बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना- शिक्षाप्रद आदिवासी लोककथा Total Post View :- 690

बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना- शिक्षाप्रद आदिवासी लोककथा

बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना- शिक्षाप्रद आदिवासी लोककथा – जो जीवन के मूलभूत नियमों को सिखाती हैं। यह कथा श्री वेरियर ऐल्विन द्वारा संकलित है।

बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना – आदिवासी लोककथा

एक बालक अपनी विधवा माँ के साथ रहता था। एक दिन वह बाजार गई और वह बालक घर पर अकेला ही रह गया। उसी बीच एक बैरागी भीख मांगता हुआ वहीं आ पहुंचा।

उस बालक ने बैरागी से आग्रह किया कि वह उसे कुछ ज्ञान की बातें सिखाए, तो उसके एवज में वह उसे एक मटकी भरकर रूपये देगा। तब बैरागी ने कहा, अच्छा तो मैं तुम्हें यह मन्त्र बताता हूँ।

बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना। बिना संगी-साथियों के कभी भी सड़क पर नहीं जाना, जो इन नियमों का पालन करेगा, धान के खेत में जाकर अपनी खेती करेगा, उसे राजा की बेटी पर विजय प्राप्त होगी।

इतना कहकर वैरागी ने रूपयों की मटकी उठाई और चलता बना। उसी दरम्यान एक दूसरा बैरागी वहाँ आ पहुंचा, उसे भी बालक ने कहा कि वह उसे ज्ञान की शिक्षा दे, तो वह उसे एक मटकी भर रूपये प्रदान करेगा।

तब उस बैरागी ने कहा, “ठीक है मैं तुम्हें एक मन्त्र बताता हूँ, बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना और बिना संगी-साथियों के सड़क पर मत चलना।

इस शिक्षा को ग्रहण करके जो व्यक्ति अपने धान की खेती में काम करेगा उसे राजा की कन्या पर विजय प्राप्त होगी।”

इतनी शिक्षा देकर दूसरा बैरागी भी रूपये से भरी मटकी लेकर वहाँ से चला गया।

इसके उपरान्त तीसरा बैरागी आया और वह भी यही शिक्षा बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना देकर रूपयों से भरी मटकी लेकर अपनी राह चलता बना।

संध्या समय जब बालक की माँ

बाजार से थोड़े से चने लेकर वापस आई तो लड़के ने उसे बतलाया कि उसने तीन मटकी रूपये वैरागियों को देकर ज्ञान प्राप्त किया है।

माँ ने पूछा बेटे वह ज्ञान मुझे भी बताओ, तब उस बालक ने बैरागियों द्वारा बताए गए गुरुमन्त्र बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना उसे बताए।

परन्तु जब उसकी माँ ने यह सुना तो कहा कि अरे दुष्ट तुमने इसके लिए ही घर का सारा धन लुटा दिया। और क्रोधित होकर उसकी जमकर पिटाई की ।

उस लड़के ने अपने आप से कहा कि यदि मेरी माँ मुझे ज्ञान के लिए पीटती है, तो में भी यहां नहीं रहूगा और वह घर से भाग गया।

जैसे ही वह सड़क पर पहुंचा तो उसे गुरूमन्त्र याद आया कि बिना संगी-साथी के सड़क पर नहीं चलना और बिना कौड़ियों के बाजार नहीं जाना।

तब उसने चारों ओर देख किसी साथी को बूंढना चाहा। परन्तु उसे वहाँ कोई भी नहीं मिला।

कुछ समय पश्चात उसे एक केकड़ा दिखाई पड़ा और उसने उसे ही अपना मित्र बना लिया । और एक कपड़े के टुकड़े में बांधकर साथ चलने लगा। चलते चलते वह नगर में पहुंच गया।

इस नगर में एक कौवा और एक सर्प

महाप्रसाद मित्र बन गए थे। वे दोनों आम के एक वृक्ष पर साथ-साथ रहने लगे। कौवा ऊपर वृक्ष की शाखाओं में रहता और सर्प उस वृक्ष के नीचे एक बिल में ।

जैसे ही कोई वृक्ष के समीप आता दिखाई पड़ता, कौआ कांव-काव चिल्लाने लगता और सर्प कौए की आवाज सुनकर बिल से निकलकर उसे काट कर मार डालता था।

इस प्रकार सर्प ने उस नगर बहुत से लोगों को मार डाला था।

वह लड़का उस वृक्ष के समीप पहुंचकर छाया में लेटकर विश्राम करना चाहता था कि तभी उस सर्प ने कांव-काव की आवाज सुनकर बिल से बाहर निकल उस लड़के को काटा और उसे मार डाला।

इसके उपरान्त कौवा पेड़ से उड़कर लड़के को खाने हेतु उसके सिर पर जाकर बैठ गया। केकड़ा कपड़े से बाहर निकल आया और उसने अपने पंजों से कौवे के पैर को पकड़ लिया।

कौवा चिल्लाया बाहर निकलो, बाहर निकलो और उस लड़के के प्राण लौटा दो, अन्यथा मैं मारा जाऊँगा। सर्प ने बिल से निकलकर लड़के के शरीर से विष चूस लिया और उसे पुनः जीवित कर दिया।

जैसे ही सर्प बिल में घुसने लगा, केकड़े ने अपने पंजे से उसे पकड़ लिया।

जैसे ही लड़के को होश आया तो उसने देखा कि उसका मित्र दोनों दुश्मनों को पकड़े हुए हैं। केकड़े ने कहा मुझे क्या देख रहे हो. तुरन्त इन दोनों दुश्मनों को मार डालो।

लड़के ने तुरन्त दोनों को मार डाला.

