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Ganga Dashahara; जानिये क्या है महत्व व पूजन विधि

Ganga Dashahara- सभी पापों का नाश करने वाली तिथि है गंगादशहरा । आज हम आपको गंगा जी के पृथ्वी के अवतरण की कथा बताएंगे।

गंगाजी का अवतरण कैसे हुआ। गंगा दशमी |गंगादशहरा| Ganga Dashahara का क्या महत्व है, पूजा कैसे करनी चाहिए, यह जानने के लिए जरूर पढ़ें।

Ganga Dashahara | गंगादशहरा का महत्व

गङ्गाजी देवनदी हैं। वे मनुष्य मात्र के कल्याण के लिये धरती पर आयी थीं। धरती पर उनका अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को हुआ। यह तिथि उनके नाम पर गंगादशहरा (Ganga Dashahara) के नाम से प्रसिद्ध हुई।

दशमी शुक्लपक्षे तु ज्येष्ठमासे बुधेऽहनि ।

अवतीर्णा यतः स्वर्गाद्धस्तर्क्षे च सरिद्वरा ॥

इस तिथिको यदि सोमवार और हस्तनक्षत्र हो तो यह तिथि सब पापोंका हरण करनेवाली होती है

ज्येष्ठशुक्लदशम्यां तु भवेत्सौम्यदिनं यदि ।

ज्ञेया हस्तर्क्षसंयुक्ता सर्वपापहरा तिथिः ॥

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (Ganga Dashahara) संवत्सर का मुख कही जाती है। इस दिन स्नान और दानका विशेष महत्त्व है

ज्येष्ठस्य शुक्लादशमी संवत्सरमुखा स्मृता। तस्यां स्नानं प्रकुर्वीत दानं चैव विशेषतः ॥

  • इस तिथि को गङ्गास्नान एवं श्रीगङ्गाजी के पूजन से दस प्रकार के पापों का नाश होता है।
  • तीन कायिक, चार वाचिक तथा तीन मानसिक पापों का नाश होता है। इसीलिये इसे दशहरा कहा गया है

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशमी हस्तसंयुता । हरते दश पापानि तस्माद् दशहरा स्मृता ॥

(ब्रह्मपुराण) (Ganga Dashahara)

गंगादशहरा (Ganga Dashahara) की पूजन विधि

  • इस दिन (Ganga Dashahara में) गङ्गाजी में अथवा सामर्थ्य न हो तो समीप की किसी पवित्र नदी या सरोवर के जल में स्नान करना चाहिए।
  • अभय मुद्रा युक्त मकरवाहिनी गङ्गाजी का ध्यान करे और निम्न मन्त्र से आवाहनादि षोडशोपचार पूजन करे।

ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गङ्गायै नमः ।’

  • उक्त मन्त्रमें ‘नमः’ के स्थानपर ‘स्वाहा’ शब्दका प्रयोग करके हवन भी करना चाहिये।
  • तत्पश्चात् ‘ॐ नमो भगवति ऐं ह्रीं श्रीं (वाक्-काम-मायामयि) हिलि हिलि मिलि मिलि गङ्गे मां पावय पावय स्वाहा’-
  • इस मन्त्रसे पाँच पुष्पाञ्जलि अर्पित करें।
  • गङ्गा के उत्पत्ति स्थान हिमालय एवं उन्हें पृथ्वी पर लाने वाले राजा भगीरथ का नाम मन्त्र से पूजन करना चाहिये।
  • पूजा में दस प्रकार के पुष्प, दशाङ्ग धूप, दस दीपक, दस प्रकार के नैवेद्य, दस ताम्बूल एवं दस फल होने चाहिये।
  • Ganga Dashahara में पूजा के बाद दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिये।
  • किंतु उन्हें दान में दिये जाने वाले यव (जौ) और तिल सोलह-सोलह मुट्ठी होने चाहिये।
  • भगवती गङ्गाजी सर्वपापहारिणी हैं। अतः दस प्रकारके पापों की निवृत्ति के लिये सभी वस्तुएँ दस की संख्या में ही निवेदित की जाती हैं।
  • स्नान करते समय गोते भी दस बार लगाये जाते हैं। इस दिन सत्तूका भी दान किया जाता है।
  • Ganga Dashahara के दिन गङ्गावतरण की कथा सुनने का विधान है। वह कथा संक्षेप में इस प्रकार है

गंगादशहरा (Ganga Dashahara) में सुने गंगा अवतरण की कथा

भगवान् श्रीराम का जन्म अयोध्या के सूर्यवंश में हुआ था। उनके एक पूर्वज थे महाराज सगर । महाराज सगर चक्रवर्ती सम्राट् थे। उनकी केशिनी और सुमति नाम की दो रानियाँ थीं।

केशिनी के पुत्र का नाम असमंजस था और सुमति के साठ हजार पुत्र थे। असमञ्जस के पुत्र का नाम अंशुमान् था। राजा सगर के असमञ्जस सहित सभी पुत्र अत्यन्त उद्दण्ड और दुष्ट प्रकृति के थे।

परंतु पौत्र अंशुमान धार्मिक और देव गुरुपूजक था। पुत्रो से दुःखी होकर की महाराज सगर ने असमञ्जस को देश से निकाल दिया और अंशुमान को अपना उत्तराधिकारी बनाया।

सगर के अन्य साठ हजार पुत्रों से देवता भी दुःखी रहते थे।

एक बार महाराज सगर ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया और उसके लिये घोड़ा छोड़ा।

