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श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त विवरण प्रथम स्कंध-भाग 2

श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त विवरण प्रथम स्कंध भाग 2 में आप द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण का स्वागत, परीक्षित का जन्म, धृतराष्ट्र और गांधारी का वनगमन, नारदजी द्वारा भविषयदर्शन, अर्जुन की द्वारका से वापसी, पांडवों का श्रीकृष्ण से वियोग, परीक्षित का राज्याभिषेक, धर्म और पृथ्वी का संवाद, कलियुग के दमन, कलियुग के निवास स्थान, राजा परीक्षित को श्रृंगी ऋषि का श्राप, परीक्षित का अनशन व्रत व शुकदेव जी के आने का वृतांत जानेगें। यह कथा मोक्ष प्रदान करने वाली तथा भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति देने वाली है।

द्वारका में श्रीकृष्ण का स्वागत! Welcome to Krishna in Dwarka!

  • सूत जी कहते हैं श्री कृष्ण ने जैसे ही द्वारका में पहुंचकर अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया,
  • सभी स्त्री-पुरुष, सखा, बच्चे- वृद्ध सभी जैसे थे उसी अवस्था में सब कुछ भूल कर श्रीकृष्ण से मिलने दौड़ पड़े।
  • द्वारका के राजपथ में श्री कृष्ण का भव्य स्वागत हुआ।
  • भगवान सबसे पहले अपने माता पिता, देवकी आदि सातों माताओं से मिले ।
  • माताओं से आज्ञा लेकर अपनी 16000 रानियों से मिले ।
  • इस प्रकार सभी को यथा योग्य सम्मान प्रदान कर श्रीकृष्ण ने संतुष्ट किया।

 परीक्षित का जन्म!Birth of Parikshit!

  • शौनकजी द्वारा परीक्षित के संदर्भ में प्रश्न किए जाने पर सूत जी ने कहा- शौनक जी!
  • उत्तरा के गर्भ में 10 माह का गर्भस्थ शिशु अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से जलने लगा तो उसने देखा,
  • अंगूठे बराबर ज्योतिर्मय पुरुष हाथ में जलती हुई गदा ले शिशु के चारों ओर घूम ब्रह्मास्त्र के तेज को शांत कररहा है।
  • तथा वह कुछ देर पश्चात अंतर्धान हो गया। फिर शुभ समय में परीक्षित का जन्म हुआ ।
  • विष्णु द्वारा रक्षित होने से ब्राह्मणों द्वारा उसे विष्णु रात नाम दिया गया।
  • और बताया कि बालक परम यशस्वी प्रतापी व विष्णु भक्त तथा पांडवों के समान कीर्ति वाला होगा।

 धृतराष्ट्र-गांधारी का वनगमन! Dhritarashtra-Gandhari’s exodus!

  • सूत जी कहते हैं विदुरजी तीर्थ यात्रा में महर्षि मैत्रेय से आत्मज्ञान प्राप्त कर हस्तिनापुर लौट आए ।
  • तथा तीर्थों र्और यदुवंशियों के संबंध में जो कुछ देखा सुना और अनुभव किया था तब क्रम से बता दिया।
  • केवल यदुवंश के विनाश की बात नहीं कही । क्योंकि वह पांडवों को दुखी नहीं देख सकते थे।
  • विदुर जी तो साक्षात धर्मराज थे। मांडव्य ऋषि के श्राप से 100 वर्षों के लिए शुद्र बन गए थे।
  • विदुर द्वारा अपने भाई धृतराष्ट्र को सन्यास हेतु समझाने पर धृतराष्ट्र वन को चले तथा गांधारी भी उनके साथ चली गई।
  • जब प्रात:काल युधिष्ठिर ने विदुर ,धृतराष्ट्र, गांधारी को ना पाया, तो संजय से पूछा। पता न चलने पर दुखी हो गए।

 नारदजी द्धारा भविष्य दर्शन! Naradji saw the future!

  • नारद जी ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया कि हिमालय के दक्षिण में गंगा जी की 7 धाराएं जिसे सप्तस्रोत कहते हैं।
  • वही ऋषियों के आश्रम में धृतराष्ट्र अपनी पत्नी गांधारी व विदुर के साथ हैं व समस्त कर्मों का सन्यास कर दिया है।
  • तथा आज से पांचवें दिन अपने शरीर का त्याग कर देंगे। व गांधारी भी पति का अनुगमन कर अग्नि में प्रवेश करेंगी ।
  • और विदुर जी तीर्थ सेवन को निकल जाएंगे।
  • ऐसा कहकर नारद जी स्वर्ग को चले गए । यह सब जानकर युधिष्ठिर ने शोक का त्याग कर दिया।

 अर्जुन की द्वारका से वापसी! Arjun returns from Dwarka!

