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Hindi me laghu katha ; tukur tukur ka dekho …

Hindi me laghu katha ; tukur tukur ka dekho ; टुकुर टुकुर का देखो भा गई तो जाव – लघुकथा ! बालमन को संस्कृति, संस्कार और आदर्शों से जोड़ने में बाल कहानियों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान होता है। माँ की गोद में सुनी ये कहानियाँ जीवन भर मन-मस्तिष्क पर छाई रहती हैं। बाल और किशोर मन को संस्कार पथ पर गतिशील बनाने वरिष्ठ सृजन साधिका, चिंतन साधना से जुड़ी विदुषी श्रीमती मनोरमा दीक्षित जी ने “कथालोक में ऐसी ही प्रेरणास्पद कहानियाँ सृजित की हैं जिनको पढ़ने-सुनने से मन में सुंदर विचार सृजित होने लगते हैं।

आइये पढ़ते हैं Hindi me laghu katha ; tukur tukur ka dekho …टुकुर टुकुर का देखो भा गई तो जाव – लघुकथा !

Hindi me laghu katha ; tukur tukur ka dekho…

दर्शनपुर की नहर के पास एक सुन्दर बाग था जहाँ फल फूल के वृक्षों का कोई अभाव न था।

सुबह की ठंडी हवा के झकोरों से नीम और पीपल के पत्ते झूम रहे थे।

नीम की डाल पर बैठी नन्हीं “रूपा” फुदक फुदककर डाल पर नाच रही थी।

प्रकृति के इस सुन्दर खेल में सम्मिलित होने को भैंस कजरी भी बड़े घमण्ड से

अपनी मुड़ी सींग झुलाती मदमाती आ पहुंची। अपने पंखों को पसारकर हवा में कुलांचे लगाती रूपा का इतराना

कजरी को बिल्कुल नहीं भाया और उसने जोर से रंभाकर जंगल को हिला दिया।

तभी उनकी पंचायत में चालाक सियार “लम्पट” भी आ पहुंचा।

बड़बोली चिड़ी रूपा अपनी गर्दन तानकर कह रही थी मैं तो पूरे आसमान की मालकिन हूँ अतः मैं ही बड़ी हूँ,

जबकि सांवली विशाल काया कजरी अपनी घनी गुच्छेदार पूँछ पटककर स्वयं को बड़ा बता रही थी।

चालाक सियार उन दोनों की बातें सुन रहा था। उसने मौके का फायदा उठाते हुए एक सलाह उन्हें दे डाली।

उसने कहा- तुम कजरी पर बीट करो और कजरी तुम्हारी पीठ पर, जो साफ बचकर भाग जाये वही बड़ा कहलायेगा।

बिना विचारे हुए नन्हीं रूपा ने सियार “लम्पट” की यह शर्त मान ली।

कजरी को उसकी नासमझी पर बड़ी हंसी आई। पहले चिड़ी रूपा ने कजरी की पीठ गंदी की,

किन्तु पलभर में ही अपनी गुच्छेदार पूँछ से पटककर कजरी ने अपनी पीठ साफ कर ली।

अब गेंद कजरी के पाले में थी..

अब गेंद कजरी के पाले में थी। भरभराकर ढेर सारा गोबर रूपा की नन्हीं पीठ में उड़ेल कजरी ने

उसे पूरा लथपथ कर दिया था। इधर पंखों को झटककर रूपा अपनी पीठ साफ करने में लगी थी

तभी लम्पट ठीक उसके पास बैठकर उस पर हाथ साफ करने की राह देखने लगा।

रूपा उसकी बुरी नियत को ताड़ गयी थी। वह समझ चुकी थी कि वह सियार लम्पट के जाल में फंस चुकी है,

परन्तु उसने धैर्य नहीं छोड़ा। उसने धीरे से चोंच बाहर निकालकर कहा- “गंदी गंदी का खाव, धोकर तो खाव।

लम्पट धीरे से रूपा को घसीटकर नदी के पास ले गया और उसे नहला-धुलाकर चकाचक कर दिया,

परन्तु पानी में भींगी रूपा ने कांपते हुए कहा- “गीली गीली का खाव, सुखाकर तो खाव।”

रूपा जान रही थी कि भीगी होने से उसके पंख अस्त-व्यस्त हो गये हैं अत: उड़ने के काबिल नहीं हैं,

इसलिए उसने बुद्धिमत्ता से यह जाल फेंका था। लम्पट सियार को रूपा की यह बात पसंद आयी।

उसने उसे धूप में लाकर बैठा दिया। इधर लम्पट को नरम नरम शिकार देख मुंह में पानी आ रहा था।

वह शेख चिल्ली की तरह कल्पनाओं में डूब गया और उसका ध्यान रूपा की ओर से हट गया।

अब तक रूपा के….

अब तक रूपा के पंख सूख चुके थे और वह एक अंगड़ाई ले पेड़ की ऊँची फुनगी में जा बैठी ।

लम्पट भी अब सपनों से बाहर आ चुका था। पर यह क्या “रूपा तो कहीं नजर ही नहीं आ रही थी।

तभी एक सुरीली आवाज सुनाई दी- “टुकुर टुकुर का देखो भा गई तो जाव।”

लम्पट सियार के पास अब हाथ मलने के सिवा बचा ही क्या था।

भले ही चतुराई और धैर्य से रूपा ने अपने प्राण बचा लिए थे किन्तु

बड़बोलापन दिखाकर कजरी भैंस से पंगा लेने की सजा तो वह भुगत ही चुकी थी।

बच्चो, घमंड का घर खाली होता है, अतः हमें घमंड और बड़बोलेपन से बचना चाहिए,

साथ ही अचानक विपत्ति में फंस जाने पर भी हमें सदा नन्हीं रूपा की तरह

अपने बचाव का उपाय ढूँढ लेना चाहिए। है न ठीक। कैसी रही मेरी कहानी ।

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