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श्रीमद्भागवत कथा तृतीय स्कन्ध

श्रीमद्भागवत कथा तृतीय स्कन्ध भाग-2 में अत्यंत ही रोचक और अद्भुत बातों का वर्णन किया है।

सृष्टि-विस्तार, भगवान के वराह-अवतार की कथा, हिरण्याक्ष की उत्पत्ति की कथा का उल्लेख है।

ब्रह्मा जी का अपनी ही पुत्री सरस्वतीजी पर मोहित होने व देह त्याग का भी वृतांत है।

1- सृष्टि-विस्तार की कथा! Story of expansion of the universe!

  • जिस समय संपूर्ण विश्व जल में डूबा हुआ था, उस समय एकमात्र श्रीनारायणदेव शेषशैया में योगनिद्रा में निमग्न थे।
  • तब एक सहस्त्र चतुर्युग बीतने पर भगवान विष्णु की नाभि से कमल कोश प्रकट हुआ।
  • जिसमें संपूर्ण वेदों को जानने वाले श्री ब्रह्मा जी प्रकट हुए। जिन्हें लोग स्वयंभू कहते हैं। उन्होंने कमल पर बैठे हुए,
  • चारों दिशाओं में अपनी गर्दन घुमा कर देखा। इससे उनके चारों दिशाओं में चार मुख हो गए।जब वे कुछ ना समझे,
  • कि मैं कौन हूं? यह कमल कहां से उत्पन्न हुआ है? तब वह कमल की नाल से होकर जल में घुसे।
  • बहुत समय बीतने पर भी कुछ जान न सके। तो पुनः वापस लौट कर 100 वर्षों तक समाधिस्थ हो गए ।
  • तब उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ उन्होंने शेष शैया पर विराजित पुरुषोत्तम भगवान को देखा।
  • तथा भगवान के नाभि सरोवर से प्रकट उन्होंने कमल,जल, आकाश, वायु और अपना शरीर यह पांच पदार्थ देखें। (श्रीमद्भागवत कथा तृतीय स्कन्ध, भाग-2)

2-ब्रम्हाजी द्वारा भगवान की स्तुति! Praise God by Brahmaji!

  • तब लोक रचना के लिए प्रभु की स्तुति करने लगे। ब्रम्हाजी ने कहा; प्रभु आज बहुत समय में आपको पहचान सका हूं।
  • आप नित्य अजन्मा है। आपका यह रूप सैकड़ों अवतारों का मूल कारण है। यही संपूर्ण भूतव इंद्रियों का अनुष्ठान है।
  • संसार की उत्पत्ति स्थिति और संहार के निमित्त लीलाएं आपका ही खेल है।
  • जो मेरे, आपके व महादेव (ब्रह्मा, विष्णु,महेश) रूप में तीन शाखाओं में विभक्त हुए हैं।
  • आप अपार करुणामय पुराण पुरुष है। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं, ऐसी विभिन्न स्तुति कर ब्रह्मा जी के मौन होने पर,
  • भगवान ने ब्रह्मा जी को सृष्टि की रचना करने हेतु पुनः तप करने और भगवत ज्ञान का अनुष्ठान करने कहा।
  • इस प्रकार ब्रह्मा जी को जगत की अभिव्यक्ति कराकर नारायण रूप से भगवान अदृश्य हो गए।
  • तब ब्रम्हाजी ने भगवान के आदेशानुसार दिव्य 100 वर्षों तक घोर तप किया। व सृष्टि की रचना की।

अवश्य पढ़ें 

अब स्वयं पढें; श्रीमद्भागवत महापुराण (एक संक्षिप्त विवरण) तृतीय स्कंध-भाग-1 Now read it yourself; Shrimad Bhagwat Mahapuran (A brief description) Third Wing-Part-1

 

 

3- ब्रम्हाजी द्वारा निर्मित सृष्टि का वर्णन! Description of creation created by Brahma

