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Shikshaprad manoranjak baal kahaniyaan ; और चूसो गन्ना!

Shikshaprad manoranjak baal kahaniyaan ; Smt. Manorama Dixit, Mandla. संभवत: जबसे मानव समाज को सामाजिक जीवन जीने की समझ आयी. तब से कथा-कथन प्रारम्भ हुआ। दादी, नानी नन्ही पौध को उद्देश्यपरक रोचक कथाओं की गोद में सुला देती थीं। कल्पना की उड़ान को धरातल से जोड़ कहानी के कलेवर से सजा साहित्य का यह प्रारंभिक स्वरूप बाल-समाज में अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

मजे की बात यह है कि विश्व साहित्य में हिन्दी भाषा में लिखी प्रथम कहानी ‘रानी केतकी की कहानी” नर्मदाचल में अर्थात् हमारी इस माहिष्मती नगरी में ही कलमबद्ध हुई है। आज हम आपके लिए लाए हैं श्रीमती मनोरमा दीक्षित द्वारा लिखी गई Shikshaprad manoranjak baal kahaniyaan ; और चूसो गन्ना !

Shikshaprad manoranjak baal kahaniyaan ;

और चूसो गन्ना !

नर्मदा की तराई में बसे ग्राम धनगांव में चार दोस्त सुन्दरसिंह, लालसिंह, करतारसिंह एवं हसनूलाल रहते थे।

बड़े पक्के यार थे वे. क्योंकि चारों के चार अख्खड़ अफीमची थे।

प्रतिदिन सुबह नित्यकर्म से निवृत हो निकल पड़ते थे अपने अड्डे पर ।

करीब सौ सीढ़ियाँ चढ़कर एक छोटी सी मढ़िया के चबूतरे पर बैठकर उनकी बातचीत शुरू होती थी।

सुन्दरसिंह ने बात छेड़ी- “अरे यार घर में बड़ी कलह किटकिट होती है।

लालसिंह ने कहा- “कौन किटकिट करता है? “यार घरवाली चैन से जीने नहीं देती कहती है कुछ कमाओ,

कुछ करो सुन्दरसिंह ने जबाव दिया।

करतारसिंह ने हँसते हुए कहा- अरे ठीक ही तो कहती है भाभी चलो अपन कुछ प्लान बनाते हैं।

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हसनूलाल ने भी…

हसनूलाल ने भी उनके स्वर से स्वर मिलाते हुए कहा- “अरे भाई अपन चारों मिलकर खेती करेंगे।

जब फसल घर पहुंचेगी तो सभी खुश हो जायेंगे। अंत में यह निर्णय हुआ कि ये सामने बड़ा मैदान है ,

यहाँ जमीन अच्छी है, यहीं गन्ना लगाया जाये। हसनूलाल बोला- पहले कुँआ खोद लिया जाये,

क्योंकि गन्ना को सिंचाई बहुत लगती है। बातों-बातों में ही कुँआ खुद गया करतारसिंह बोला

“कुँये में तो खूब पानी है, चलो अच्छा ही हुआ। अब सबके मुँह बन्द हो जायेंगे। मै जुताई करें देता हूँ ,

सारे ढेला फोडे देता हूँ। बिल्कुल मक्खन जैसी जमीन हो गई, हसन सहित सभी ने इस सफलता पर ताली बजाई।

आधा दिन बीत गया था, अब सुन्दरसिंह की बारी थी। करतार बोला “अरे सुन्दर जल्दी से गन्ना बो दो

अच्छा बीज लपरा दिवारा के किसान से लाये हैं। वे बैठे-बैठे केवल मुंह बजा रहे थे, किसी ने किया कुछ भी नहीं।

लो बीज तो रोपित हो गया है, इसलिए अब पानी चलाना जरूरी है कुँये में मशीन डाल दो।

ये पाइप भी है स्प्रिंकलर से भी कभी सींचना है हसनू बोला “अब बस भी करो पूरा खेत तर हो गया है।

नशे की पेंग में झूलते हुए वे झपकने लगे। कुछ देर में वे चारों चबूतरे पर ही सो गये।

Shikshaprad manoranjak baal kahaniyaan अब दिन ढलने लगा….

अब दिन ढलने लगा था। ये चारों चटपटाकर उठे तो क्या देखते है कि उनकी फसल लहलहा रही है।

परन्तु यह क्या उनके गन्नों के बीच गाव वाले घुसकर गन्ना चूस रहे थे. अब तो वे आपे से बाहर हो गये।

सुन्दर बड़बड़ाया- अरे खून-पसीना एक करके फसल तैयार किये है।

और ये मुफ्तखोर आराम से रसीले गन्ना चूस रहे हैं। अब चारों दोस्तों का पारा चढ़ता जा रहा था।

उसमे हसनू कुछ सम्हल गया था अत यह बोला- ‘चलो इन सबको खेत से भगा देते हैं।

आज पहिली बार तो हमारा गन्ना चूस रहे हैं । परन्तु करतार सिंह को हसन की सलाह नहीं रूची।

उसने लालसिंह की ओर देखते हुए कहा- अरे ये बड़े भोले बाबा बन रहे हैं सीधे सादे..

जब तक इन्हें सजा नहीं दी जायेगी ये रोज गन्ना चूसंगे। अपने जानवरों को भी यहाँ घुसेड़ेगे,

मैं आज सजा देकर ही दम लूंगा।अब तक सारा धनगांव घोर अंधकार की गोद में सो गया था।

पूरा सन्नाटा हो गया था। बीच-बीच में कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। धीरे धीरे भोर होने लगी थी।

कौओं की काँव..

कौओं की कॉव कॉव और चिडियों की चहचहाहट सन्नाटे को भंग कर रही थी।

सार से गाय-भैसों के रंभाने की आवाज आ रही थी। करतारसिंह ने पास पड़े रद्दी कपड़े को लकड़ी में लपेट

तीन चार मशाल बना ली और लालसिंह को छोड़कर सभी ने गांव की फूस वाली झोपड़ियों में आग लगा दी।

कुछ ही पल में आग पूरे गांव में फैल गयी। गांव के लोग आँखे मलते अपनी झोपड़ियों से बाहर भागे।

उन्हें निकलकर भागते हुए देखकर वे लोग जोर से चिल्लाये “और चूसो गन्ना !

मुफ्त का माल हड़पने की सजा मिली है। सभी गाँव वाले आग बुझाने में लग गये थे।

मजे की बात है कि गाँव की उन फूस झोपड़ियों में वे चार झोपड़ी भी जल कर स्वाहा हो गयी थी.

जो चारों अफीमचियो की थी।

देखा बच्चो नशा कितना खराब होता है। नशे का दूसरा नाम है “नाश” तुम सदा इन बुराईयों से दूर रहना।

Shikshaprad manoranjak baal kahaniyaan ; Smt. Manorama Dixit, Mandla.

http://Indiantreasure.in

https://youtu.be/MsQc72eGyLE

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