  • सूत जी कहते हैं- स्वजनों से मिलने तथा भगवान श्री कृष्ण क्या करना चाहते हैं यह जानने अर्जुन द्वारका गए हुए थे।
  • जब कई महीने बीतने पर भी अर्जुन वापस नहीं लौटे और युधिष्ठिर को भयंकर अपशगुन दिखने लगे ।
  • तब उन्होंने भीमसेन से चिंता व्यक्त की। तथा व्याकुल होने लगे । तभी अर्जुन द्वारका से वापस आ गए।
  • अर्जुन को दुखी देखकर, युधिष्ठिर द्वारकापुरी में सभी की कुशलक्षेम पूछने लगे।
  • तथा व्याकुल होकर अर्जुन की श्रीहीनता के बारे में तरह-तरह के प्रश्न करने लगे।

 पांडवों का श्रीकृष्ण से वियोग! Disconnection of Pandavas to Shri Krishna!

  • सूत जी कहते हैं -भगवान श्री कृष्ण के सखा अर्जुन एक तो पहले से ही श्री कृष्ण विरह से दुखी थे।
  • उस पर युधिष्ठिर के प्रश्नों की झड़ी सुनकर कृष्ण प्रेम को याद कर उनके नेत्रों से आंसू बह चले।
  • अर्जुन बोले- कृष्ण ने मित्र का रूप धर के मुझे ठग लिया । जिनके कारण मतस्यभेद कर मैंने द्रोपदी को पाया था।
  • इंद्र को जीता, खांडव वन का दान किया।वनवास में दुर्वासा ऋषि-मंडली को पूर्णतृप्ति प्रदान कर संकट से उबारा।
  • जिनके प्रताप से मैंने शिव को प्रसन्न करके पाशुपत नामक अस्त्र प्राप्त किया। जो मेरे प्रिय सखा मित्र मेरे ह्रदय थे।
  • उनसे आज मैं रहित हो गया हूं। फिर मार्ग का सारा वृतांत युधिष्ठिर को बता, अपना ध्यान कृष्ण के चरणों में लगाया ।
  • जिससे उन्हें भगवान द्वारा दिया गया गीता का ज्ञान स्मरण हुआ । और वे शोक से मुक्त हो गए।

 परीक्षित का राज्य अभिषेक! Parikshit’s kingdom Abhishek!

  • भगवान के स्वधाम गमन और यदुवंश के संहार का वर्णन सुनकर युधिष्ठिर ने स्वर्गारोहण का निश्चय किया ।
  • तथा परीक्षित को पृथ्वी के सम्राट पद पर हस्तिनापुर में तथा मथुरा में अनिरूद्ध के पुत्र वज्र का अभिषेक किया।
  • स्वयं सन्यास धारण कर उत्तर दिशा की यात्रा की तब भीमसेन,अर्जुन,नकुल,सहदेव भाई के पीछे पीछे चल दिए।
  • माता कुंती ने भी श्री कृष्ण के स्व धाम गमन की बात सुनकर संसार को त्याग दिया।
  • विदुर जी ने प्रभास क्षेत्र में शरीर त्याग यमलोक चले गए। द्रोपदी भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्हें प्राप्त हो गई।
  • जो इस कथा को सुनता है वह मोक्ष को प्राप्त करता है।

 धर्म और पृथ्वी का संवाद! (श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त विवरण)Dialogue of religion and earth!

  • श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है । सूत जी कहते हैं- राजा परीक्षित ने उत्तर की पुत्री
  • इरावती से विवाह किया । उससे उन्हें जन्मेजय आदि 4 पुत्र हुए।
  • तथा उन्होंने गंगा तट पर तीन अश्वमेध यज्ञ किए।
  • “एक दिन दिग्विजय के समय धर्म बैल का रूप धारण कर घूम रहा था और गाय पृथ्वी रूप में थी।
  • दोनों अत्यंत दुखी थे। वे कलियुग के दुष्प्रभाव व अपने अपमान की बातें आपस में कर रहे थे।

परीक्षित द्वारा कलियुग दमन! Kali Yuga Daman by Parikshit!

  • महाराजा परीक्षित ने देखा कि एक राजवेष धारी शूद्र हाथ में डंडा लिए हुए ,गाय-बैल के जोड़े को पीट रहा है।
  • उन्होंने धर्म से पूछा- आप कौन हैं? तब धर्म ने परीक्षित के पूर्वजों व श्री कृष्ण से उनके संबंधों की व्याख्या की।
  • जिसे सुनकर परीक्षित अत्यंत प्रसन्न हुए व धर्म को पहचान कर कहा आप वृषभ के रूप में स्वयं धर्म है।
  • धर्मदेव सतयुग में आप के चार चरण थे। तप, पवित्रता, दया और सत्य। इस समय तीन चरण नष्ट हो गए हैं ।
  • मात्र चौथा चरण सत्य बचा है। जिसे कलियुग नष्ट करना चाहता है। और यह गौमाता साक्षात पृथ्वी है।
  • इस प्रकार जानकर राजा परीक्षित ने कलियुग को मारने हेतु तलवार उठाई।

 कलियुग के निवास-स्थान! Abode of Kali Yuga!