ब्रम्हांड
  • सूत जी कहते हैं- विदुरजी ने श्रीमैत्रेयजी से पूछा; ब्रह्मा जी ने कितने प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की है?
  • तब श्री मैत्रेयजी ने बताया की भगवान श्री हरि के कहे अनुसार ब्रह्मा जी ने पुनः दिव्य 100 वर्षों तक तप किया।
  • जिससे उनका आत्मज्ञान तथा विज्ञान बल बढ़ गया।
  • फिर जिस कमल पर ब्रह्मा जी बैठे थे, उन्होंने उसी को तीन भाग , भु:, भुवः, स्व: में विभक्त कर दिया।
  • श्री हरि की “काल” नामक शक्ति के बारे में पूछने पर मैत्रेयजी ने कहा इस सृष्टि का प्रलय काल ,
  • द्रव्य तथा गुणों के द्वारा तीन प्रकार का होता है। सृष्टि ध प्रकार की होती है। महत्तत्व, अहंकार, भूतसर्ग, इंद्रिय,
  • देवताओं की (मन), अविद्या (इसमें तामिस्र,अंधतामिस्र) तम,मोह और महामोह यह पांच गांठे हैं ।
  • प्रधान वैकृत-सृष्टि (वृक्ष आदि), तिर्यकयोनियों की( पशु- पक्षी), मनुष्यों की, व देवसृष्टि ।

4- सृष्टि में काल (समय) का विभाजन ! The division of time (time) in the universe!

  • सृष्टि में चार- चार प्रहर के मनुष्यों के दिन और रात होते हैं 15 दिन का एक पक्ष होता है।
  • जो शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष दो प्रकार का होता है। दो पक्षों को मिलाकर एक मास है।
  • जो पितरों का एक दिन रात है। दो मास की एक ऋतु व छह मास का एक अयन। दक्षिणायन उत्तरायण ।
  • दोनों अयन मिलकर देवताओं का एक दिन व रात होते हैं। मनुष्य लोक में यह 12 मास, एक वर्ष कहे जाते हैं।
  • मनुष्य के 100 वर्ष की आयु बताई गई है। सूर्य, बृहस्पति, चंद्रमा, नक्षत्र संबंधी महीनों के भेद से यह वर्ष ही,
  • संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर, वत्सर कहा जाता है।
  • विदुरजी द्वारा सनकादि ज्ञानी मुनियों की आयु पूछने पर; श्रीमैत्रेयजी सतयुग , त्रेतायुग, द्वापरयुग, व कलियुग ,
  • इन चतुर्युगों की आयु का विस्तृत वर्णन किया। जो निम्नानुसार है।

5-चतुर्युगों में आयु का वर्णन! Age description in chaturyugas!

  • श्रीमैत्रेयजी ने कहा; सतयुग में 4000 दिव्य वर्ष युग के व 800 संध्या व संध्यांश के, इसप्रकार 4800वर्ष सतयुग में ।
  • त्रेता युग में 3600 वर्ष। द्वापर में 2400 वर्ष, कलयुग में 1200 दिव्य वर्ष होते हैं।
  • मनुष्यों का 1 वर्ष देवताओं का एक दिन होता है। देवताओं का 1 वर्ष मनुष्यों के 360 वर्ष के बराबर होता है।
  • इस प्रकार कलयुग में 4,32,000 वर्ष हुए। इससे दुगुने द्वापर में, तिगुने त्रेता में, और चौगुने सतयुग में होते हैं।
  • एक सहस्त्र चतुर्युगी का एक दिन, व इतनी ही बड़ी ब्रह्मा जी की एक रात्रि होती है। उस रात्रि का अंत होने पर,
  • इस लोक का एक कल्प प्रारंभ होता है। एक कल्प में 14 मनु होते हैं। रात्रि होने पर सारी सृष्टि ब्रह्मलीन हो जाती है।
  • ब्रह्मा जी की आयु के आधे भाग को परार्ध कहते हैं ।पूर्व परार्ध (शब्द ब्रह्म) में ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई थी।
  • इसी परार्ध के अंत में कल्प को पाद्यकल्प कहते है।दूसरे परार्ध का कल्प, वराह कल्प नाम से विख्यात है।(श्रीमद्भागवत कथा तृतीय स्कन्ध भाग 2)

