पराक्रमी तथा साहसी होगा, वहीं मेरा स्वामी बन सकेगा ।
  • इसलिए महादैत्य शुम्भ या निशुम्भ स्वयं ही जब यहां आकर मुझे पराजित कर दें तो मेरा विवाह उनसे हो सकता है।
  • इसमें विलम्ब करना उचित नहीं है। तब देवी से दूत ने कहा- हे देवि! तुम मेरे सामने ऐसी अभिमानपूर्ण बातें न करो।
  • इस ब्रह्माण्ड में ऐसा कौन है जो शुम्भ-निशुम्भ के सामने खड़ा होने का साहस कर सके ।
  • अन्य निम्नकोटि के दैत्यों के सामने भी सारे देवता मिलकर युद्ध में पार नहीं पा सकते,
  • फिर तुम अकेली स्त्री होकर क्या कर सकती हो ? जिन शुम्भ आदि महापराक्रमी दैत्यों के आगे इन्द्रादि देवता भी
  • भय के कारण युद्ध-विमुख हो गये, उनके सामने तुम अकेली स्त्री होकर कैसे जा सकती हो ।
  • अतएव तुम मेरा ही कहना मानकर शुम्भ-निशुम्भ के पास चलो। ऐसा करने से तुम्हारी महत्ता की रक्षा होगी,
  • अन्यथा जब वे तुम्हारे केश पकड़कर बलपूर्वक घसीटते हुए ले जायेंगे, तब तुम्हे अपनी मर्यादा खो देनी पड़ेगी ।
  • दूत की बात सुनकर देवी ने उत्तर दिया- तुम्हारा कहना उचित ही है, शुम्भ निशुम्भ निःसंदेह बलवान् और पराक्रमी दैत्य है,
  • किन्तु मैं क्या करूँ ? मैंने पहले बिना सोचे-समझे ही ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है कि उसे कैसे भंग करूँ ?
  • अतएव अब तुम वापस लौट जाओ और अपने स्वामी से मेरी कही हुई बातें आदर पूर्वक समझाकर कहो।
  • उसके बाद वे जैसा उचित समझेंगे वैसा करेंगे ।

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य

(श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र) में वर्णित दूत-संवाद नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र (छटवां अध्याय) धूम्रलोचनवध कथा!

  • ध्यान– मैं, सर्वज्ञेश्वर भैरव के अंक की निवासिनी परम श्रेष्ठ पद्मावती देवी की आराधना करता हूँ।
  • देवी नागराज के आसन पर आसीन हैं, नागों के फणों में शोभित होनेवाली मणिमाला से उनका शरीर भासित हो रहा है।
  • उनके अंगों की दीप्ति सूर्य के समान है और तीन नेत्र उनके सौन्दर्य का वर्धन कर रहे हैं।
  • उनके हाथों में माला, कुम्भ, कपाल और कमल हैं तथा उनके मस्तक में अर्द्धचन्द्राकार मुकुट शोभायमान हो रहा है
  • ऋषि कहने लगे– देवी के मुख से ऐसी बात सुनकर दूत को बहुत ही आश्चर्य हुआ
  • और उसने दैत्यराज के पास जाकर विस्तारपूर्वक समाचार कहा ।
  • दूत से ऐसा उत्तर सुनकर वह दैत्यराज अत्यन्त क्रोधित हो उठा और अपने सेनानायक धूम्रलोचन से कहा-
  • धूम्रलोचन! तुम अतिशीघ्र अपनी सेना के साथ जाकर उस दुष्ट स्त्री का केश बलपूर्वक खींचते हुए यहाँ उठा लाओ ।
  • उसका रक्षक यदि यक्ष, गन्धर्व, देवता आदि कोई भी हो तो तुम उसे अवश्य ही मार डालना ।
  • तब ऋषि ने कहा- शुम्भ का आदेश पाकर वह धूम्रलोचन अपनी साठ हजार सेना के साथ वहाँ सेतुरन्त ही चल पड़ा
  • वहाँ पहुँचकर उसने हिमालय पर निवास करनेवाली देवी को देखा और ललकार कर आदेश भरे स्वर में कहा।

देवी द्वारा धूम्रलोचन का मारा जाना !(श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • धूम्रलोचन ने आदेश भरे स्वर में कहा-अरी! तू मेरे स्वामी शुम्भ-निशुम्भ के पास चल ।
  • यदि इस समय तुम स्वेच्छा से मेरे साथ नहीं चलेगी तो मैं तुम्हारे केश पकड़कर घसीटते हुए जबरन तुम्हें ले चलूँगा।
  • तब देवी ने उससे कहा- तुम दैत्यराज के आदेश से आये हो और तुम स्वयं भी बलवान् हो ।
  • तथा तुम्हारे साथ इस समय विशाल-वाहिनी भी है। ऐसी अवस्था में यदि तुम मुझे बलात् भी ले चलोगे तो मैं तुम्हारा क्या बिगाड़ सकूँगी ?
  • ऋषि ने कहा- देवी के उत्तर से धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ पड़ा।
  • तब देवी अम्बिका ने ‘हुँ’ शब्द का उच्चारण करके उसे भस्मीभूत कर डाला।
  • तत्पश्चात् क्रुद्ध हुई उस विशाल सेना ने देवी पर आक्रमण कर दिया।
  • फिर अम्बिका और राक्षसी सेनाओं में तीक्ष्ण बाणों, शक्तियों तथा फरसों का युद्ध आरम्भ हो गया।
  • इतने में ही देवी का वाहन सिंह भी क्रोध से गर्जन करके अपने गरदन के बालों को हिलाता हुआ असुरों की सेना में कूद पड़ा।

देवी के वाहन सिंह ने धूम्रलोचन की दैत्यों की सेना का विनाश कर दिया!

  • उस सिंह ने कुछ राक्षसों को पंजों के खरोच से, कितनों को अपने जबड़ों से विदीर्ण करके और
  • कितनों को धराशायी करके ओष्ठ की दाढ़ों का प्रहार करके मार डाला ।
  • कितने दानवों का उस सिंह ने अपने नाखूनों से पेट फाड़ दिया,
  • कितनों का सिर थप्पड़ मार-मार कर धड़ से अलग कर दिया ।
  • कितनों की भुजाएँ और मस्तक उसने काट खाये तथा अपनी गरदन के बाल हिलाते हुए,
  • उसने कितनों के ही पेट चीरकर उनके रक्तपान कर डाले अत्यन्त क्रोधित देवी के उस वाहन महाबली सिंह ने
  • क्षणमात्र में ही सारी दानवी सेना का अन्त कर दिया ।
  • शुम्भ राक्षस को जब यह समाचार मिला कि युद्ध में धूम्रलोचन मारा गया और उसकी सेना सिंह के द्वारा नष्ट हो गयी ।
  • तब वह अत्यन्त कुपित हुआ। क्रोध में आकर उसके अधरोष्ठ कंपित हो उठे।
  • उसने चण्ड-मुण्ड नामक दो महाबली दैत्यों को आदेश दिया हे चण्ड-मुण्ड! तुम लोग अपनी विशाल सेना लेकर जाओ
  • और उस देवी को घसीटकर अथवा उसे बाँधकर पकड़ लाओ। यदि इस प्रकार उसका आना कठिन हो

तो उस पर समस्त दानवी सेना के शस्त्रों का प्रहार करके वहीं पर वध कर देना ||२२-२३॥ उस दुष्टा की हत्या हो जाने तथा सिंह के मारे जाने पर उस अम्बिका को पाश से बद्ध करके यहाँ तुरन्त ही लौट आओ ॥२४॥

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण सावर्णिके मन्वन्तर कथा के अन्तर्गत देवी महात्म्य (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र) में वर्णित

सेनापति शुम्भ-निशुम्भ एवं धूम्रलोचन-वध नामक छठा अध्याय समाप्त हुआ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र सातवां अध्याय चण्ड मुण्ड वध कथा।

  • ध्यान– मैं मातंगी देवी का चिन्तन करता हूँ। वे रत्नजटित सिंहनाद पर विराजमान होकर बोलते हुए
  • तोते के मधुर शब्द को श्रवण कर रही हैं। वे श्याम वर्ण वाली देवी अपने एक पाद कमल पर रख कर
  • मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण किये हुए हैं। कहार फूलों की माला पहने हुए वे वीणावादन कर रही हैं।
  • उनके अंग में कंचुकी कसी हुई है। वे लाल रंग की साड़ी धारण कर हाथ में शंखपात्र लिये हैं।
  • उनके मुख पर मधु के हलके नशे का आभास हो रहा है और उनके ललाट में बिन्दी लगी हुई है।
  • ऋषि ने कहा- इसके पश्चात् शुम्भ दैत्य के आदेश से वे चण्ड-मुण्ड नामक दैत्य
  • अपनी चतुरंगिणी (हाथी, घोड़े, रथ, पैदल) सेना को अस्त्र-शस्त्र से सज्जित करके चल पड़े ।
  • वहाँ पहुँच कर पर्वतराज हिमालय स्वर्णमय शिखर के ऊपर सिंह पर आरूढ़ देवी को देखा।
  • वे मन्द हास्य कर रही थी। उन देवी को देखकर दानवी सेना उन्हें पकड़ने के लिए झपट पड़ी।
  • किसी राक्षस ने धनुष उठाया, तो किसी ने म्यान से तलवार खींच ली और कुछेक देवी के पास आकर खड़े हो गये ।

