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शारदीय नवरात्रि- 2023 दुर्गा सप्तशती पढ़ने के नियम व दुर्गा पाठ का फल ; Shradhey Navratri 2023

दक्षिणायन सूर्य , शरद ऋतु कि यह नवरात्रियाँ शारदीय नवरात्रि कहलाती हैं । वर्षा ऋतु के बीतने  और शरद ऋतु के आगमन पर मंद मंद बहती पवन माँ के आगमन की खुशियाँ लिए दस्तक दे रही है।

इस समय संपूर्ण सृष्टि माता भगवती की भक्ति और प्रेम में  डूबी हुई रहती है । तथा प्रत्येक नर नारी अपनी-अपनी श्रद्धा अनुसार माता भगवती को   प्रसन्न करने में लगे रहते हैं।

यह नवरात्रि अत्यंत शुभ फलदाई होती है ,और प्रत्येक दिन अत्यंत ही शुभ मंगलकारी होता है।

और इन 9 दिनों में किसी भी शुभ कार्य को किया जा सकता है तथा अन्य शुभ खरीदी भी की जाती है ।

नवरात्रि 2023 में 15 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 23 अक्टूबर को समाप्त होंगी।

तारीख 18 को सर्वार्थ सिद्धि योग भी है जो अत्यंत शुभ फलदाई होता है ।

इस लेख में आपको बहुत आवश्यक व रोचक जानकारियां देने का प्रयास किया है जो निम्नानुसार क्रमबद्धता से प्रस्तुत हैं –

  • माता के 9 रूप!

  • माता के 9 रूपों का वर्णन!

  • नवरात्रि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण!

  • इसे नवरात्रि ही क्यों कहते हैं ?

  • पूजन सामग्री !

  • पूजन विधि !

  •  दुर्गा सप्तशती पढ़ने के नियम !

  • दुर्गा पाठ का फल !

आइए जानते हैं माता भगवती के नौ रूप नवरात्रि में किन किन दिनों में पूजे जाते हैं और उनके क्या नाम है ।

माता के 9 रूप!

  1. 15 अक्टूबर।      –    मां शैलपुत्री
  2. 16 अक्टूबर।      –    मां ब्रह्मचारिणी 
  3. 17 अक्टूबर।      –    मां चंद्रघंटा
  4. 18 अक्टूबर।      –    मां कुष्मांडा
  5. 19 अक्टूबर।      –    मां स्कंदमाता
  6. 20 अक्टूबर।      –    मां कात्यायनी
  7. 21 अक्टूबर।      –    मां कालरात्रि
  8. 22 अक्टूबर।      –    मां महागौरी
  9. 23 अक्टूबर।      –    मां सिद्धिदात्री
माता भगवती के विभिन्न नौ रूपों का वर्णन दुर्गा सप्तशती के देवी कवचम में दिया गया है।

माता के 9 रूपों का वर्णन!

1- प्रथम रूप शैलपुत्री कहलाता है, गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती देवी यद्यपि यह सब की अधिश्वरी हैं,

तथापि हिमालय की तपस्या और प्रार्थना से प्रसन्न होकर कृपा पूर्वक उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुई यह बात पुराणों में प्रसिद्ध है। इसीलिए माता को शैलपुत्री कहा गया।

2 माता का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी ब्रह्म चारियितुं शीलं यस्याः सा ब्रह्मचारिणी – अर्थात सच्चिदानंदमय ब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो वह ब्रह्मचारिणी ।

3- माता का तीसरा रूप चंद्रघंटा।  चंद्र: घन्टायां यस्याः सा – आल्हादकारी चंद्रमा जिनकी घंटा में स्थित हो,  उन देवी का नाम चंद्रघंटा है ।

4- माता का चौथा रूप  कूष्मांडा । कुत्सित: ऊष्मा कूष्मा –  त्रिविधतापयुत: संसार:, स अंडे मांसपेश्यामुदररूपायां रूपा यस्या:  सा कूष्मांडा  ।

अर्थात  त्रिविध ताप युक्त संसार जिनकी उदर  (पेट) में स्थित है , वे  भगवती कूष्मांडा कहलाती हैं ।

5- छान्दोग्य श्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनतकुमार का नाम स्कंन्द है।

उनकी माता होने से वे स्कंदमाता कहलाती हैं। अतः देवी का पांचवा रूप स्कंदमाता है ।

6- देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए देवी , महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुइं ।

और महर्षि ने उन्हें अपनी कन्या माना, इसीलिए कात्यायनी नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई माता का छठवां रूप कात्यायनी है।

7- सब को मारने वाले काल की भी रात्रि अर्थात विनाशिका होने से उनका नाम कालरात्रि है इस प्रकार माता का सातवा नाम कालरात्रि पड़ा ।

8- इन्होंने तपस्या द्वारा महान गौर वर्ण प्राप्त किया था अतः वे महागौरी कहलाइं। माता का आठवाँ स्वरूप महागौरी है।

9- सिद्धि अर्थात मोक्ष को देने वाली होने से उनका नाम सिद्धिदात्री है।  माता का नवम रूप   सिद्धिदात्री कहलाता है।

इस प्रकार माता के नवों रूपों का ध्यान करते हुए प्रतिदिन की पूजा करनी चाहिए।

15 अक्टूबर को बैठकी  अर्थात घट स्थापना  कि जाकर  नवरात्रि व्रत प्रारंभ किए जाते हैं । जोकि मां भगवती के पूजन एवं आराधना का विशेष काल माना जाता है

नवरात्रि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण!

