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Kahani- utha jaag musafir bhor bhai..

Kahani- utha jaag musafir bhor bhai..”स्नेहा” इस समय गर्मी की छुट्टियों में मामा के घर आयी थी। यहाँ उसकी दो मामा-मामियों के साथ ही नानाजी तथागत एवं नानीजी “आम्रपाली भी थी। इस घर में उसकी मौसी के बच्चे पार्थ और सत्यार्थ भी आये हुए थे। हम सभी भाई बहिन यही सोचते थे कि काश ये छुट्टी खतम ही न होती। नित्य नये व्यंजनों से हमारी थाल सजती थी जहाँ हमारी मौसी एक बड़ी थाल में सबको अपने हाथो से भोजन कराती थीं।

Kahani- utha jaag musafir bhor bhai..

Smt. Manorama Dixit

हमारे मामाजी के गाँव का शुद्ध घी दूर-दराज तक जाता था। घी के बड़े बड़े व्यापारी थे यहाँ।

मामाजी की “सार मे गौ माता बड़े सुख से रहती थीं अपने बच्चों के साथ वहाँ सीलिंग फैन लगा था

और ”रेडियो में गाने बजते थे। घर के दूध की खीर और मामाजी के खेत में पकने वाले तुलसी अमृत चाँवल में

घी की धार हम साल भर याद रखते थे तथा छुट्टियों में हम केवल और केवल “मामा के घर चलने की जिद करने लगते थे

छुट्टी लगने के पहिले दोनों मामियों का फोन निमंत्रण मिल चुकता था।

पापाजी से सहमति मिलते ही मामाजी की गाड़ी हमें लेने आ जाती थी।

हमारे नानाजी नानीजी का उत्साह देखते ही बनता था। वे ढेर सारे सुन्दर खिलौने, कहानी की सुन्दर पुस्तकें लाकर रखते थे।

घर के आमवृक्ष के नीचे बड़ा सुन्दर सीमेन्ट का रिपटना बना था।

हम आते ही खाना-पीना छोड़ दौड़-दौड़ कर रिपटने लगते थे। नीचे रेत बिछायी गयी थी ताकि हमें चोट न लगे।

पीछे के आँगन में लगे आम में झूला डाला गया था जिसमें हम सभी भाई-बहिन खूब पैगे मारते थे।

घर के दो पुराने आम में बड़े बड़े “दशहरी आम लटक रहे थे। हमारी नानीजी

“गदरे आमों को पेपर में लपेटकर पका लेती थीं। वहाँ रहते हुए हमें “दशहरी” के मधुर स्वाद से पूर्ण तृप्ति हो जाती थी।

अब क्या बताऊ, घर के मूंग की दाल घर का चाँवल, दूध, दही, घी और गुड़, क्या नहीं था यहाँ?

हम बड़े शहर से….

हम बड़े शहर से भागकर यहाँ गाँव में छुट्टियों मनाते थे। हमारी नानीजी हमे रोज रात को नयी-नयी कहानियाँ सुनाती थीं।

उनकी वह कहानी मुझे आज भी याद है एक बहुत धनवान सेठ था नाम था छदामीलाल, वह अत्यंत कजूस था।

अपने नौकरों-चाकरों को भी बडी किचकिच कर उनका मेहनताना देता था।

उनकी पत्नी माधुरी उतनी ही उदार थी। उसको अपने पति का
यह चीसपन बिल्कुल नहीं भाता था।

न तो वह गाय को एक रोटी देने देता और न भिखारियों को एक पैसा।

भिखारी को मुट्ठी भर अनाज न देकर उन्हें अपमानित करता था. “क्या तुम्हारे बाप यहाँ रख गये हैं जो लेने चले आते हो?

उसकी उदार स्वभाव वाली पत्नी उसे समझाती पर वह नहीं
मानता था।

आज वह बिना शाम का भोजन किये ही सो गया था क्योंकि
उसकी बेटी “निशा के हाथों से एक कटोरी तेल गिर गया था।

उसे थप्पड़ मारकर वह बड़बड़ाते हुए सो गया था। उस दिन गर्मी भी बहुत थी।

वह स्वप्न में पसीने से डूब गया था और स्वप्न में ही वह मिठाई की दुकान में जा पहुँचा,

पर खाने को हाथ बढाते ही बर्फी नीचे गिर गयी। हलवाई ने उसे एक थप्पड़ जड़ पीछे ढकेल दिया

क्योंकि उसके पास एक भी पैसा नहीं था। वह फटे कपड़े पहिने भीख माँग रहा था।

Kahani- utha jaag musafir bhor bhai..

वह जहाँ भी गया, उसे किसी ने न तो एक रोटी दी और न ही आटा या चॉवल

वह हार थक कर पसीना पोछने लगा। उसे प्यास भी लग गयीं थी उसके होठों पर पपड़ी पड़ गयी थी,

तभी एक नन्हीं बालिका ने उसे दो रोटी और गुड़ तथा पानी लाकर दिया। वह बहुत वृद्ध हो गया है,

उसकी छड़ी जिसे पकड़कर चलता था, वह भी मिठाई की दुकान में छूट गयी थी।

वह धीरे-धीरे वहाँ जाने लगा और छड़ी देखकर उसे उठाते हुए जोर-जोर से बड़बड़ाने लगा-

“हे राम! अब में क्या करू बिस्तर में कराहते और उठोलते हुए देख सेठानी की नींद खुल गयी।

वह चिल्ला रहा था- “मैं भिखारी हो गया. मैं भिखारी हो गया। सेठानी माधुरी ने उसे हिलाकर जगाया और बताया

कि वह क्या चिल्ला रहा था। अपने स्वप्न को याद कर वह बहुत शर्मिन्दा हुआ

और उस दिन से वह गौ माता को रोटी भिखारियों को कपड़े, ठण्ड में कम्बल और भीख में भोजन देने लगा।

रोज शाम को उसके घर खिचड़ी का भण्डारा होने लगा था।

नानीजी की वह कहानी हम सबको बहुत भायी। ऐसे सुन्दर थे वे दिन, जब हम छोटे थे

और उनकी यादें हमें आज भी खुशियों से भर देती हैं। भोर में मुसाफिर जागकर सुधर चुका था। हम सब मुसाफिर ही तो हैं।

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