देवी का चण्ड मुण्ड की राक्षसी सेना से युध्द! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • तब अम्बिका ने उन पर अत्यन्त क्रोध प्रकट किया, उस समय क्रोधानल में दग्ध होने के कारण उनका मुख काला दिखाई पड़ने लगा।
  • उनको भौहें तन गयो और वहाँ से विकरालमुखी काली का प्रादुर्भाव हुआ। उनके हाथ में तलवार और पाश था ।
  • वे चीते के चमड़े की साड़ी पहने नरमुण्डों की माला से विभूषित होकर हाथ में विचित्र प्रकार की तलवार धारण किये हुए थीं।
  • उनके शरीर का मांस सूखकर केवल अस्थिपंजर शेष रह गया था, जिसके कारण उनकी आकृति बड़ी ही डरावनी लग रही थी ।
  • उनका मुख-गह्वर बहुत विशाल था, जीभ लप लप करने के कारण वे बहुत ही भयंकर जान पड़ रहीं थीं।
  • उनके नेत्र भीतर की ओर गड्ढे में धंसे हुए और रक्तिम थे, वे भयंकर गर्जना से सभी लोकों को कम्पित कर रही थी।
  • वे कालिका देवी बड़े-बड़े असुरों का वध करती हुई प्रबल वेग से आसुरी सेना पर टूट पड़ी ।
  • और उन सबको अपना ग्रास बनाने लगी। वे देवी पार्श्वरक्षकों, अंकुशधारी महावती, बड़े-बड़े योद्धाओं
  • और घण्टाघारी कितने ही विशालकाय हाथियों को एक हाथ से पकड़ कर मुँह में निगल लेती थी ।

युध्द में देवी विकराल काली का रूप धरकर दैत्य सेना पर टूट पड़ीं!

  • इसी प्रकार घोड़े, रथ और सारथि सहित रथी सैनिकों को मुँह में डालकर वे बहुत ही भयानक आवाज में चबा रही थीं
  • किसी के बाल खींचकर किसी का गला दबोचकर, किसी को पैरतले रौंदकर और किसी को छाती के धक्के से
  • भूमि पर गिराकर यमलोक भेज देती थी । वे दैत्यों द्वारा निक्षिप्त बड़े-बड़े अखों को मुँह से पकड़कर ,
  • दाँतों से चूर-चूर कर डालती थीं । काली ने उन बलशाली, दुराचारी दैत्यों की समस्त सेना को मसल दिया,
  • कुछेक को खा गयी और कितने को ही वहाँ से खदेड़ दिया कोई तलवार की मार से मार डाले गये,
  • कोई खट्वांग (बहुत बड़ी तलवार) से पीटे गये और कितने ही नुकीले दाँतों से पिसकर मारे गये ।
  • इस प्रकार देवी ने क्षणभर में उस आसुरी सेना का संहार कर डाला।

विकराल काली के साथ भीषण युद्ध में चण्ड मुण्ड मारे गए! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • यह देखकर चण्ड उन विकराल काली की ओर दौड़ पड़ा । फिर महादैत्य मुण्ड ने बाणों की वर्षा करके
  • तथा हजारों बार प्रयुक्त चक्रों से उन भयानक देवी को ढंक दिया ।
  • देवी के मुख में प्रविष्ट होते हुए वे अनेकों चक्र ऐसे जान पड़े मानो सूर्य के बहुत से मण्डल बादलों में समा गये हो।
  • तब भयंकर गर्जना करने वाली काली ने रोष में भीषण अट्टहास किया।
  • उस समय उनके विकराल मुख के भीतर कठिनता से दिखाई पड़ने वाले दाँतों की चमक से वे अत्यन्त उज्ज्वल दिखाई पड़ रही थी।
  • फिर तो देवी ने बहुत बड़ी तलवार से ‘हं’ शब्द का उच्चारण करके चण्ड के केश पकड़ लिये
  • और अपनी तलवार से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया । चण्ड को मरा देखकर मुण्ड देवी की ओर दौड़ पड़ा।
  • तब देवी ने क्रोधित होकर अपनी तलवार के आघात से उसे भी धराशायी कर दिया ।

चण्ड मुण्ड का वध करने से देवी का नाम चंडिका हुआ!

  • चण्ड-मुण्ड के मरते ही बची-खुची सेना भय से व्याकुल होकर रणभूमि से पलायित हो गयी ।
  • तब देवी चंड मुंड के कटे हुए मस्तक को हाथ में लेकर चंडिका के पास पहुंचकर विकट अट्टहास करके कहा।
  • हे देवि! मैंने इस महापशु चण्ड-मुण्ड को तुम्हें अर्पित किया है।
  • अब युद्धभूमि में तुम शुम्भ और निशुम्भ का स्वयं ही संहार करना।
  • ऋषि ने कहा- चण्ड-मुण्ड के मस्तक को देखकर कल्याणमयी चण्डी ने काली से मधुर स्वर में कहा-
  • देवि! तुम चण्ड और मुण्ड को लेकर मेरे पास आयी हो, इस लिए विश्व में तुम्हारी ख्याति चामुण्डा के नाम से होगी ।

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र

में वर्णित चण्ड-मुण्ड वध नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र आठवां अध्याय रक्तबीजवध कथा !

  • ध्यान- मैं अणिमा आदि सिद्धियों (सिद्धियाँ आठ मानी गयी हैं, यथा- अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्य,
  • प्राक्राम्य, ईशित्व और वशित्व) की रश्मियों से युक्त भवानी का ध्यान करता हूँ।
  • उनका शरीर रक्तवर्ण, नेत्र करुणा के तरंगों से युक्त तथा हाथों में पाश, अंकुश, बाण और धनुष शोभित हो रहे हैं।
  • ऋषि ने कहा – चण्ड-मुण्ड दैत्यों के मारे जाने पर दैत्यराज शुम्भ के मन में अत्यन्त क्रोध उत्पन्न हुआ
  • और उसने अपनी समस्त दानवी सेना को युद्ध के लिए एक साथ प्रस्थान करने की आज्ञा दी ।
  • शुम्भ ने कहा- आज उदायुध नामक छियासी दैत्य सेना नायक अपनी सम्पूर्ण सेनाओं के साथ युद्धभूमि में चलें ।
  • कम्बु नाम वाले दानवों के चौरासी सेनापति अपनी वाहिनी के साथ युद्धस्थल में जायें ।
  • पचास कोटि वीर्यकुल के और सौ धौम्रकुलोत्पन्न असुर सेनापति मेरी आज्ञा से युद्ध में रवाना हो जायें।
  • कालक, दौहृद, मौर्य और कालकेय दैत्य भी युद्ध के लिए मेरी आज्ञा से तुरन्त तैयार होकर समरभूमि में चल दें।

असुरपति शुम्भ अपने बड़े बड़े सैन्यदल के साथ देवी से युध्द करने चल पड़ा!

  • क्रूर शासक असुरपति शुम्भ इस प्रकार सबको आदेश देकर स्वयं सहस्रों बड़े-बड़े सैन्यदल के साथ युद्धके लिए रवाना हुआ ।
  • उसकी विशाल सेना को अपनी ओर बढ़ते देखकर देवी चण्डिका ने धनुष की टंकार पृथ्वी और आकाश को गुंजायमान कर दिया ।
  • तत्पश्चात् देवी के वाहन सिंह ने भी भयंकर शब्द से दहाड़ना कर किया।
  • फिर तो अम्बिका ने घण्टे के घोर रब से उस ध्वनि को और भी वर्धित कर दिया ।
  • धनुष टंकार, सिंह की गर्जना और घण्टे की ध्वनि से समस्त दिशाएँ गुंजित हो उठीं।
  • उस भीषण शब्द से काली ने अपने विकट मुख को और भी विस्तृत कर लिया ,
  • तथा इस प्रकार से वह पूर्ण विजयिनी बनीं। उस भीषण नाद सुनकर आसुरी सेनाओं ने चण्डिका, काली
  • तथा सिंह को क्रोधपूर्वक चतुर्दिक से घेर लिया। हे राजन् ! इसी समय असुरों के संहार तथा देवताओं के उत्थान के
  • लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवों की महान पराक्रम सम्पन्न शक्तियाँ भी उनके शरीरों से
  • निकलकर उन्हीं के रूप में देवी चण्डिका के पास गयीं ॥१
  • देवताओं के रूप, वेश, वाहन आदि के अनुरूप ही उनकी शक्तियाँ असुरों युद्ध करने के लिए आ गयीं ।

देवताओं की शक्तियां देवी चंडिका के पास युध्द के लिए आ गईं!

