Bachchon ki hindi kahaniya Total Post View :- 218

Hindi kahani aare dhare, pitaare dhare..

Hindi kahani aare dhare, pitaare dhare.. पुराने खेलों और बच्चों की मौज मस्ती को याद दिलाती है। बचपन कितना मासूम और सुखद होता है, जहां किसी बात की कोई फिक्र ही नहीं होती। बच्चों की दुनिया बड़ी रंगबिरंगी होती है । उसी दुनिया का हिस्सा है Hindi kahani aare dhare, pitaare dhare..। आइये बच्चों की सतरंगी दुनिया में चलते हैं।आज आपको कहानीकार श्रीमती मनोरमा दीक्षितजी द्वारा लिखित सुंदर कहानी बताते हैं।

Hindi kahani aare dhare, pitaare dhare..

आज ज्ञानू का जन्मदिन था। परिवार के सभी सदस्य अत्यंत उत्साहित थे।

उसकी दीदी पूनम की सहेलियों ने ड्राइंग रूम को सतरंगी गुब्बारों एवं तोरण से सजाया था।

तीन बरस के ज्ञानू के साथ खेलने वाले आशू, शानू, अनघ, मधुर, ओज, उज्जवल सभी आ गये थे।

सुन्दर केक और व्यंजनों की खुशबू से घर गमक रहा था। ज्ञानू की चाची भी मेवे की खीर, काजू कतरी

और अपने हाथों से बनाया केक भी लायीं थीं। चाचाजी के लाये सुन्दर से हल्के नीले सूट को ही उसने,

आज पहिन रखा था। उसके बाबा-दादी ने उसके लिए एक “बीमा पॉलिसी खरीदी थी।

सभी ने बारी-बारी से उसकी आरती उतार, तिलक लगा, उपहार दिये थे।

उसकी सात बरस की बहन “मुग्धा” सभी पैकटों को जिज्ञासा भरी निगाह से देख रही थी।

ज्ञानू को चाचाजी ने लकड़ी का बड़ा सा जो रंगबिरंगा घोड़ा लाये थे,

उस पर उसे बैठाल वो तथा बाकी सभी भी उसकी फोटो लेने लगे।

उसके लिए छोटा सा ड्रोन और कार भी दोनों फूफा-बुआ जी ने गिफ्ट किये थे।

उसे कार पर बैठालने के लिए घोड़े से उतारा उसकी माँ ने पर वह घोड़े से उतरने को तैयार नहीं था।

उसे घोड़े पर बैठना बहुत पसन्द था। अब विविध व्यंजनों के स्वाद में सभी मग्न थे।

उसकी बुआ…

उसकी बुआ लोगो ने उससे केक कटवायी थी और रंग बिरंगी मोमबत्तियां भी सजाई गयी थी,

पर उन्हें बुझाया नहीं गया। दादी बोली- अरे गुलगुला बने रखे हैं उन्हें भी तो सबको खिलाओ।

उसकी मम्मी शुभदा ने गुलगुला में काजू, नारियल चूरा, खसखस, इलायची और

चार चिरौंजी डाल बेहद क्रिसपी और सुस्वादु बनाये थे। मुग्धा और उसकी सहेलियां नाचीं भी

और खूब न्यौछावर भी हुई। समारोह अब समापन की ओर मुखातिब था ।

किन्तु ज्ञानू अपने चाचाजी की पीठ में बैठ चाचाजी को घोड़ा बना खूब हंस रहा था

और चाचा भी बेहद खुश थे। उसके पिताजी से ज्ञानू इतना घुला मिला नहीं था।

क्योंकि उनका रिजर्व नेचर और उनकी व्यस्तता उसे इसकी इजाजत नहीं देती थी।

चाचू ‘आरे घरे पिटारे घरे करो न कुछ तुतलाते हुए ज्ञानू बोला।

अब चाचू ने पलंग पर लेट उसे अपनी पिण्डली मोड, पंजों पर बैठालकर, गाना शुरू किया

खतन खतईंया…Hindi kahani aare dhare, pitaare dhare..

खतन खतैया, घुग्घू मैया चलत चलत दो कौड़ी पैया.

कौड़ी ले घसियारे को दीन्हा, घसियारा मौका घास दीन,

घास ले मैं गग्गा खिलाये, गग्गा मौका दुधा दीन,

दुद्धा ले में खीर पकाये, आरे घरे पिटारे घरे,

जाजमऊ का बिल्ला आया, खा गया दरका गया,

बची खुची का ज्ञानू खायो, बची खुची को बुआ फूफा खाये,

और बची खुची को मुग्धा दीदी खाई, बची खुची को चाची मामी खाई,

बची खुची को मम्मा पापा खाये, बची खुची को सब जन खाये, ताली बजाये’

चाचू गाते जा रहे थे और ज्ञानू को पैरों पर झूला झुला रहे थे। हा ज्ञानू और कौन खाया?

ज्ञानू बोला- मोहन दादा खाया. श्यामा भाभी खायीं ।

मोहन दादा घर का बूढ़ा नौकर था जो ज्ञानू को घुमाता खिलाता था

और श्यामा भाभी घर की महराजिन थी जो भोजन बनाती थी।

ज्ञानू का मोहन दादा और श्यामा के खिलाने का याद रखना सबको आश्चर्य में डाल चुका था।

बालह्र्दय की..Hindi kahani aare dhare, pitaare dhare..

बालहृदय की यह सोच अब समाज में दिनों दिन कम होती जा रही है जो चिंतनीय है।

चाचू अब गा रहे थे, देखो भाई ज्ञानू की शादी हो रही है, कोई छींकना छांकना नहीं,

और अपने मुंह से बाजे की आवाज निकालने लगे। अब ज्ञानू खिलखिलाकर हंस रहा था।

जब तक चाचू यहा रहे रोज रात को खतन खतैंया घुग्घू मैंया’ खेला जाता रहा।

इसका अर्थ था कि ज्ञानू घोड़े पर बैठकर मजे कर रहा है, इससे चाचू की अच्छी खासी कसरत

और ज्ञानू को हंसी खुशी मिली। ज्ञानू के इस खेल को देखकर उसके ग्रेण्डपा हंस रहे थे

क्योंकि घर के सभी नन्हे मुन्नों मुन्नियों को ये पैर का झूला जरूर झुलाया गया था।

‘चाचू’ के बाजू में ही ज्ञानू स्वप्न की सतरंगी दुनिया की सैर कर रहा था।

आज ये खेल, भागदौड़ भरी जिन्दगी में लुप्त होते जा रहे हैं।

विलुप्त होते संयुक्त परिवार के साथ बच्चों को दादी नानी की कहानियां और पैरों का झूला दुर्लभ हो गया है।

अब तो तीन-चार साल के बच्चे भी मोबाइल और टी. व्ही. में झूमे रहते हैं।

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