सर्प का सिर और पूंछ काटकर तथा कौवे का सिर, एक पैर और एक पंख काटकर वह उन्हें एक कपड़े में बाँधकर तथा केकड़े को साथ लेकर नगर की ओर चल पड़ा।

वहां उसे एक व्यापारी के धान के खेत पर काम करने हेतु मजदूरी मिल गई।

कुछ दिनों के बाद राजा ने फरमान जारी किया कि जो भी कोईउस सर्प को मारेगा, उसके साथ वह अपनी कन्या का विवाह कर देगा।

नगर के सभी जन सर्प की टोह में निकल पड़े। एक भंगी जिसकी नाक में गर्मी नामक यौन रोग से विगलित हो गई थी । उसे आम के पेड़ के नीचे मृत सर्प का शरीर पड़ा हुआ मिला ।

उसने उस मृत सर्प पर अपनी लाठी से तीन-चार प्रहार किये और राजा के सम्मुख अन्य भंगियों पर चिल्लाने लगा “मुझे मत छुओ, मैं राजा का दामाद हूं।”

राजा ने जब अपने भावी दामाद की सूरत देखी तो वह घबरा गया “हमें सर्वप्रथम इस बात की पुष्टि कर लेनी चाहिए ! क्या यह बात सत्य है”।

परन्तु उस व्यक्ति ने मरे हुए सर्प को दिखाकर

कहा कि उसे समाप्त करने हेतु उसका सिर व पूंछ नष्ट करनी पड़ी। राजा ने दुःखी मन से विवाह हेतु मंडप तैयार करने का आदेश दिया।

जब उस लड़के ने यह सब सुना तो वह धान के खेत से सही स्थिति का पता लगाने चल पड़ा। लड़के ने राजा के समक्ष जाकर हाथ जोड़कर पूछा कि

“ओ महाराजा सर्प का सिर और पूछ कहां है”

तब राजा ने अपने घुड़सवारों को उन्हें ढूंढने हेतु उस स्थान पर भेजा, जहां भंगी ने सर्प को मारने की बात कही थी। परन्तु वहां उन्हें कुछ भी नहीं मिला।

तब उस लड़के ने अपने कपड़े से खोलकर सर्प का सिर, पूछ एवं कौवे का सिर, एक पाव और एक पंख निकाले और उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत करवाया।

राजा ने भगी को मृत्युदण्ड देकर उसे दफना दिया और राजकुमारी का विवाह उस लड़के के साथ करवा दिया और उसे अनेक कीमती उपहार भेंट किए।

विवाह के उपरांत वे दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे। एक दिन जब वह लड़का व्यापारी के खेत पर काम करने हेतु गया तो उसने उससे कहा कि वह आज उसे वहीं काम करने दे और कहीं अन्यत्र न भेजे।

कुछ समय तक काम करने के बाद

वह लड़का खड़ा होकर शहर की और ताकने लगा। व्यापारी उस पर कोधित होकर चिल्लाने लगा भाई लोटिया पोरला एक तो काम पर देर से आया और अब काम छोड़कर खड़ा खड़ा क्या ताक रहा है?

तुम जैसे व्यक्ति को मैं कैसे मजदूरी दे सकता हूँ। तब उस लड़के ने कहा कि राजा की बेटी उसके लिए पेज लेकर आ रही होगी, वह उसे ही ताक रहा है। भाई लोटिया पोर्ला क्या राजा की बेटी तुम्हारे जैसे व्यक्ति के लिए पेज लाएगी?

हाँ अवश्य लेकर आएगी उसने कहा। इस पर व्यापारी ने कहा कि यदि वह तुम्हारे लिए पेज लाएगी तो मैं अपना सर्वस्व तुम्हें दे दूंगा।

और यदि नही लेकर आई तो मैं तुम्हारी हत्या करके इसी खेत में गाड़ दूंगा। इस बात पर दोनों ने एक इकरारनामा लिख दिया।

कुछ समय के पश्चात एक हाथी पर सवार होकर राजा की बेटी सिर पर पेज की मटकी रखे हुए वहां पहुंची, जिसके आगे पीछे बैंड बाजे बज रहे थे।

उसे देखकर व्यापारी ने पराजय में अपनी गर्दन झुका ली।

लड़के ने पेज ग्रहण करने के उपरान्त अपनी लंगोटी उतार कर उस व्यापारी को पहना दी और उसके सुन्दर वस्त्र स्वयं धारण कर लिए तथा उसे वहां से भगा दिया।

जब व्यापारी के घर में आनन्दपूर्वक रहते उनका कुछ समय ही बीता था कि उस व्यापारी ने उसकी हत्या करने हेतु कुछ लोगों को वहां भेजा।

लड़के ने सर्प की पूंछ और सिर संभाल कर रखे थे, और उन दोनों को उसने मिलाकर जोड़ दिया और सर्प जीवित हो गया।

उस सर्प ने हत्या करने के उद्देश्य से आए हुए उन व्यक्तियों को डस लिया और उनको मार डाला।

इसके पश्चात उस सर्प ने लड़के से भी कहा कि मैं तुम्हे भी मार डालूगा । तब उस लड़के ने कहा कि यदि तुम मुझे क्षमा कर दोगे तो मैं तुम्हे देवता मानकर तुम्हारी पूजा करूंगा।

तबसे वह लड़का नाग गोत्र का हो गया जो सर्प से उत्पन्न हुआ था।

अन्त में उस लड़के ने अपनी माँ को भी अपने पास बुलवा लिया और वे सब साथ-साथ व्यापारी के घर में रहने लगे।

(यह कथा श्री वेरियर ऐल्विन द्वारा संकलित है तथा उनकी पुस्तक फोक टेल्स ऑफ महाकौशल पृ.452/6 से हिन्दी में अनूदित की गई है)

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