  • सर्वप्रथम हंस की सवारी पर बैठी हुई अक्षसूत्र और कमण्डलु से सुशोभित ब्रह्माजी की शक्ति प्रकट हुई, जिसे ब्रह्माणी कहा जाता है ।
  • महादेव की शक्ति बैल पर आरूढ़ होकर हाथों में श्रेष्ठ त्रिशूल धारण कर, शेषनाग का कङ्गन पहने, मस्तक में चन्द्ररेखा से सज्जित होकर वहाँ आ गयीं ।
  • कार्तिकेय की शक्तिरूपा जगदम्बिका उन्हीं के अनुरूप मयूर पर आरूढ़ हो हाथ में शक्ति लेकर उन दानवों से युद्ध करने के लिए आ गयीं ।
  • इसी प्रकर भगवान् विष्णु की शक्ति गरुड़ के वाहन पर विराजमान होकर शंख, चक्र, गदा, धनुष तथा खड्ग लिये वहाँ उपस्थित हुईं ।
  • अनुपम यज्ञवाराह का रूप धारण करने वाले भगवान् विष्णु की वह शक्ति भी वाराह (शूकर) शरीर धारण कर वहाँ आ गयीं ।
  • भगवान् नृसिंह की नारसिंही शक्ति भी उन्हीं के अनुरूप शरीर धारण करके वहाँ आ पहुँची।
  • उसकी गरदन में बालों के झोंके से आकाश की तारिकाएँ बिखर जाती थीं ।
  • इसी प्रकार इन्द्र की शक्ति हाथ में वज्र लिये ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर आयी। उस शक्ति के भी इन्द्र के समान ही सहस्र नेत्र थे।
  • तब उन समस्त देवशक्तियों से आवृत शिवजी ने चण्डिका से कहा- मेरी प्रसन्नता के लिए तुम अब तुरन्त इन असुरों का वध करो ।
  • तब देवी के शरीर से अत्यन्त भीषण और अति उग्र चण्डिका-शक्ति प्रकट हुई, जिसके द्वारा सैकड़ों शृंगालिनों की-सी आवाज हो रही थी ।

देवताओं की शक्तियों से सम्पन्न देवी चंडिका ने शिव जी को दूत बनाकर शुम्भ निशुम्भ को सन्देश भेजा!

  • उस अपराजिता देवी ने धूमिल जटा वाले महादेवजी से कहा- भगवन्! आप शुम्भ-निशुम्भ के पास दूत के वेश में जाइए ।
  • और उन दोनों दानवों से कहिए। उनके साथ ही युद्ध में उपस्थित अन्य दानवों को भी यह सन्देश सुनाइए ।
  • दैत्यों ! यदि तुम्हें जीने की चाह है तो पातालपुरी को लौट जाओ।
  • इन्द्र को त्रैलोक्य का राज्य प्राप्त हो और देवगण यज्ञांश का उपभोग करें ।
  • यदि बल के मद में तुम सभी युद्ध के इच्छुक हो तो आओ। मेरी योगिनियाँ तुम्हारे कच्चे मांसभक्षण से तृप्ति पावें ।
  • उस देवी ने भगवान् शिव को दूत का कार्य सौंपा था, इसलिए वह ‘शिवदूती‘ के नाम से जगत् में विख्यात हुई हैं
  • वे दैत्य भी शिवजी के मुँह से देवी की बात सुनकर कुपित हो गये और कात्यायनी की ओर लपके ।
  • तत्पश्चात् वे दैत्य क्रुद्ध होकर देवी पर बाण, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्रों की वर्षा करने लगे।

देवी विभिन्न रूपों में दैत्य सेना पर प्रहार करने लगीं!

  • तब देवी ने भी धनुष की टंकार करके दैत्यों द्वारा निक्षिप्त, बाण, शूल, शक्ति, परशु आदि को खिलवाड़ में ही काट दिया ।
  • फिर काली ने आगे आकर राक्षसों को शूल के आघात से चीरने लगीं और खट्वांग के द्वारा उनको विध्वंस करती हुईं रणस्थल में विचरण करने लगीं।
  • ब्रह्माणी भी अपना कमण्डलु लेकर जिस ओर निकल जाती थीं उधर ही जल छिड़क कर शत्रुओं को तेज तथा पराक्रमहीन कर देती थीं ।
  • माहेश्वरी ने त्रिशूल,वैष्णवी ने चक्र तथा कार्तिकेय ने अपनी शक्ति के प्रहार से दानवों का नाश प्रारम्भ कर दिया।
  • इन्द्राणी के वज्र से आहत होकर सैकड़ों दैत्य खून की धारा बहाते हुए भूमि पर गिर पड़े ।
  • वाराही-शक्ति ने कितने ही राक्षसों को थूथुन की चोट से नष्ट कर दिया।
  • दाढ़ों के अग्रभाग से कितने की छाती को बिद्ध कर दिया तथा कितने ही चक्र की चोट खाकर धरती पर गिर पड़े।
  • नारसिंही भी कितने ही दैत्यों को अपने नाखूनों से फाड़कर खा जाती
  • और सिंहनाद करके सम्पूर्ण दिशाओं को गुंजाती हुई रणभूमि में विचरण करने लगीं ।
  • कितने ही राक्षसगण शिवदूती के प्रबल अट्टहास से भयभीत होकर रणभूमि पर लोटने लगे।
  • उनके गिरते ही शिवदूती उन्हें अपना भक्ष्य बना लेती थीं।
  • इस प्रकार क्रुद्ध देवियों के द्वारा बड़े-बड़े असुरों का संहार होते देख दानवी सेना पलायित होने लगी ।

देवी और दैत्य रक्तबीज में युध्द!

  • मातृगणों से त्रस्त होकर युद्ध से विमुख को देखकर रक्तबीज नामक महा-असुर अत्यन्त कुपित होकर,
  • युद्धभूमि में आ पहुँचा उसके शरीर से खूनकी बूँद टपकते ही उसी आकार का दूसरा दैत्य उत्पन्न हो जाता था ।
  • महादैत्य रक्तबीज हाथ में गदा लेकर इन्द्रशक्ति के साथ युद्ध करने लगा।
  • तब ऐन्द्री ने अपने वज्र के प्रहार से उसे आहत कर दिया वज्र से आहत होकर उसके शरीर से पृथ्वी पर रक्त टपकने लगा,
  • जिससे उसी के समान अन्य दैत्य पैदा होने लग गये।उसके शरीर से रक्त की जितनी बूँदें पृथ्वी पर गिरी थी,
  • उतने ही दैत्य उत्पन्न हो गये, जो उसी के समान पराक्रमी थे वे नये उत्पन्न राक्षस मातृगणों के साथ भयंकर युद्ध करने लगे।
  • इन्द्राणी के वज्र प्रहार से उसका मस्तक आहत होकर खून बहाने लगा, जिससे हजारों नये दैत्य उत्पन्न होकर सामने आ गये।
  • वैष्णवी ने अपने चक्र से रक्तबीज पर प्रहार किया, फिर ऐन्द्री ने गदा की चोट से घायल कर दिया।
  • वैष्णवी के चक्र से घायल होने के कारण उसके शरीर से बहुत अधिक रक्तपात हुआ,
  • जिसके कारण इतने दैत्यों की उत्पत्ति हुई कि समस्त जगत् व्याप्त हो गया।

रक्तबीज के रक्त की बूंदों से अनेक दैत्य उतपन्न होने लगे! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र रक्तबीजवध)

  • कौमारी ने शक्ति, वाराही ने खड्ग और माहेश्वरी ने त्रिशूल चलाकर रक्तबीज को आहत कर दिया।
  • अत्यंत कुपित होकर रक्तबीज ने भी अपनी गदा से मातृशक्तियों पर आघात किया ।
  • शक्ति, शूल आदि के द्वारा घायल होने से उसके रक्त के द्वारा अगणित महादैत्य उत्पन्न हुए ।
  • इस प्रकार उस महादैत्य से उत्पन्न नये दैत्यों के द्वारा समस्त विश्व आच्छादित हो गया।
  • इस दृश्य को देखकर देवता लोग भयभीत हो गये,देवताओं को हतोत्साहित देख ,
  • चण्डिका ने शीघ्रता से काली से कहा– ‘चामुण्डे! तुम अपना मुख और भी अधिक विस्तृत करो ।
  • मेरे शस्त्राघात से बहकर खून से उत्पन्न होने वाले महादैत्यों को तुम अपने इस वेगवान मुख से भक्षण कर डालो।
  • इसी प्रकार रक्त से उत्पन्न होने वाले नये राक्षसों को तुम अपना भक्ष्य बनाकर रणस्थल में विचरण करती रहो।
  • ऐसा करते रहने से जब उसके शरीर का सम्पूर्ण रक्त बहकर निकल जायेगा तब वह स्वयं ही मृत्यु को प्राप्त होगा ।

देवी चामुंडा और देवी काली ने मिलकर रक्तबीज का वध कर डाला! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र रक्तबीजवध)!

