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Rishi pancnami vrat ; vrat niyam, katha.

Rishi pancnami vrat ; vrat niyam, katha. भाद्रपद शुक्लपक्ष की पञ्चमी ‘ऋषिपञ्चमी’ कहलाती है। इस दिन किये जाने वाले व्रत को ऋषिपञ्चमी व्रत कहते हैं। यह व्रत जाने-अनजाने में किये गए सभी तरह के पापों के शमन के लिये किया जाता है। अतः स्त्री-पुरुष दोनों इस व्रत को करते हैं। इस व्रत में सप्तर्षियों सहित अरुन्धती का पूजन होता है, इसीलिये इसे ‘ऋषिपञ्चमी’ कहते हैं।

ऐसा माना जाता है कि संसार की सभी सुख सुविधाएं, विद्या तरक्की आदि को देने वाले यह सप्त ऋषि गण ही है। इन्हीं सप्त ऋषियों को प्रसन्न करने के लिए यह व्रत किया जाता है। आज हम आपको इस व्रत को करने के नियम और व्रत की कथा बताएंगे । अतः सभी सुखों को देने वाले सप्तऋषियों की कथा Rishi pancnami vrat ; vrat niyam, katha अवश्य पढ़ें ।

Rishi pancnami vrat ; vrat niyam,

  • ऋषिपंचमी व्रत का विधान इस प्रकार है। – इस दिन प्रातः काल से शाम तक उपवास किया जाता है।
  • दोपहर के समय पुनः स्नान करें। इसके बाद पञ्चगव्य का पान करना चाहिये।
  • उसके बाद गोबर से पूजा का स्थान चौकोर लीपना चाहिये।
  • अनेक रंगों से सर्वतो भद्र मण्डल बनाकर उस पर मिट्टी अथवा ताँबे का घट स्थापित करें।
  • उसे वस्त्र से लपेट कर उसके ऊपर ताँबे अथवा मिट्टीके बर्तन में जौ भरकर रखना चाहिये।
  • पञ्चरत्न, कुल, गन्ध और अक्षत आदि से पूजन करना चाहिये।
  • व्रत के आरम्भ में यह संकल्प करना चाहिये ;
  • “अमुकगोत्रा अमुकीदेवी स्वलावस्थायां अहं मम आत्मनो
  • गृह भाण्डादि स्पर्श दोष परिहारार्थं अरुन्धती सहित सप्तर्षि पूजनं करिष्ये।”
  • कलश के पास ही अष्टदल कमल बनाकर उसके दलों में कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि तथा
  • वसिष्ठ – इन सप्तर्षियों और वसिष्ठ पत्नी देवी अरुन्धती की प्रतिष्ठा करनी चाहिये।
  • इसके बाद सप्तर्षियों तथा अरुन्धती का षोडशोपचार पूर्वक पूजन करना चाहिये ।

Rishi pancnami vrat ; kya karen ?

  • इस दिन प्रायः लोग दही और साठी का चावल खाते हैं। नमक का प्रयोग नहीं किया जाता है।
  • हल से जुते हुए खेत का अन्न खाना भी मना रहता है। दिन में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिये।
  • कलश आदि पूजन सामग्री को ब्राह्मण को दान कर देना चाहिये।
  • पूजन के पश्चात् ब्राह्मण-भोजन कराकर ही स्वयं प्रसाद पाना चाहिये ।
  • इस व्रत को लगातार 7 वर्षों तक किया जाता है इसके पश्चात उसका उद्यापन कर सकते हैं।
  • जिसमें अपनी श्रद्धा और परिस्थिति के अनुसार सात स्वर्ण की मूर्तियां (सप्तऋषियों की )
  • या 7 गौ दान किया जाता है अथवा सांकेतिक रूप से सप्तऋषियों से संबंधित दान ब्राह्मणों को करके,
  • इस व्रत का समापन या उद्यापन किया जा सकता है।
  • पुराणों की मान्यता के अनुसार यह व्रत जीवन पर्यंत किया जाता है ।
  • किंतु विशेष परिस्थितियों में इसका उद्यापन 7 वर्ष में भी कर सकते हैं

Rishi pancnami vrat; vrat katha.