  • कलियुग ने मौत सामने देख परीक्षित के चरण पकड़ लिए तथा क्षमा मांगते हुए कहा। मुझे मत मारिये।
  • आप मुझे वह स्थान बताइए जहां मैं रहूं। तब राजा परीक्षित ने उसे चार स्थान दिए। द्यूत, मद्यपान, स्त्री संग ,हिंसा ।
  • इन स्थानों में असत्य, मद, आसक्ति व निर्दयता नामक अधर्म निवास करते हैं । कलि ने जब और स्थान मांगा।
  • तब परीक्षित ने उसे रहने हेतु सुवर्ण (धन) स्थान दिया। इस प्रकार कलियुग के पांच स्थान हो गए।
  • झूठ, मद, काम, बैर और रजोगुण। आत्म-कल्याणी पुरुष को इन पांच स्थानों का सेवन कभी नहीं करना चाहिए।
  • राजा परीक्षित ने वृषभ रूपी धर्म के चारों पैर जोड़ दिए। व आश्वासन देकर पृथ्वी का संवर्द्धन किया।

परीक्षित को श्रृंगी ऋषि का श्राप! श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त विवरण !Curse of Shringi Rishi to Parikshit!

  • श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त विवरण – सूतजी कहते हैं – “एक दिन राजा परीक्षित शिकार करने वन गए।
  • वहां हिरणों के पीछे दौड़ते दौड़ते थक गए।
  • उन्हें जोरों की भूख प्यास लगी। वहीं एक ऋषि का आश्रम देख वहां पहुंचे वहां मुनि शमीक तपस्या कर रहे थे।
  • उन्होंने राजा परीक्षित को नहीं देखा। राजा को कोई आदर न मिलने व प्यास से व्याकुल होने से अत्यंत क्रोधित हुआ ।
  • राजा ने लौटते हुए पास में पड़ा हुआ एक मरा हुआ सांप धनुष की नोक से उठाकर मुनि के गले में डाल दिया।
  • शमीक का पुत्र बड़ा तेजस्वी था, उसने जब अपने पिता के अपमान की बात सुनी तो क्रोध में राजा को शाप दे दिया।
  • कि आज से ठीक सातवें दिन उसे तक्षक सर्प डस लेगा। फिर अपने पिता के पास आकर जोर जोर से रोने लगा।
  • रोना सुन शमीक मुनि ने आंखें खोली व रोने का कारण पूछा। तब बालक ने सारा वृत्तांत कह सुनाया ।
  • मुनि अत्यंत क्रोधित हुए। व बालक को समझाया कि राजा परीक्षित दंड के योग्य नहीं है। तुमने गलत किया।”

 परीक्षित का अनशन व्रत! श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त विवरण ! Parikshit’s fast

  • श्रीमद्भागवत महापुराण में संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है सूत जी कहते हैं-
  • राजधानी पहुंचने पर राजा को अपने कृत्य पर बड़ा पश्चाताप हुआ ।
  • वे मन ही मन दंड के लिए प्रार्थना करने लगे। तभी उन्हें ऋषि कुमार के श्राप के बारे में मालूम हुआ।
  • तक्षक सर्प द्वारा डस लेना जानकर ,उन्होंने सब कुछ त्याग कर वैराग्य धारण किया।
  • तथा गंगा तट पर आमरण अनशन व्रत लेकर बैठ गए।
  • राजकाज अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया।

 श्रीमद्भागवत महापुराण शुकदेवजी का आगमन- संक्षिप्त विवरण! Shukdevji’s arrival!

  • समस्त ऋषि मुनि गंगा तट पर पहुंचे हुए थे । सभी का यथा योग्य अभिवादन कर राजा ने पूछा –
  • अंतःकरण की शुद्धता हेतु थोड़े ही समय में मरने वाले पुरुषों के लिए विशुद्ध कर्म क्या है?
  • वहां व्यास नंदन श्री शुकदेव जी भी पधारे,जिन्हें राजा परीक्षित सहित सभी ऋषियों ने उन्हें प्रणाम किया ।
  • तथा पूछा- कि जो पुरुष सर्वथा मरणासन्न है उसको क्या करना चाहिए ?
  • मनुष्य मात्र को किसका श्रवण, जप,भजन व स्मरण व त्याग करना चाहिए?
  • सूत जी कहते हैं राजा के वचन सुन कर शुकदेव जी ने उत्तर दिया……..
यदि कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करें। जय श्री कृष्णा।

http://Indiantreasure. in

https://youtu.be/BEZYuqPkABY

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6 thoughts on “श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त विवरण प्रथम स्कंध-भाग 2

  1. बहुत बहुत धन्यवाद बहुत सुंदर जानकारी के लिए.. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय..🙏👑❣️

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