  • देवी ने कहा- भयंकर दैत्यों को जब तुम चबा डालोगी तब दूसरे दैत्य उत्पन्न नहीं होंगे।
  • ऐसा कहकर चण्डिका देवी ने अपने शूल से रक्तबीज पर प्रहार किया।
  • और काली ने अपने मुख में उसका रक्त भर लिया। तब रक्तबीज ने चण्डिका पर गदा से आघात पहुँचाया।
  • किन्तु गदा के उस प्रहार से देवी को कोई क्षति नहीं हुई। रक्तबीज के घायल शरीर से बहुत अधिक रक्तपात हुआ।
  • किन्तु खून बहते ही चामुण्डा ने उस रक्त को अपने मुँह में भर लिया।
  • रक्त गिरने से काली के मुख में जो दैत्य उत्पन्न होते थे, उन्हें काली चबा डालती थीं और उसने रक्तबीज का खून भी पान कर लिया।
  • तब देवी ने रक्तबीज को वज्र, बाण, खड्ग (तलवार), ॠष्टि आदि के प्रहार से मार डाला।
  • हे राजन् । इस प्रकार शस्त्रों के समूह से आहत एवं रक्तहीन होकर महादैत्य रक्तबीज भूतल पर गिर पड़ा।
  • हे नरश्रेष्ठ । इसे देखकर देवों में हर्ष का समुद्र उमड़ पड़ा।
  • उन असुरों के रक्तपात के मद से उन्मत्त होकर सम्पूर्ण मातृ-समूह नृत्य करने लग गया।

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र में वर्णित रक्तबीज-वध नामक आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र नवम अध्याय निशुम्भ वध कथा!

  • ध्यान- उन अर्धनारीश्वर का रंग बन्धूक पुष्प और सुवर्ण के समान रक्त-पीतयुक्त है,
  • उनकी भुजाओं में सुन्दर स्फटिक की माला, पाश, अंकुश और वरद-मुद्रा सुशोभित है,
  • उनका आभरण अर्धचन्द्र तथा वे तीन नेत्रों से शोभायमान हो रहे हैं, ऐसे अर्धनारीश्वर की मैं शरण में हूँ।
  • राजा ने कहा- हे भगवन् ! आपने रक्तबीज बध सम्बन्धित देवी चरित्र का विचित्र माहात्म्य मुझे बताया।
  • रक्त- बीज की मृत्यु के अनन्तर क्रुद्ध शुम्भ और निशुम्भ ने आगे क्या किया ? अब मैं उनका वर्णन सुनना चाहता हूँ ।
  • तब ऋषि ने राजा से कहा- हे राजन्! युद्ध में रक्तबीज तथा अन्य राक्षसों के हनन से शुम्भ निशुम्भ के क्रोध की पराकाष्ठा हो गयी।
  • इस प्रकार अपनी विशाल दैत्यसेना का संहार होते देख क्रुद्ध निशुम्भ देवी की ओर दौड़ पड़ा।
  • उसके साथ ही दानवों की प्रमुख सेना थी। उसके आगे-पीछे तथा पार्श्व-भाग में बड़े बड़े अंगरक्षक दैत्य थे,
  • जो कुपित होकर अपने होंठ काटते हुए देवी को मार डालने के उद्देश्य से आये ।
  • महाबली शुम्भ भी अपनी समस्त सेना के साथ मातृगणों से युद्ध करने के पश्चात् चण्डिका का बध करने के लिए आ पहुँचा ।
  • इसके अनन्तर शुम्भ-निशुम्भ का घमासान युद्ध देवी के साथ होने लगा।
  • वे दोनों महाबलवान् दैत्य मेघों की तरह अपने बाणों की देवी पर भीषण वर्षा कर रहे थे।
  • उन दोनों के निक्षिप्त बाणों को चण्डिका ने अपने बाणों से काटकर शस्त्रों द्वारा उन राक्षसों के अंगों को पीड़ित कर दिया ।
  • तब निशुम्भ ने तेज धारवाली तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर देवी के वाहन सिंह के मस्तक पर आघात किया।

देवी और दैत्य निशुम्भ में घमासान युध्द छिड़ गया (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • अपने वाहन सिंह के प्रहारित होने पर देवी ने क्षुर नामक बाण के द्वारा निशुम्भ की उस तलवार को काट गिराया।
  • तथा अष्टरजत जड़ित ढाल को भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया। ढाल और तलवार से रहित होकर उस दानव ने शक्ति का प्रयोग किया।
  • किन्तु चक्र के द्वारा देवी ने उस शक्ति को दो खण्ड कर दिये तब निशुम्भ क्रोध से तिलमिला उठा
  • और देवी का वध करने के लिए अपना शूल संभाला किन्तु देवी ने उस शूल को मुक्के की मार से ही चूर्ण कर डाला ।
  • तब उसने अपनी गदा को घुमाकर देवी पर आघात किया परन्तु वह गदा देवी के त्रिशूल से कटकर नष्ट हो गयी।
  • इसके अनन्तर वह दैत्य हाथ में फरसा लेकर देवी की ओर बढ़ा।
  • तब देवी ने अपने बाणों की वृष्टि से उस दैत्य को धराशायी कर दिया ।
  • अपने पराक्रमी भाई को धरती पर गिरते देख शुम्भ अत्यन्त क्रोधित होकर देवी को मारने के लिए दौड़ा।
  • अपनी आकाशव्यापी लम्बी अष्टभुजाओं से उक्त वह दैत्य रथ पर आयुधों से सुसज्जित होकर शोभित होने लगा ।
  • उसे आते देखकर देवी ने अपना शंखनाद और धनुष की प्रत्यंचा द्वारा रणस्थल में घोर टंकार किया।

देवी और शुम्भ के मध्य भयंकर युध्द होने लगा!

  • इसके पश्चात सम्पूर्ण दैत्य-सेना के तेज को नष्ट करने वाले घण्टे के बाद से समस्त दिशाओं को गुंजायमान कर दिया।
  • जिस सिंह की गर्जना को सुनकर बड़े-बड़े मदमत्त गजराज भी सहम जाते थे,
  • उस देवी-वाहन सिंह ने अपनी दहाड़ से दशों दिशाओं को कँपा दिया।
  • तब काली ने आकाश में छलांग लगाकर अपने दोनों हाथों से पृथ्वी पर प्रहार किया।
  • उस क्रिया में ऐसा भयंकर शब्द उत्पन्न हुआ, जिसमें पहले के सभी शब्द उसमें विलीन हो गये ।
  • तब शिवदूती ने असुरों के लिए अशुभ अट्टहास करके सब राक्षसों का दिल दहला दिया,
  • परन्तु इन सबसे शुम्भ को अत्यन्त क्रोध हुआ । उस समय देवी ने शुम्भ को लक्ष्य करके कहा- ‘ओ दुरात्मन् !
  • खड़ा रह खड़ा रह तब आकाशमार्ग में खड़े सभी देवगण देवी की जय-जयकार करने लगे ।
  • तब शुम्भ ने ज्वालाओं से लपलपाती हुई अत्यन्त भीषण शक्ति चलायी।
  • अग्निमयी पर्वत के सदृश उस भयंकर शक्ति को देवी ने बड़े भारी लुआठी दूर कर दिया ।

देवी के प्रहार से दैत्य शुम्भ चेतनाहीन हो गया! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • उस समय शुम्भ के सिंहा से त्रैलोक्य गूँज उठे। हे राजन् । उसको ध्वनि से ऐसा प्रतीत हुआ मानो बज्रपात हुआ हो,
  • जिसमें अन्य सभी शब्द समा गये ।शुम्भ तथा देवी के परस्पर चलाये हुए बाणों को दोनों प्रतिद्वन्द्रियों ने
  • अपने बाणों द्वारा सैकड़ों और हजारों टुकड़े कर डाले। तब क्रुद्ध होकर चण्डिका देवी त्रिशूल से प्रहार किया।
  • उस आघात को सहन न कर सकने के कारण शुम्भ दैत्य चेतनाहीन होकर भूमि पर गिर पड़ा ।
  • इतने में ही निशुम्भ की चेतना लौट आयी और उसने बाणों की वर्षा करके देवी, काली तथा उनके वाहन सिंह को घायल कर दिया ।
  • फिर उस असुरराज ने अपने दस हजार हाथों को पैदा करके चक्रों के आयात से देवी को आच्छादित कर डाला।
  • तब असह्य पीड़ा निवारिणी देवी दुर्गा ने क्रुद्ध होकर अपने बाणों से उन चक्रों तथा बाणों को काट दिया।
  • तब देवी के इस अतुलनीय शौर्य को देखकर निशुम्भ अपने सैन्यदल के साथ चण्डिका का वध करने के उद्देश्य से हाथ में गदा लेकर बहुत वेग से उन पर झपटा।
  • देवी ने अपने तीक्ष्ण तलवार से उसकी गदा को काट दिया। गदा नष्ट होते ही उसने हाथ में शूल धारण कर लिया।