6- सृष्टि का विस्तार ! Expansion of the universe

  • आकृतियों सहित, दस इंद्रियां, मन व पंचभूत इन 16 विकारों से युक्त ब्रम्हांडकोष है।
  • जिसके बाहर दस – दस गुने सात आवरण है, वह अक्षर ब्रह्म कहलाता है यही परमात्मा का श्रेष्ठ धाम या स्वरूप है।
  • श्रीमैत्रेयजी ने कहा भगवान की काल रूप महिमा के बाद ब्रह्मा जी के जगत की रचना सुनिए।
  • सबसे पहले उन्होंने अज्ञान की पांच वृत्तियां, तम (अविद्या), मोह (अस्मिता), महामोह (राग), तामिस्र (द्वेष), और
  • अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) रचीं। फिर सनक, सनन्दन, सनातन व सनत्कुमार चार मुनि उत्पन्न हुए।
  • ब्रह्मा जी के क्रोध से रुद्र प्रजापति उत्पन्न हुए। व दस पुत्र मरीचि,अत्रि,अंगिरा,पुलस्त्य,पुलह,कृतु,भुगु,वशिष्ठ,दक्ष
  • और दसवें नारद थे। ब्रम्हाजी की छाती से धर्म,जिनकी पत्नी मूर्ति से स्वयं नारायण हुए। पीठ से अधर्म, हॄदय से
  • काम, भौहों से क्रोध, नीचे के ओंठ से लोभ, मुख से वाणी की देवी सरस्वती, लिंग से समुद्र, गुदा से पाप ।

7-ब्रम्हाजी का पुत्री सरस्वती पर मोह व देह त्याग! Brahma’s daughter Saraswati’s fascination and renunciation!

वाणी की देवी सरस्वती
  • श्रीमैत्रेयजी विदुरजी से कहा; ब्रम्हाजी की कन्या सरस्वती बड़ी ही सुकुमारी व मनोहर थी।
  • एक बार उसे देखकर ब्रह्माजी मोहित हो गए थे। तब उनके पुत्र मरीचि आदि ऋषियों ने उन्हें समझाया ।
  • तथा अधर्म करने से रोका। तब ब्रह्मा जी अत्यंत हुए और उन्होंने अपने शरीर को उसी समय छोड़ दिया।
  • जो कुहरा हुआ, जिसे अंधकार भी कहते हैं। इसके सिवा ब्रह्मा जी के पूर्वमुख से चारों वेद उतपन्न हुए।
  • ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद,तथा चार उपवेद आयुर्वेद,धनुर्वेद, गंधर्व वेद,स्थापत्यवेद हुए।
  • पांचवां वेद इतिहास-पुराण रूप,दो-दो याग,धर्म के चार चरण, विद्या, दान, तप और सत्य ।
  • चार आश्रम, चार वृत्तीयाँ, सावित्र, प्राजापत्य, बाह्य व वृहत,(ब्रह्मचारी की चार वृत्तियां)।
  • वार्ता, संचय, शालिग्न व शिलोच्छ (गृहस्थ की वृत्तियां) का विस्तार किया।

8- मनु-शतरूपा की उत्तपत्ति! Origin of Manu-Shatrupa!

  • ब्रम्हाजी के द्वारा दूसरा लेने पर उस शरीर से दो भाग हो गए। उनसे स्त्री-पुरुष का जोड़ा उत्पन्न हुआ ।
  • वे मनु और शतरूपा हुए । जिनकी 5 संतान हुई। जिनमें दो पुत्र प्रियव्रत व उत्तानपाद हुए।
  • तथा तीन पुत्रियां आकृति, देवहूति व प्रसूति हुईं। जिनमें आकृति रुचि प्रजापति की पत्नी हुईं।
  • देवहूती कर्दम जी की पत्नी हुईं और प्रसूती का विवाह दक्ष प्रजापति से हुआ।
  • उनसे उत्पन्न संतानों से सारा संसार रच दिया। तब मनु जी ब्रम्हाजी से कहा;
  • पिताजी आप मेरे व मेरी भावी प्रजा के रहने का स्थान बताइए।देव ! सारी पृथ्वी तो प्रलय के जल में डूबी हुई है।
  • श्रीमैत्रेयजी ने कहा; यह सुनकर ब्रम्हाजी गहन सोच में पड़ गए। की अब पृथ्वी जो रसातल में डूब चुकी है।
  • अब रसातल में डूबी हुई पृथ्वी को कौन बाहर लाएगा, वह सोचने लगे। और भगवान को याद किया।(श्रीमद्भागवत कथा तृतीय स्कन्ध भाग 2)

9- वराह अवतार की कथा ! Story of Varaha Avatar!

