पंचतंत्र की प्रारम्भ कथा Total Post View :- 257

Mitrabhed panchtantra ki prarambha katha.

Mitrabhed- Panchtantra ki prarambha katha- Shri Vishnu Sharma. पंचतंत्र की नीति कथाएं पांच तंत्रों (भागों) में बंटी हुई है। जिनमे से एक भाग मित्रभेद है जिसमे मित्रों में मनमुटाव व अलगाव की कहानियां हैं। इसका दूसरा तंत्र (भाग) मित्रलाभ या मित्र सम्प्राप्ति है। इस भाग में मित्र के लाभ से सम्बंधित कथाएं हैं। पंचतंत्र का तीसरा तंत्र (भाग) काकोलूकीयम है जिसमे उल्लू और कौवे की कथा बताई गईं हैं। चौथा तंत्र (भाग) लब्धप्रणाश है। लब्ध यानी हाथ लगी हुई चीज या वस्तु का हाथ से निकल जाना। अंतिम व पांचवा तंत्र (भाग) है अपरिक्षितकारक अर्थात जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहें। हड़बड़ी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए।

पंचतंत्र की इन कथाओं के माध्यम से नीतियों का ज्ञान व उनका उचित प्रयोग बताया गया है। यह कहानी प्रत्येक उम्र वर्ग के लिए लाभदायक हैं । अच्छी जानकारियों को दोहराते रहना चाहिए। जिससे भूला हुआ ज्ञान पुनर्जीवित हो जाता है। आज हम आपके लिए Mitrabhed panchtantra ki prarambha katha ; shri Vishnu Sharma. लाये हैं अवश्य पढें ।

Mitrabhed panchtantra ki prarambha katha ; shri Vishnu Sharma.

महिलारोप्य नाम के नगर में वर्धमान नाम का एक वणिक्‌-पुत्र रहता था ।

उसने धर्मयुक्त रीति से व्यापार में पर्याप्त धन पैदा किया था; किन्तु उतने से सन्तोष नहीं होता था;

और भी अधिक धन कमाने की इच्छा थी ।

छः उपायों से ही धनोपार्जन किया जाता है—भिक्षा, राजसेवा, खेती, विद्या, सूद और व्यापार से ।

इनमें से व्यापार का साधन ही सर्वश्रेष्ठ है । व्यापार के भी अनेक प्रकार हैं ।

उनमें से सबसे अच्छा यही है कि परदेस से उत्तम वस्तुओं का संग्रह करके स्वदेश में उन्हें बेचा जाय ।

यही सोचकर वर्धमान ने अपने नगर से बाहर जाने का संकल्प किया ।

मथुरा जाने वाले मार्ग के लिए उसने अपना रथ तैयार करवाया ।

रथ में दो सुन्दर, सुदृढ़ बैल लगवाए । उनके नाम थे -संजीवक और नन्दक ।

वर्धमान का रथ..(Mitrabhed panchtantra ki prarambha katha)

वर्धमान का रथ जब यमुना के किनारे पहुँचा तो संजीवक नाम का बैल नदी-तट के दलदल में फँस गया ।

वहाँ से निकलने की चेष्टा में उसका एक पैर भी टूट गया । वर्धमान को यह देख कर बड़ा दुःख हुआ ।

तीन रात उसने बैल के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा की । बाद में उसके सारथि ने कहा कि

“इस वन में अनेक हिंसक जन्तु रहते हैं । यहाँ उनसे बचाव का कोई उपाय नहीं है ।

संजीवक के अच्छा होने में बहुत दिन लग जायंगे । इतने दिन यहाँ रहकर प्राणों का संकट नहीं उठाया जा सकता ।

इस बैल के लिये अपने जीवन को मृत्यु के मुख में क्यों डालते हैं ?”

तब वर्धमान ने संजीवक की रखवाली के लिए रक्षक रखकर आगे प्रस्थान किया ।

रक्षकों ने भी जब देखा कि जंगल अनेक शेर-बाघ-चीतों से भरा पड़ा है ,

तो वे भी दो-एक दिन बाद ही वहाँ से प्राण बचाकर भागे और वर्धमान के सामने यह झूठ बोल दिया “स्वामी !

संजीवक तो मर गया । हमने उसका दाह-संस्कार कर दिया ।”

वर्धमान यह सुनकर बड़ा दुःखी हुआ, किन्तु अब कोई उपाय न था ।

इधर संजीवक…

इधर, संजीवक यमुना-तट की शीतल वायु के सेवन से कुछ स्वस्थ हो गया था ।

किनारे की दूब का अग्रभाग पशुओं के लिये बहुत बलदायी होता है ।

उसे निरन्तर खाने के बाद वह खूब मांसल और हृष्ट-पुष्ट भी हो गया । दिन भर नदी के किनारों को सींगों से पाटना

और मदमत्त होकर गरजते हुए किनारों की झाड़ियों में सींग उलझाकर खेलना ही उसका काम था ।

एक दिन…..

एक दिन उसी यमुना-तट पर पिंगलक नाम का शेर पानी पीने आया ।

वहाँ उसने दूर से ही संजीवक की गम्भीर हुंकार सुनी । उसे सुनकर वह भयभीत-सा हो सिमट कर झाड़ियों में जा छिपा

शेर के साथ दो गीदड़ भी थे – करकट और दमनक । ये दोनों सदा शेर के पीछे़ पीछे़ रहते थे ।

उन्होंने जब अपने स्वामी को भयभीत देखा तो आश्‍चर्य में डूब गए ।

वन के स्वामी का इस तरह भयातुर होना सचमुच बडे़ अचम्भे की बात थी ।

आज तक पिंगलक कभी इस तरह भयभीत नहीं हुआ था । दमनक ने अपने साथी गीदड़ को कहा –

’करकट ! हमारा स्वामी वन का राजा है । सब पशु उससे डरते हैं । आज वही इस तरह सिमटकर डरा-सा बैठा है ।

प्यासा होकर भी वह पानी पीने के लिए यमुना-तट तक जाकर लौट आया; इस डर का कारण क्या है ?”

करकट ने उत्तर दिया – “दमनक ! कारण कुछ भी हो, हमें क्या ? दूसरों के काम में हस्तक्षेप करना ठीक नहीं ।

जो ऐसा करता है वह उसी बन्दर की तरह तड़प-तड़प कर मरता है,

जिसने दूसरे के काम में कौतूहलवश व्यर्थ ही हस्तक्षेप किया था ।”

दमनक ने पूछा – “यह क्या बात कही तुमने ?”

करकट ने कहा – “सुनो!’…….

इस प्रकार पंचतंत्र की मित्रभेद की कथा प्रारंभ होती है, जिसकी अगली कथा है “बंदर और लकड़ी का खूंटा”

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