देवी द्वारा दैत्य निशुम्भ का वध!( श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • देवताओं के पीड़क शुम्भ को हाथ में शूल लेकर आते देख चण्डिका ने बड़े वेग से अपना शूल चलाकर उसके वक्ष को विद्ध कर दिया ।
  • शूल से छाती छिद जाने पर, उसी के समान महाकाय दैत्य उसको छाती से निकल कर,
  • खड़ी रह खड़ी रह’ कहता हुआ बोलने लगा । उस निकलते हुए दैत्य की बात पर देवी अट्टहास कर उठीं
  • और तलवार से उसका सिर काट गिराया, तब वह दैत्य भूमि पर गिरकर ढेर हो गया।
  • तत्पश्चात् सिंह अपनी दाढ़ों से उस दैत्य की गरदन चबाने लगा, वह दृश्य बहुत ही डरावना प्रतीत हो रहा था।
  • उधर काली तथा शिवदूती ने भी दूसरे दानवों को खाना शुरू कर दिया।
  • कौमारी की शक्ति से विदारित होकर कितने ही महादानव नाश को प्राप्त हुए।
  • ब्रह्माणी के मन्त्रपूत जल के द्वारा कितने ही दैत्य निषभ होकर भाग गये ।
  • कितने ही दानव माहेश्वरी के त्रिशूल से छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो गये।
  • वाराही के थूथुन की मार से किनकी पसली चूर-चूर हो गयी वैष्णवी ने अपने चक्र के प्रहार से राक्षसों के खण्ड-खण्ड कर डाले।
  • ऐन्द्री के हाथ चलाये हुए वज्र से आहत होकर कितनों को ही अपनी जान गंवानी पड़ी ।
  • उस युद्ध में कुछ दानव नष्ट हो गये, कुछ भाग खड़े हुए तथा अगणित राक्षस काली, शिवदूती सिंह के द्वारा काल-कवलित हो गये ।

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर- कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र में वर्णित निशुम्भ-वध नामक नव अध्याय समाप्त हुआ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (उत्तर चरित्र) दसवां अध्याय (शुम्भ वध )!

  • ध्यान- जिनका वर्ण तप्त सोने के सदृश है, सूर्य, चन्द्र और अग्नि ही उनके तीन नेत्र हैं,
  • तथा वे अपने कमलों में धनुष-बाण, अंकुश, पाश और शूल धारण किये हुए हैं,
  • ऐसे अर्धचन्द्रा-कार राशिभूषित मस्तक वाली शिवशक्ति स्वरूपिणी भगवती कामेश्वरी देवी का मैं हृदय में ध्यान करता हूँ।
  • ऋषि ने कहा- हे राजन्! अपने प्राणप्रिय भाई निशुम्भ को मृत तथा सारी सेना का विनाश देखकर,
  • शुम्भ ने क्रोधपूर्वक कहा- दुष्टा दुर्गे! तू अपने बल से गर्वित होकर मिथ्या अभिमान न कर।
  • तू बड़ी स्वाभिमानिनी बनी फिरती है, किन्तु दूसरी स्त्रियों के बल पर लड़ाई लड़ रही है ।
  • तब देवी ने कहा- ओ दुष्ट! मैं नितान्त अकेली ही हूँ। देख, ये सब मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतएव मुझमें ही सन्निहित हो रही है।
  • तत्पश्चात् ब्रह्माणी आदि सम्पूर्ण देवियाँ अम्बिका देवी के शरीर में विलीन हो गयीं।
  • उस समय वहाँ पर केवल अम्बिका देवी ही विद्यमान रह गयीं ।
  • तब देवी ने कहा- मैं अपनी विभूतियों से अनेक रूपों में यहाँ प्रकट हुई थी।
  • अब उन सब आकारों को मैंने समेट लिया है। अब मैं अकेली ही युद्ध के लिए सन्नद्ध हूँ। तुम भी स्थिर भाव से तत्पर हो जाओ ।

देवी और शुम्भ में घमासान युद्ध प्रारम्भ हुआ! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • ऋषि ने कहा- सभी देवताओं और दानवों के समक्ष देवी और शुम्भ में घमासान युद्ध प्रारम्भ हुआ ।
  • उन दोनों प्रतिद्वन्द्वियों का युद्ध तीक्ष्ण शस्त्रों के प्रहार तथा बाणों की वर्षा के कारण बहुत ही भयंकर प्रतीत होने लगा
  • उस समय देवी के छोड़े हुए सैकड़ों दिव्याखों को शुम्भ ने अपने अस्त्रों द्वारा काट डाला ।
  • इसी प्रकार प्रत्युत्तर में देवी ने भी शुम्भ द्वारा निक्षेपास्त्रों को क्षणभर में ही अपने ‘हुँकार’ शब्द के उच्चारण मात्र से ही विनष्ट कर दिया ।
  • तब उस दानव ने अपने सैकड़ों बाणों को चलाकर देवी को ढँक दिया।
  • ऐसा देखकर कुपित देवी ने भी अपने बाण से उसके धनुष काट दिये ।
  • धनुष कट जाने पर दैत्यराज ने हाथ 5 में शक्ति उठा ली, किन्तु देवी ने अपने चक्र के द्वारा उस शक्ति को खण्डित कर दिया ।
  • तदनन्तर उस → दैत्य ने सैकड़ों चन्द्रमा की भाँति चमचमाती हुई ढाल तथा तलवार लेकर देवी पर आक्रमण कर दिया।
  • तब चण्डिका ने उसके आते ही अपने तीक्ष्ण बाणों से उस चमचमाती हुई बाल तथा तलवार को काट दिया ।
  • इसके बाद उस दानव के घोड़े और सारथि मृत्यु को प्राप्त हुए, धनुष तो उसका कट हो चुका था,
  • फिर तो अब उसने अम्बिका वध के लिए भयंकर मुद्गर हाथ में उठाया । उस मुद्गर की भी देवी ने अपने बाणों से काट दिया,
  • फिर भी वह दैत्य हिम्मत न हार कर केवल मुक्का बाँधकर द्रुत गति से देवी की ओर झपट पड़ा ।
  • उस दैत्य ने देवी के हृदय में अपने मुक्के से प्रहार किया, और देवी ने भी उसकी छाती में एक थप्पड़ मारा ।
  • देवी के इस थप्पड़ से वह भूमि पर गिर गया, किन्तु वह सँभलकर पुनः उठ खड़ा हुआ ।

दैत्य उछलकर देवी को आकाश में ले उड़ा और वहीं युध्द होने लगा! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • फिर वह एकाएक देवी पर उछल पड़ा और देवी को लेकर आकाश में उड़ चला।
  • तब देवी आकाश में निराधार रह कर ही उसके साथ युद्ध करने लगीं ।
  • उस समय आकाश में दोनों परस्पर युद्ध करने लगे। उनके इस युद्ध को देखकर ऋषि-मुनि विस्मित हो गये ।
  • फिर अम्बिका ने शुम्भ के साथ दीर्घकाल तक युद्ध करने के पश्चात् उसे घुमाकर भूमि पर पटक दिया।
  • पृथ्वी पर गिरने के पश्चात् वह दैत्य पुनः देवी से युद्ध करने के लिए द्रुत गति से दौड़ पड़ा ।
  • तब दैत्यराज शुम्भ को आते देखकर देवी ने त्रिशूल से उसकी छाती वेध कर उसे भूतल पर गिरा दिया ।
  • उस त्रिशूल के भयंकर आघात से आहत होकर उसके प्राण निकल गये
  • और वह समस्त सागरों, द्वीपों तथा पर्वतों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को आन्दोलित करता हुआ धरती पर आ गिरा ।

देवी के त्रिशूल से दैत्यराज शुम्भ मारा गया! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • उस दुरात्मा की मृत्यु से समस्त विश्व आह्लादित हो गया, आकाश निर्मल दिखाई पड़ने लगा ।
  • उत्पातसूचक ‘मेघ और उल्कापात सभी शान्त हो गये तथा नदियाँ भी अपने स्वाभाविक गति से प्रभावित होने लगीं ।
  • उस दैत्य का क्षय होने से सभी देवों को अपार हर्ष हुआ और गन्धर्वादि मधुर गान करने लगे ।
  • अन्य गन्धर्व वाद्यवादन करने तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।
  • पवित्र वायु बहने लगी, सूर्य की मलिनता दूर होकर प्रभा चमकने लगी ।
  • अग्निशाला बुझी हुई अग्नि प्रज्वलित हो गयी तथा समस्त दिशाओं में गूंजने वाले भीषण शब्द भी शान्त हो गये ।

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र में वर्णित शुम्भ-वध नामक दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (उत्तर चरित्र) ग्यारहवां अध्याय देवी स्तुति!