कथा इस प्रकार है . सत्य युग मे श्येनजित नामक एक राजा राज्य करता था।

उसके राज्य में सुमित्र नाम वाला एक ब्राम्हण रहता था जो वेदों का विद्वान था ।

सुमित्र खेती द्वारा अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसकी पत्नी जयश्री सती, साध्वी और पतिव्रता थी।

वह खेती के कामों में भी अपने पति का सहयोग करती थी। एक बार रजस्वला अवस्था मे अनजाने में उसने ,

घर का सब कार्य किया और पति का भी स्पर्श कर लिया। दैवयोग से पति-पत्नी का शरीरान्त एक साथ ही हुआ।

रजस्वला अवस्था में स्पर्शास्पर्श का विचार न रखने के कारण स्त्री ने कुतिया और पतिने बैल की योनि प्राप्त की।

परंतु पूर्व जन्म में किये गये अनेक धार्मिक कृत्य के कारण उन्हें ज्ञान बना रहा।

संयोग से इस जन्म में भी वे साथ-साथ अपने ही घरमें अपने पुत्र और पुत्रवधू के साथ रह रहे थे।

ब्राह्मण के पुत्र का नाम सुमति था। यह भी पिता की भाँति वेदों का विद्वान् था।

पितृ पक्ष में उसने..

पितृपक्ष में उसने अपने माता पिता का श्राद्ध करने के उद्देश्य से उसने पत्नी से कहकर खीर बनवायी और

ब्राह्मणों को निमन्त्रण दिया। उधर एक सर्प ने आकर खीर को विषाक्त कर दिया।

कुतिया बनी ब्राह्मणी यह सब देख रही थी। उसने सोचा कि यदि इस खीर को ब्राह्मण खायेंगे तो विष के प्रभाव से

मर जायेंगे और सुमति को पाप लगेगा। ऐसा विचार कर उसने सुमति की पत्नी के सामने ही खीर को छू दिया।

इस पर सुमति की पत्नी बहुत क्रोधित हुई और चूल्हे से जलती लकड़ी निकालकर उसकी पिटाई कर दी।

उस दिन उसने कुतिया को भोजन भी नहीं दिया। रात्रि में कुतिया ने बैल से सारी घटना बतायी।

बैल ने कहा कि आज तो मुझे भी कुछ खाने को नहीं दिया गया जबकि मुझसे दिन भर काम लिया गया।

सुमति हम दोनों के उद्देश्य से श्राद्ध कर रहा है और हमें ही भूखों मार रहा है।

इस तरह हम दोनों के भूखे रह जाने से तो इसका श्राद्ध करना ही व्यर्थ हुआ।

सुमति द्वार पर लेटा….

सुमति द्वार पर लेटा कुतिया और बैल की वार्ता सुन रहा था। वह पशुओं की बोली भली भाँति समझता था।

उसे यह जानकर अत्यन्त दुःख हुआ कि मेरे माता-पिता इन निकृष्ट योनियों में पड़े हैं।

वह दौड़ता हुआ एक ऋषि के आश्रम में गया और उनसे अपने माता-पिताके पशुयोनि में पड़ने का कारण और

मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने ध्यान और योगबल से सारा वृत्तान्त जान लिया।

उन्होंने सुमति से कहा कि तुम पति-पत्नी भाद्रपद शुक्ल पञ्चमी को ऋषिपञ्चमी का व्रत करो

और उस दिन बैल के जोतने से उत्पन्न कोई भी अन्न न खाओ। इस व्रतके प्रभावसे तुम्हारे माता-पिता की मुक्ति

हो जायगी। तब मातृ-पितृ भक्त सुमति ने ऋषिपञ्चमी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से उसके माता-पिता को

पशुयोनि से मुक्ति मिल गयी। यह व्रत शरीरके द्वारा अशौचावस्था में किये गये,

स्पर्शास्पर्श तथा अन्य पापों के प्रायश्चित्त के रूप में किया जाता है।

अतः जाने अनजाने में प्रत्येक व्यक्ति से किसी भी प्रकार का कोई पाप हो जाता है। इससे उत्पन्न होने वाले दोषों के निवारण के लिए सप्त ऋषियों से संबंधित यह Rishi pancnami vrat ऋषि पंचमी व्रत करने का विधान बताया गया है।

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https://youtu.be/P6P_qoyIMKo

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