श्री वाराह अवतार
  • ब्रम्हाजी ने जैसे ही श्रीहरि का स्मरण किया , वैसे ही उनके नासाछिद्र से से अचानक अंगूठे के बराबर आकार का,
  • एक वाराह शिशु निकला जो देखते ही देखते हाथी के बराबर हो गया।
  • तब सर्वशक्तिमान श्री हरि ने अपनी गर्जना से दिशाओं को प्रतिध्वनित कर दिया। मायामय वराह भगवान की,
  • घुरघुराहट को सुनकर जनलोक, परलोक व सत्यलोक निवासी मुनि गण ,वेद मंत्रों से स्तुति करने लगे।
  • भगवान स्वयं यज्ञ पुरुष तथा शूकररूप धारण करने के कारणअपनी नाक से सूँघ कर पृथ्वी का पता लगा रहे थे।
  • तथा अपने पैने खुरों से रसातल में डूबी पृथ्वी को ऊपर ले आये। पृथ्वी को रसातल से बाहर आते समय ,
  • महापराक्रमी हिरण्याक्ष ने उन पर आक्रमण किया। तब क्रोध में भरकर उन्होंने हिरण्याक्ष का वध कर दिया।
  • सभी की रक्षा करने वाले भगवान ने अपने खुरों से जल को स्तम्भित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया।(श्रीमद्भागवत कथा तृतीय स्कन्ध भाग 2)

10- हिरण्याक्ष की उत्तपत्ति की कथा ! Story of Genesis of Hiranyaksha!

  • एक बार दक्षपुत्री दिति ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से सायं काल के समय ही अपने पति कश्यपजी से प्रार्थना की ।
  • उस समय कश्यपजी ध्यानस्थ थे। उन्होंने दिति को समझाया की यह अत्यंत भयानक समय है।
  • तथा राक्षस आदि जीवो का समय है, इस समय भगवान भूतनाथ के गण भूत-प्रेत घूमते रहते हैं।
  • यह समय मात्र ईश्वर आराधना का है। किन्तु पति के समझाने पर भी दिति नहीं मानी। तब कश्यप जी ने,
  • देव आराधना पूर्ण कर , उन्हें प्रणाम कर, दिति से समागम किया। तत्पश्चात दिति को अपने कृत्य पर पछतावा हुआ।
  • वह ईश्वर से अपने पुत्र की रक्षा हेतु प्रार्थना करने लगी। कश्यपजी ने कहा; तुम्हारी कोख से दो बड़ेअधम पुत्र होंगे।
  • जिनके अत्याचारों से कुपित होकर जगदीश्वर अवतार लेंगे और उनका वध करेंगे। तथा तुम्हारे 1 पुत्र के 4 पुत्र होंगे।
  • जिनमें से एक अत्यंत साधुस्वभाव का, संतप्रिय,भगवत- भक्त होगा जिसे स्वयं श्रीहरि का प्रत्यक्ष दर्शन होगा।(श्रीमद्भागवत कथा तृतीय स्कन्ध भाग 2)

क्रमशः……….. तृतीय स्कंध का शेष भाग अगले लेख में प्रस्तुत किया जाएगा।

जय श्रीकृष्णा

श्रीमद्भागवत कथा जयाकिशोरीजी 

https://youtu.be/HHNW0kKqzNM

 श्रीमद्भागवत कथा तृतीय स्कन्ध भाग 2, श्रीमद्भागवत महापुराण से संकलित कर मेरे द्वारा संक्षिप्तीकरण किया गया है।

जो भी त्रुटियां हो क्षमा करें ! जय श्री कृष्णा ! ऐसी ही अन्य अनेक जानकारियों के लिए देखें

http://Indiantreasure.in

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