  • ध्यान- जिनके अंगों को कान्ति प्रातः कालीन बालसूर्य के सदृश है, चन्द्रमा के मुकुट से उनका मस्तक सुशोभित,
  • उभरे हुए स्तनों एवं तीन नेत्रों से युक्त, मुख पर मन्द हास्य, हाथों में वरद, अंकुश, पाश
  • एवं अभय मुद्रा शोभित हो रहे हैं, ऐसी भुवनेश्वरी देवी का मैं चिन्तन करता हूँ।
  • ऋषि ने कहा- देवी के द्वारा शुम्भ का वध होने पर इन्द्रादि देवता अग्निदेव को आगे करके कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे।
  • उस समय उन देवगणों की मनोवांछा पूर्ण होने से उनके मुख की कान्ति चमक रही थी
  • और उस प्रकाश से सम्पूर्ण दिशाएँ आलोकित हो रही थीं। देवताओं ने कहा- शरणापन्न की पीड़ा निवारक देवि!
  • हमारे ऊपर प्रसन्न होइए। सम्पूर्ण जगत् की जननी प्रसन्न होओ। हे विश्वेश्वरि । विश्व का त्राण करो।
  • हे देवि ! तुम्ही चराचर विश्व की अधिष्ठात्री हो । तुम्हीं इस जगत् की एकमात्र आधारभूता हो,
  • क्योंकि पृथ्वी के रूप में तुम्हारी ही अवस्थिति है। हे देवि! तुम्हारा पौरुष अलंघनीय है, तुम्हीं जल के रूप में स्थित होकर समस्त जगत् हो ।
  • तुम अनन्त बलशालिनी वैष्णवी शक्ति हो। इस जगत् की कारणरूपिणी परा माया हो। हे देवि! तुमने ही
  • इस सम्पूर्ण जगत् को मोह में डाल रखा है। तुम्हारी प्रसन्नता पाकर ही लोग पृथ्वी पर मोक्षलाभ करते हैं।

मोक्षदायिनी, कल्याणदायिनी मां जगदम्बा की स्तुति ! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • हे देवि ! समस्त विद्याएँ तुम्हारे भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। इस विश्व में जितनी भी नारियाँ हैं वे सब तुम्हारी ही प्रतिमूर्ति हैं।
  • जगदम्बे ! तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है, तुम्हारी स्तुति किस प्रकार हो सकती है ?
  • तुम सभी स्तवनीय पदार्थों से परे और परा वाणी हो जब तुम्ही सर्वस्वरूपा देवी होकर स्वर्ग तथा मोक्षदायिनी हो
  • तब इसी रूप में तुम्हारी स्तुति हो गयी । तुम्हारी स्तुति के लिए इससे बढ़कर दूसरी ओर कौन-सी बात हो सकती है।
  • समस्त प्राणियों के हृदय-प्रदेश में बुद्धिरूप बनकर निवास करने तथा स्वर्ग और मोक्ष देनेवाली नारायणि देवि!
  • तुम्हें हमारा नमस्कार है। क्रमशः कला, काष्ठा आदि रूप में परिणाम की ओर ले जानेवाली
  • तथा विश्व के उपसंहार में समर्थ नारायणी! तुम्हें मेरा नमस्कार है।
  • नारायणी ! तुम सभी मांगलिक वस्तुओं को देनेवाली मंगलमयी हो। तुम्हीं कल्याणदायिनी शिवस्वरूपा हो।
  • सभी पुरुषार्थों की प्रदानकर्त्री, शरणागतवत्सला, त्रिनयना एवं गौरी हो, तुम्हें मेरा प्रणाम है ।
  • तुम सृजन, पालन और संहार की शक्तिभूता सनातनी देवी, गुणाधार तथा सर्वगुण सम्पन्न हो, हे नारायणी! तुम्हें प्रणाम है।

नारायणी देवी की स्तुति (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र )

  • शरणागत असहायों पीड़ितों आदि की रक्षा में तत्पर रहनेवाली तथा
  • समस्त क्लेशनिवारिणी नारायणी देवी ! तुम्हें मेरा प्रणाम है। हे नारायणी ! तुम ब्रह्माणी के वेश में हंसों के विमान पर
  • बैठकर कुशमिश्रित जल का छिड़काव करती रहती हो, तुम्हें मेरा प्रणाम है।
  • माहेश्वरी रूप से त्रिशूल, चन्द्रमा एवं साँपों को धारण करनेवाली तथा बैल की पीठ पर बैठने वाली नारायणी
  • देवि! तुम्हें नमस्कार है । मयूरों और मुरगों से आच्छादित महाशक्ति धारिणी कौमारी रूपवाली निष्पापे नारायणि!
  • तुम्हें मेरा अभिवादन है। शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुषरूप श्रेष्ठ अस्त्रों को धारण करने वाली वैष्णवी
  • शक्तिसम्पन्ना नारायणी! तुम प्रसन्न हो और तुम्हें प्रणाम है । हाथ में भयानक चक्र और दाढ़ों पर पृथ्वी को उठाये वाराही
  • रूप वाली कल्याणमयी नारायणी ! तुम्हें नमस्कार है दैत्यों के वध के लिए भयंकर नृसिंहरूप से उद्योग करनेवाली
  • तथा त्रैलोक्य की रक्षा में तत्पर रहने वाली नारायणी । तुम्हें नमस्कार है ।

देवी चामुंडा की स्तुति (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • मस्तक पर किरीट और हाथ में महावज्र धारण करनेवाली, सहस्रों नेत्रों से युक्त होकर
  • उद्दीप्त प्रतीत वृत्रासुर का वध करने वाली, इन्द्रशक्ति स्वरूपिणी नारायणि देवि! तुम्हें प्रणाम है ।
  • शिवदूती बनकर दानवों की असंख्य सेना का संहार करनेवाली भयानक रूप बनाने
  • तथा विकट गर्जना करनेवाली नारायणि तुम्हे प्रणाम है । दाढ़ों के कारण विकट मुखवाली, मुण्डमाला से विभूषित
  • मुण्डमर्दिनी चामुण्डारूपिणी नारायणि! तुम्हें मेरा अभिवादन है ।
  • लक्ष्मी, लज्जा,महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि तथा महाअविद्यारूपा, नारायणि ! आपको नमस्कार है ।
  • मेधा, सरस्वती, श्रेष्ठा, ऐश्वर्यरूपा, पार्वती, महाकाली, संयमपरायणी तथा सबकी अधिष्ठात्री नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ।
  • सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सर्वशक्तिसम्पन्ना दिव्यरूपा दुर्गे देवि ! आप हमारी सभी भयों से रक्षा करें, तुम्हें नमस्कार है
  • हे कात्यायनी ! तीन नेत्रों से विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख सम्पूर्ण भयो से हमारा त्राण करें, तुम्हें हमारा प्रणाम है ।

माँ भद्रकाली की स्तुति (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • भद्रकाली ! ज्वाला की लपटों के कारण विकट प्रतीत होने वाला अत्यन्त भीषण और समस्त दानवों का संहारक
  • तुम्हारा त्रिशूल हमारी रक्षा करे, तुम्हें मेरा नमस्कार है ।
  • हे देवि ! सम्पूर्ण जगत् जिसको ध्वनि से व्याप्त दानवों को निष्प्रभ कर देता है, वह तुम्हारा घण्टा हम लोगों का कलुष
  • (पाप) से उसी प्रकार रक्षा करे जिस माता अपने पुत्रों की अशुभ कर्मों से रक्षा करती है ।
  • हे चण्डिके ! राक्षसों के रक्त और चर्बी से चर्चित हाथों में शोभित होने वाला खड्ग हमारा मंगल करे, हे देवी! तुम्हें हमारा प्रणाम है ।
  • हे देवि! तुम्हारी से समस्त रोगों का शमन होता है, क्रुद्ध होने पर मनोऽभिलषित इच्छाओं का नाश हो जाता है।
  • जो लोग शरणापन्न हो गये हैं, उन पर विपत्ति की कभी छाया भी नहीं पड़ती।
  • तुम्हारे शरणागत लोग अन्यों के बन जाते हैं। हे देवि ! अम्बिके! तुमने इन विधर्मी महादानवों का संहार अपने
  • स्वरूप को विभिन्न में विभाजित करके किया है, तुम्हारे सिवा अन्य कोई इसे नहीं कर सकता था ।

विश्वेश्वरी मातारानी की स्तुति (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • विद्याओं में ज्ञान को उद्भासित करने वाले शास्त्रों में तथा वेदों में तुम्हारे अतिरिक्त और किसका वर्णन है।
  • तुम्हारे सिवा दूसरी ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो इस जगत् को अज्ञानररूपी अन्धकार के कारण आच्छादित ममता
  • रूपी गर्त में सदैव भटकती रहे ।जहाँ दैत्य, भयंकर विषधर साँप, शत्रु लुटेरों की जमात और दावाग्नि हो,
  • वहाँ तथा समुद्र के बीच में साथ रहकर तुम विश्व का निरन्तर कल्याण करती रहती हो।
  • हे विश्वेश्वरि ! तुम विश्व की पालन पालनकर्त्री, विश्वरूपा और सम्पूर्ण विश्व की भारी हो।
  • तुम भगवान् विश्वेश्वर के लिए भी वन्द्य हो। जो लोग भक्तिभाव से तुम्हारे सामने मस्तक टेकते हैं,
  • वे निखिल विश्व के आश्रयदाता बन जाते हैं । हे देवि प्रसन्न हो। असुरों का वध करके तुमने जिस प्रकार शीघ्र ही हमारा उद्धार किया है,
  • उसी प्रकार सदैव हमें शत्रुभय से मुक्त कराओ। समस्त जगत् का पाप-ताप नाश करें।
  • उत्पात एवं पापों के परिणामस्वरूप उत्पन्न महामारी आदि उपद्रवों को शीघ्र ही निवारण करें ।

देवताओं की स्तुति सुन देवी प्रसन्न हो गईं।

  • विश्व की पीड़ा दूर करने वाली देवि! हम तुम्हारे चरणों में नतमस्तक हुए हैं, हमारे पर प्रसन्न होओ।
  • त्रिलोकवासियों की आराध्या परमेश्वरि सब लोगों को वर प्रदान करो।
  • देवी ने कहा- देवी ! मैं वर देने के लिए तत्पर हूँ। तुम अपना ईप्सित वर मुझसे प्राप्त कर लो।
  • संसार के कल्याणकारक वर को मैं अवश्य ही दूँगी । देवताओं ने कहा- हे सर्वेश्वरि !
  • तुम इसी प्रकार त्रैलोक्य की सम्पूर्ण विपत्तियों को निवारण करो और हमारे शत्रुओं का क्षय करती रहो ।
  • ऐसा सुनकर देवी ने कहा- वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाइसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो अन्य दानवों की उत्पत्ति होगी ।
  • तब मैं नन्दगोप की पत्नी यशोदा के गर्भ से अवतरित होकर विन्ध्याचल में जाकर रहूँगी और उन दोनों दैत्यों का नाश करूंगी ।
  • तदनन्तर मैं पृथ्वी पर भयंकर रूप से अवतार ग्रहण कर वैप्रचित्त नाम वाले असुरों का संहार करूंगी ।

माँ रक्तदंतिका का जन्म होना!