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह संधि काल में पड़ने वाला व्रत है।

दो ऋतुओं के बीच में पड़ने वाले संधि काल में विशेष रूप से रोगाणुओं के संक्रमण की तीव्र संभावना  मानी जाती है।

अतः इससे विशेष आहार विहार के साथ व्यतीत करने के लिए नवरात्रि के रूप में देवी भगवती की आराधना करते हुए मनाया जाता है।

जिससे तन और मन की शुद्धि के साथ रोगाणुओं के संक्रमण से लड़ा जा सके।

इसे नवरात्रि ही क्यों कहते हैं ?

प्रश्न उठता है की इसे हम नवरात्रि ही क्यों कहते हैं 9 दिन क्यों नहीं कहते ?

तो इसका उत्तर है की  रात्रि में सारी प्रकृति शांत हो जाती है, और वातावरण में ध्वनि तरंगे बहुत दूर तक के जाती हैं।

जबकि दिन के शोर में प्रकृति बहिर्मुखी होती है और शोर की अधिकता के कारण ध्वनि तरंगे ज्यादा दूर तक नहीं जा पाती।

इसीलिए नवरात्रि में पूरे मनोबल के साथ दृढ़ संकल्प से जब हम अपने मन व मानसिक तरंगों में ईश्वर को याद करते हैं ।

तो यह तरंगे वातावरण में बहुत दूर तक जाती हुई हमारा संदेश बड़े क्षेत्रफल तक पहुंचाती हैं। तथा वातावरण को शुद्ध व पवित्र बनाती है। जिनसे हमारी साधना में सिद्धि व सफलता प्राप्त होती है। 

इसीलिए योगी व  मुनि माता की प्रसन्नता के लिए रात्रि में माँ भगवती की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करते थे।इसीलिए इसे नवरात्रि कहा जाता है।

अब मां भगवती की पूजा विधि की बात करें तो नवरात्रि 9 दिनों में मां जगदंबा के नौ स्वरूपों का पूजन अर्चन और ध्यान किया जाता है।

पूजन सामग्री

पूजनविधि

पूजन सामग्री एकत्र करके रख लें और लेख के अंत मे नीचे दिए लिंक पर किसी भी पूजा की तैयारी कैसे करें यह संदर्भ में सारी बातें बताई गई हैं, उसके अनुसार पूजा की तैयारी कर लें।

तत्पश्चात नवरात्रि के पहले दिन  स्नान करके पवित्र हो, आसन शुद्धि, की क्रिया संपन्न करके,  शुद्ध आसन पर बैठे ।

साथ में शुद्ध जल, पूजन सामग्री और दुर्गा सप्तशती की पुस्तक रखें ।

पुस्तक को अपने सामने लकड़ी के आसन पर विराजमान कर दें।

अपने मस्तक पर अपनी रूचि के अनुसार चंदन, रोली, अभय लगाएं, शिखा बांध लें और फिर  पूर्व दिशा की ओर मुख कर तत्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें।

माता भगवती का स्मरण करके विधि पूर्वक श्रद्धा भाव से पूजा करके भगवती की आराधना करके पाठ का आरंभ करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती पढ़ने के नियम

दुर्गा सप्तशती पढ़ने के कुछ नियम शास्त्रों में बताए गए है। जिनके अनुसार दुर्गा सप्तशती का प्रतिदिन संपूर्ण पाठ किया जाना चाहिए।

किंतु यदि 1 दिन में पूरे पाठ करने का अवसर ना मिले तो वह 1 दिन केवल मध्यम चरित्र का और दूसरे दिन शेष दो चरित्रों का पाठ करना चाहिए।

दुर्गा सप्तशती में 3 चरित्रों के रूप में दुर्गा सप्तशती को विभक्त किया गया है , जिन्हें क्रमशः कवच ,अर्गला और कीलक के रूप में माना गया है।

अर्थात कवच रूप बीज का, फिर अर्गला रूप शक्ति का और अंत में कीलक। 

दुर्गा सप्तशती में इसी प्रकार  पाठ का अनुसरण किया गया है।

दुर्गापूजा का फल

 दुर्गा सप्तशती में कुल 700 मंत्र हैं।  सप्तशती अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ  को प्रदान करने वाली है ।

जो पुरुष जिस भाव और जिस कामना से श्रद्धा एवं विधि के साथ सप्तशती का परायण करता है ,उसे उसी भावना और कामना के अनुसार निश्चय ही फल सिद्धि होती है।

इसके साथ ही यदि सप्तशती का पाठ ना कर पाए तो कुंजिका स्त्रोत तथा देवी सूक्त सहित  पाठ करने से परम सिद्धि प्राप्त होती है और सभी प्रकार के बाधा विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

अतः माँ भगवती का यह पावन पर्व नवरात्रि हम सभी को माता का सानिध्य व कृपा प्रदान करें।

अत्यन्त शुभ मंगलकारी पावन नवरात्रियों की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं!

✍️श्रीमती रेखा दीक्षित, सहस्रधारा रोड़ देवदर्रा, मण्डला ( मध्यप्रदेश )

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14 thoughts on “शारदीय नवरात्रि- 2023 दुर्गा सप्तशती पढ़ने के नियम व दुर्गा पाठ का फल ; Shradhey Navratri 2023

  1. माता के 9 रूपों का वर्णन बहुत अच्छा लगा!! जय माता दी!!????

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