इन्द्र ने अश्वमेध यज्ञ के उस घोड़ेको चुराकर पाताल में ले जाकर कपिलमुनि के आश्रम में बाँध दिया, परंतु ध्यानावस्थित मुनि इस बातको जान न सके।

सगर के साठ हजार अहंकारी पुत्रों ने पृथ्वी का कोना-कोना छान मारा, परंतु वे घोड़े को न पा सके।

अन्त में उन लोगों ने पृथ्वी से पाताल तक मार्ग खोद डाला और कपिलमुनि के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ घोड़ा बँधा देखकर वे क्रोधित हो शस्त्र उठाकर कपिलमुनि को मारने दौड़े।

तपस्या में बाधा पड़ने पर मुनि ने अपनी आँखें खोलीं। उनके तेज से सगर के साठ हजार उद्दण्ड पुत्र तत्काल भस्म हो गये।

गरुड के द्वारा इस घटना की जानकारी मिलने पर अंशुमान् कपिलमुनि के आश्रम में आये तथा उनकी स्तुति की।

कपिलमुनि उनके विनय से प्रसन्न होकर बोले अंशुमन्! घोड़ा ले जाओ और अपने पितामहका यज्ञ पूरा कराओ।

ये सगर पुत्र उद्दण्ड, अहंकारी और अधार्मिक थे, इनकी मुक्ति तभी हो सकती है, जब गङ्गाजल से इनकी राख का स्पर्श हो ।

अंशुमान ने घोड़ा ले जाकर अपने पितामह महाराज सगर का यज्ञ पूरा कराया।

महाराज सगर के बाद अंशुमान् राजा बने, परंतु उन्हें अपने चाचाओं की मुक्ति की चिन्ता बनी रही। कुछ समय बाद अपने पुत्र दिलीप को राज्य का कार्यभार सौंपकर वे वन में चले गये ।

तथा गङ्गाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के लिये तपस्या करने लगे । तपस्या में ही उनका शरीरान्त भी हो गया।

महाराज दिलीप ने भी अपने पुत्र भगीरथ को राज्य भार देकर स्वयं पिता के मार्ग का अनुसरण किया। उनका भी तपस्या में ही शरीरान्त हुआ। वे भी गंगाजी को पृथ्वी पर न ला सके।

महाराज दिलीप के बाद भगीरथ ने ब्रह्माजी की घोर तपस्या की। अन्त में तीन पीढ़ियों की तपस्या से प्रसन्न हो पितामह ब्रह्मा ने भगीरथ को दर्शन दिये और वर माँगने को कहा।

भगीरथ ने कहा- हे पितामह !

मेरे हजार पूर्वज कपिलमुनि के शाप से भस्म हो गये हैं। उनकी मुक्ति के लिये आप गङ्गाजी को पृथ्वी पर भेजने की कृपा करें।

ब्रह्माजी ने कहा- मैं गङ्गाजी को पृथ्वीलोक पर तो अवश्य दूँगा, परंतु उनके वेग को कौन रोकेगा।

इसके लिये तुम्हें देवाधिदेव भगवान् शंकर की आराधना करनी चाहिये। भगीरथ ने एक पैर पर खड़े होकर भगवान् शंकर की आराधना शुरू कर दी।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने गङ्गाजी को अपनी जटाओं में रोक लिया और उसमें से एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड़ दिया।

इस प्रकार गङ्गाजी पृथ्वी की ओर चलीं। अब आगे-आगे राजा भगीरथ का रथ और पीछे-पीछे गङ्गाजी थीं।

मार्ग में जह्रुऋषि का आश्रम पड़ा, गङ्गाजी उनके कमण्डलु, दण्ड आदि बहाते हुए जाने लगीं

यह देख ऋषि ने उन्हें पी लिया। कुछ दूर जाने पर भगीरथ ने पीछे मुड़कर देखा तो गङ्गाजी को न देख वे ऋषि के आश्रमपर आकर उनकी वन्दना करने लगे।

प्रसन्न हो ऋषि ने अपनी पुत्री बनाकर गङ्गाजी को दाहिने कान से निकाल दिया। इसलिये देवी गङ्गा ‘जाह्नवी’ नाम से भी जानी जाती हैं।

भगीरथ की तपस्या से अवतरित होने के कारण उन्हें ‘भागीरथी’ भी कहा जाता है।

इसके बाद भगवती भागीरथी गङ्गाजी मार्ग को हरा भरा शस्य-श्यामल करते हुए कपिलमुनि के आश्रम में पहुँचीं।

जहाँ महाराज भगीरथ के साठ हजार पूर्वज भस्म की ढेरी बने पड़े थे। गङ्गाजल के स्पर्शमात्र से वे सभी दिव्य रूप धारी हो दिव्य लोकों को चले गये।

दो शब्द

आशा है, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि गंगादशहरा ( Ganga Dashahara) के बारे में यह जानकारी आपको अवश्य अच्छी लगी होगी।

गंगा जी का महात्म्य अपूर्व है। वो तो जिस पर कृपा होती है वही जान सकता है।

भगवत्कृपा दिखाई देने वाली वस्तु नहीं है , इसे तो सिर्फ महसूस किया जा सकता है। अंत मे

नमामि गङ्गे तव पादपङ्कजं सुरासुरैर्वन्दितदिव्यरूपम् । भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि नित्यं भावानुसारेण सदा नराणाम् ॥

है मातु गंगे! देवताओं और राक्षसों से वन्दित आपके दिव्य चरणों मे कोटि कोटि प्रणाम है।, जो मनुष्यों को नित्य ही उनके भावानुसार भुक्ति और मुक्ति प्रदान करती है।

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