  • उन दैत्यों के भक्षणकाल में मेरे दाँत अनार पुष्प की तरह लाल हो जाएँगे ।
  • तब स्वर्ग में देवता और मृत्युलोक में मनुष्य गण सदैव मेरा स्तवन करते हुए मुझे ‘रक्तदन्तिका’ के नाम से सम्बोधित करेंगे।
  • तत्पश्चात् जब भूतल पर सौ वर्षों तक वृष्टि नहीं होगी और जल का अभाव रहेगा, तब मनुष्यों की स्तुति से मैं भूमि पर ‘अयोनिजा’ रूप में उत्पन्न होऊँगी।
  • उत्पत्ति के बाद शत नेत्रों से मुनियों को देखूँगी। तब मनुष्य ‘शताक्षी’ नाम से मेरा कीर्तन करेंगे ।
  • देवताओं ! उस समय मैं अपने शरीर से उत्पन्न शाकों द्वारा ही सम्पूर्ण जगत् का भरण-पोषण करूंगी।
  • वर्षा न होने तक वे शाक द्वारा ही प्राण धारण करेंगे । ऐसा करने पर पृथ्वी में ‘शाकम्भरी’ नाम से मेरी प्रसिद्धि होगी।
  • उसी अवतार में मैं दुर्ग नामक महादैत्य का संहार करूँगी। इससे मेरा नाम ‘दुर्गा देवी’ रूप में विख्यात होगा।
  • फिर जब मैं भीमरूपा बनकर मुनियों की रक्षा के लिए हिमालयवासी दानवों का भक्षण करूँगी,
  • उस समय सब मुनिजन भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाकर मेरी स्तुति करेंगे उस समय मेरा नाम ‘भीमा देवी के रूप में प्रसिद्ध होगा।
  • जब अरुण नामक दानव त्रैलोक्य में उपद्रव करेगा । तब मैं तीनों लोक के हितार्थ षट्पादयुक्त
  • अगणित भौरों का रूप धारण कर उसका संहार करूंगी ।उस समय सब लोग मुझे ‘भ्रामरी‘ के नाम से जानेंगे।
  • इसी प्रकार मैं दानवी उत्पात होने पर अवतार लेकर शत्रुओं का वध करती रहूँगी ।

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र में वर्णित देवी-स्तुति नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र बारहवाँ अध्याय (फलस्तुति)!

  • ध्यान- मैं त्रिनयना दुर्गा देवी का ध्यान करता हूँ। उनके अंगों की शोभा विद्युत् के समान है।
  • वे सिंह के कन्धों पर आसीन भयानक प्रतीत हो रही हैं। अनेक कन्याएँ हाथ में ढाल-तलवार लिये उनकी सेवा में खड़ी हैं।
  • उन्होंने अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किये हैं।
  • उनका स्वरूप तेजो मय अग्नि के तुल्य है तथा उनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट शोभित हो रहा है।
  • देवी ने कहा- हे देवताओं! जो कोई प्रतिदिन स्थिरचित्त से मेरा स्तवन इन स्तुतियों के द्वारा करेगा,
  • उसकी सारी विपदाओं को मैं निश्चित रूप से दूर कर दूंगी । जो मधु-कैटभ का विनाश, महिषासुर का वध
  • तथा शुम्भ निशुम्भ के संहार के वर्णन का पाठ करेंगे । एवं अष्टमी, नवमी तथा चतुर्दशी तिथि को एकाग्र मन से
  • भक्तिभाव से युक्त होकर मेरे इस उत्तम माहात्म्य को सुनेंगे, उन्हें पाप की छाया नहीं लगेगी।
  • उन पर पापजनित बाधाएँ भी नहीं आयेंगी, उनके घर में कभी निर्धनता का राज्य नहीं रहेगा
  • और न तो कभी उन्हें अपने प्रियजनों के वियोग का कष्ट ही उठाना होगा।
  • इतना ही नहीं, वरन् उन्हें शत्रु, लुटेरे, राजा, शस्त्र, अग्नि तथा जलराशि से भी श कभी भय उत्पन्न नहीं होगा ।
  • इसलिए सभी लोगों को शान्तभाव से भक्तिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य का पठन पाठन और श्रवण-मनन करना चाहिए। यह परम कल्याणप्रद है ।

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ महामारी का भी नाश करता है!

  • मेरा माहात्म्य माहामारी-जनित सभी उपद्रवों तथा दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों को शमन करने वाला है ।
  • मेरे जिस मन्दिर में विधिपूर्वक प्रतिदिन इस माहात्म्य का पाठ होता है, वहाँ मेरा सदा निवास रहता है ।
  • बलि, पूजन, हवन तथा महोत्सव के अवसरों पर मेरे इस चरित्र का पूर्णरूपेण पाठ तथा श्रवण करना चाहिए ।
  • कोई भी मनुष्य विधान को जानकर या अनजाने में ही मेरे उद्देश्य से जो बलि, पूजा या होमादि करेगा
  • उसे मैं सहर्ष स्वीकार करूँगी । शरत्कालीन दुर्गापूजन के समय जो कोई भी इस माहात्म्य को भक्तिभाव से श्रवण करेगा,
  • वह मेरे प्रसाद से सभी विपत्तियों से मुक्त होकर धन-धान्य और पुत्रादि से परिपूर्ण होगा इसमे तिलभर भी संशय नहीं है ।
  • मेरे इस माहात्म्य, उत्पत्ति की सुन्दर गाथाएँ तथा युद्ध कालीन पराक्रम के श्रवण मात्र से ही मनुष्य भयरहित हो जाता है ।
  • मेरे माहात्म्य के सुनने वाले व्यक्तियों के शत्रु नष्ट होते, उन्हें कल्याणपद प्राप्त होता एवं उनके कुल प्रफुल्लित रहते हैं ।

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से ग्रहजनित पीड़ा भी शांत होती है!

  • शान्तिकर्म में, अशुभ स्वप्न दर्शन होने पर तथा ग्रहजनित भयंकर पीड़ा होने में, मेरे इस माहात्म्य को सुनना चाहिए।
  • ऐसा करने से सभी बाधाएं तथा भयंकर ग्रह-पीड़ाएं शान्त होती हैं और मनुष्यों को अशुभ फलकारी स्वप्न शुभ फल देने वाला हो जाता है ।
  • यह माहात्म्य बालग्रहों से आक्रान्त शिशुओं के लिए शान्ति दायक तथा मनुष्यों के संगठन में पारस्परिक वैमनस्य
  • उत्पन्न होने पर उनमें मित्रता स्थापित कराने वाला सिद्ध होता है। इस माहात्म्य से सम्पूर्ण दुराचारियों के बल का क्षय होता है।
  • इसके पाठ से दानवों, भूतों तथा पिशाचों का नाश होता है मेरा यह माहात्म्य मेरे सान्निध्य की उपलब्धि कराने वाला है
  • उपासकों के द्वारा साल भर तक पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, दीप, गन्ध आदि श्रेष्ठ सामग्रियों द्वारा पूजन करने,
  • ब्राह्मणों को भोजन कराने, हवन करने, प्रतिदिन अभिषेक करने, नाना प्रकार के भोगों का अर्पण करने
  • तथा दान देने से मुझे उतनी प्रसन्नता नहीं होती जितनी इस उत्तम चरित्र का एक बार श्रवण करने से होती है।
  • इस माहात्म्य को सुनने से पाप-पुंजों का क्षय एवं आरोग्य लाभ होता है ।

माता की उत्तपत्ति का कीर्तन करने से, सब ओर से रक्षा करती हैं!

  • मेरी उत्पत्ति का कीर्तन करने से समस्त भूतों से रक्षा होती है तथा मेरा युद्ध सम्बन्धी चरित्र दुष्ट दानवों का संहारक है
  • इसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य निर्भय हो जाता है। हे देवताओं! तुमने और महर्षियों ने मेरी जो स्तुतियाँ की हैं ।
  • तथा ब्रह्माजी द्वारा की हुई स्तुतियाँ सभी कल्याणकारी बुद्धि देती हैं।
  • वन में, सुनसान स्थल में या दावाग्नि से घिर आने पर जन हीन स्थान में, लुटेरों के चक्कर में आ जाने पर शत्रुओं द्वारा बन्दी होने पर,
  • अथवा वन में सिंह, ब्याघ्र, जंगली हस्तियों के पीछा करने पर, राजाज्ञा से बन्धन या बधस्थल पर ले जाने के समय
  • अथवा समुद्र में यात्रा करते समय तूफान के कारण नाव डगमगाने पर। भयंकर युद्ध में शस्त्रों का आघात होने,
  • वेदना से पीड़ित होने, इतना ही नहीं, वरन् समस्त भीषण बाधाओं के सामने आने पर,
  • जो कोई इस चरित्र का स्मरण करता है, वह व्यक्ति संकट को पार हो जाता है। मेरे प्रभाव से सिंह आदि हिंसक जन्तु
  • नाश को प्राप्त होते तथा लुटेरे एवं शत्रु भी मेरे चरित्र का स्मरण करने वाले लोगों से दूर भाग जाते हैं ।

यह कहकर देवी अन्तर्ध्यान हो गईं!( श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • ऋषि ने कहा- ऐसा कहकर सब देवों के देखते-देखते ही पराक्रम वाली भगवती चण्डिका वहीं अन्तर्ध्यान हो गयी।
  • तब सभी देवता शत्रु के मारे जाने से यज्ञांश का उपभोग पहले की तरह निर्भय होकर करने लगे
  • और अपने अधिकार का उपयोग करने लगे। महाबलवान् दैत्य शुम्भ-निशुम्भ की मृत्यु के अनन्तर
  • शेष बचे-खुचे दैत्य पाताललोक को चले गये। हे राजन् । इस प्रकार भगवती अम्बिका शाश्वत और नित्य होते भी
  • बारम्बार अवतरित होकर भू-भार हरण करके संसार का रक्षण करती हैं । वे ही इस विश्व को मोहित करती,
  • जगत् की सृष्टि करती तथा प्रार्थना करने पर सन्तुष्ट हो विज्ञान और स्मृति प्रदान करती हैं ।

महामारी के रूप में प्रलयकाल में देवी महाकाली ही उतपन्न होती हैं!

  • हे राजन् ! महाप्रलय काल में महामारी स्वरूपिणी वे महाकाली ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।
  • समय-समय पर वे ही महामारी होती और वे ही स्वयं अजन्मा होते हुए भी सृष्टि के रूप में उत्पन्न होती हैं।
  • वे सनातनी देवी ही समय के अनुरूप समस्त जीवों की रक्षा करती हैं ।
  • मनुष्यों के उत्थानकाल में ही गृह में लक्ष्मी के रूप में निवास करती और उन्नति प्रदान करती हैं
  • और फिर वे ही पतनकाल में निर्धनता के वेश में विनाश का कारण बनती हैं ।
  • पुष्प, धूप, गन्ध आदि से विधिवत् पूजन करके उनका स्तवन करने से वे धन-धान्य, पुत्र, सद्बुद्धि तथा उत्तम गति को प्रदान करती हैं ।

इस प्रकार मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र में वर्णित फल-स्तुति नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र तेरहवाँ अध्याय (सुरथ तथा वैश्य को वर)

  • ध्यान- जिनके शरीर की कान्ति बालकालीन सूर्य की भाँति है, जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र तथा जो अपने
  • हाथों में पाश, अंकुश, वर एवं अभय की मुद्रा धारण करती हैं ऐसी उन शिवादेवी का मैं ध्यान करता हूँ।
  • ऋषि ने कहा- हे राजन! इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के श्रेष्ठ माहात्म्य का कथन किया।
  • इस जगत् की धारयित्री देवी का ऐसा ही प्रभाव है । उन्हीं के द्वारा विद्या अर्थात् ज्ञान का उदय होता है।
  • भगवान् विष्णु की मायास्वरूपा उन भगवती द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा अन्य विवेकशील लोग मुग्ध होते हैं,
  • इस समय भी मोहित हैं एवं आगे भी इसी प्रकार होते रहेंगे। महाराज तुम उन्हीं परमेश्वरी का शरण ग्रहण करो ।
  • अपने उपासकों को वे भोग, स्वर्ग तथा मुक्तिलाभ कराती हैं मार्कण्डेय मुनि ने कहा-मेधामुनि से ऐसा वचन सुनकर
  • राजा सुरथ ने उत्तम व्रतधारी उन महाभाग महर्षि को नमस्कार किया।
  • वे अत्यन्त ममता तथा राजभ्रष्ट होने के कारण बहुत क्षुब्ध हो उठे थे ।
  • महामुने! इसलिए विरक्ति के कारण वे राजा तथा वैश्य तत्क्षण तपस्या के लिये चले गये
  • और वे जगदम्बा के दर्शनार्थ नदी के तट पर तपसाधन करने लगे ।

राजा सुरथ तथा वैश्य की तपसाधना से देवी प्रसन्न हो गईं!

  • वे वैश्य देवीसूक्त का उत्तम जप करते हुए तपस्या में लीन हुए। ये दोनों ही नदी-तीर पर देवी की मिट्टी की प्रतिमा
  • स्थापित करके उनकी पुष्प, धूप और हवन आदि के द्वारा उपासना करने लगे।
  • उन्होंने सर्वप्रथम अपने आहार की मात्रा कम कर दी, तदनन्तर निराहार रहकर एकाग्रचित्त से देवी का चिन्तन करने लगे।
  • वे दोनों अपने शरीर के रक्त से सिंचित बलि चढ़ाते हुए निरन्तर तीन वर्षों तक संयमी होकर उपासना करते रहे ।
  • उन लोगों की उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर जगत् की धारयित्री चण्डिका देवी ने प्रत्यक्ष प्रकट होकर कहा ।
  • देवी ने कहा- राजन्! अपने कुल को प्रमुदित करने वाले वैश्य तुम लोगों की जो मनोवांछा हो, वहमुझसे माँग लो।
  • मैं तुम लोगों से प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हें सब कुछ दे सकूँगी ।मार्कण्डेयजी बोले- देवी की बात सुनकर
  • राजा ने दूसरे जन्म में अक्षय राज्य प्राप्त करने का वर माँगा तथा इस जन्म में भी शत्रुओं की समस्त सेना को
  • बलपूर्वक पराजित कर पुनः राज्य पर अधिकार जमा लेने का वरदान माँगा।
  • वैश्य अत्यन्त बुद्धिमान् मनुष्य था, उसका मन सांसारिक विषयों से विरक्त हो चुका था,
  • इसलिये उस समय उस वैश्य ने ममता और अन्धकार मिटाने वाले ज्ञान की प्राप्ति का वर माँग लिया ।

देवी ने राजा सुरथ और वैश्य को वर प्रदान किया और अन्तर्ध्यान हो गईं! (श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र)

  • तब देवी ने कहा- हे राजन् ! तुम अल्पकाल में ही शत्रुओं को जीतकर अपना राज्य पा लोगे।
  • अब वहाँ पर तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ।
  • मृत्यु के पश्चात् तुम सूर्य के अंश से जन्म लेकर इस पृथ्वी पर सावर्णिक मनु के नाम से प्रसिद्ध होओगे ।
  • हे वैश्यश्रेष्ठ ! तुमने जिस वर को पाने की मुझसे इच्छा जताया है, उसे भी मैं देती हूँ।
  • तुम्हें मोक्षप्राप्ति के लिए ज्ञान की उपलब्धि होगी।
  • मार्कण्डेयजी ने कहा- उन दोनों को इस प्रकार मनोभिलषित वरदान देकर तथा
  • उनके द्वारा अपनी स्तुति श्रवण कर देवी अम्बिका वहीं अन्तर्निहित हो गयीं।
  • देवी से इस प्रकार का वरदान पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ नामक राजा सूर्य के अंश से जन्म ग्रहण करके सावर्णि नामक मनु होंगे ।

इस प्रकार आचार्य पण्डित श्रीशिवदत्तशास्त्रिकृत ‘शिवदत्ती’ हिन्दी व्याख्या में मार्कण्डेयपुराण के सावर्णिक मन्वन्तर-कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ उत्तर चरित्र में वर्णित सुरथ तथा वैश्य को वरप्रदान नामक तेरहवां अध्याय समाप्त हुआ।

उपयुक्त विधि से दुर्गासप्तशती का पाठ पूर्ण कर हृदयादिन्यास और ध्यान कर देवीसूक्त का पाठ करें।

देविसूक्त को नीचे दिए लिंक पर सुने

https://youtu.be/scxgKGkWrdg

ऐसी ही अन्य जानकारी के लिए नीचे दी गई लिंक पर आये।

http://Indiantreasure.in

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2 thoughts on “श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (उत्तर चरित्र) की हिंदी व्याख्या! नवरात्रि में करें माता भगवती का ध्यान!

  1. काफ़ी मेहनत लगी होगी इसमें!!
    जय माता दी!🙏
    धन्यवाद🙏🙏

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