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बच्चों की कहानियां हिंदी में ” आ री बिल बांदरी “!

बच्चों की कहानियां हिंदी में “आ री बिल बांदरी ” ! श्रीमती मनोरमा दीक्षित (पूर्व प्राचार्या) ! बाल मनोविज्ञान के जानकार सहज समझ सकते हैं कि कहानियों का बच्चों के मन पर जो चित्र बनता है वह दीर्घकालिक होता है।

बचपन में पढ़ी गई कहानियाँ बच्चे के चरित्र निर्माण में सहायक होती हैं । उसके ज्ञान कोष को समृद्ध करती हैं। बच्चों की हिंदी कहानियां हिंदी में पढ़ते हैं कहानी ” आ री बिल बांदरी “!

बच्चों की हिंदी कहानियां !

“आ री बिल बांदरी “

सेमरखापा गांव में एक अत्यंत बुद्धिमान नौजवान अपनी दादी के साथ रहता था। परिवार में दादी और पोता ही थे।

दुर्भाग्य से उसके पिता की मृत्यु एक दुर्घटना में हो गयी थी, उस समय वह केवल दो वर्ष का था।

माँ उस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पायी और छ: महीने में उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिये।

उसके दादा को स्वर्ग सिधारे बीसों साल हो गये थे।

घर में लम्बी खेती-बाड़ी थी। पिताजी नौकरी में रहते हुए दुर्घटना के शिकार हो गये थे।

उनके बीमा और प्रॉबीडेण्ट फंड आदि का काफी पैसा मिला था। श्रवण को पिता की पेंशन भी मिलती थी।

दादी ने सारे पैसे बैंक में फिक्स कर दिये थे और उसके ब्याज से खर्च आसानी से चल जाता था।

दादी ने अपने प्यारे पोते को जबलपुर के “”इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाया था।

सब कुछ फिल्म के दृश्य की तरह बीतते जा रहा था।आज दादी श्यामा बहुत खुश थी।

उन्होंने घर में सत्यनारायण की कथा और भंडारा किया था।

क्योंकि श्रवण की नौकरी बैंगलौर की नामी कंपनी में लग गयी थी।

जाने के पहिले श्रवण ने दादी की खाने-पीने की सभी सामग्री लाकर रख दी थी।

श्रवण जाने की तैयारी…

करने लगा तो श्यामा ने दूधवाले से कहा कि अब केवल एक पाव दूध लेंगी, श्रवण तो बंगलौर जा रहा है।

परन्तु श्रवण ने एक किलो की बधोर लगाये रखने को कहा क्योंकि उन्हें दूध दही सभी खाना पीना जरूरी है।

श्रवण को दादी श्यामा ने बहुत प्यार से पाला था। वह माता पिता की कमी को भूल चुका था ।

ऐसी प्यार दुलार करने वाली दादी को पाकर। यहाँ श्रवण के घर के सामने एक बहुत पुराना नीम का पेड़ था ।

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जिसकी खोह में एक बंदरी रहती थी। खाने पीने के सामान को देखकर झपट लेना उसकी आदत थी।

वह बच्चों और वृद्धों को बहुत सताती थी। श्रवण के रहते हुए वह उसके घर में नहीं घुसती थी।

परन्तु उसके जाते ही वह रोज ही श्यामा के सूखते हुए सामान को लेकर भाग जाती थी।

श्यामा के आगन में फलों से लदी बिही को तो उसने पूरी खाकर और काट काटकर फंक दिया था।

एक दिन उसने श्यामा की साड़ी में बधे प्रसाद को लूटने के लिए साड़ी का पल्ला ही फाड़ दिया था।

आज छुट्टी में श्रवण आया था। वह दादी के खाने-पीने का इन्तजाम कर गया था। वह फोन में पूछता रहता था।

दादी हर दो दिन में खीर बनाकर खाना” वह कहता था, क्योंकि वह जानता था कि दादी को खीर बहुत पसंद है।

दादी की हालत देखकर श्रवण के आँसू छलक गये, क्योंकि दादी काफी कमजोर दिख रही थी।

पूछने पर उसने बताया कि इस नीम के खोखले बिल में रहने वाली बंदरिया ने बहुत सताया है,

उसका खाना पीना हराम कर दिया था। अब श्रवण उपाय सोचने लगा। उसने दादी से खीर बनाने को कहा

और ज्यों ही बंदरिया निकली उसने थोड़े से चने डाल दिये। चने खाने को वह उसके आगन में आ बैठी।

अब उसने चूल्हे में चढ़ी खीर को एक पत्तल में परोस दी। वहीं एक ईट को गरम करके रखवा दिया।

वह ईंट पार कर खीर खाने का विचार बना ही रही थी कि श्रवण ने बड़े प्यारे से गाना गाया

“आ री बिल बांदरी, खीर परसी पातरी

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फिर क्या था खीर की खुशबू से उसका मन मचलने लगा और वह कूदती हुई आगे बढी ,

ज्यों ही ईंटे पर पैर रखा कि उसका पूरा पंजा जल गया। वह तड़प गयी,

फिर भी खीर खाने के लालच से वह आगे बढ़ी और पत्तल में हाथ डाल दिया,

पूरी गरम खीर उसके हाथ में बुरी तरह चिपक गयी। वह हाथ झटकने लगी। फिर उसे चाटा तो जीभ भी जल गयी।

बिना खीर खाये ही वह लँगड़ाते हुए भागी। दूसरे दिन फिर खीर परोसी गयी और श्रवण ने गाया “आ री बिल बांदरी”

परन्तु बदरिया चुपचाप बैठी रही और न तो विही के पेड़ पर चढ़ी और न ही खूशबू उड़ती खीर की ओर देखा।

उसने दादी के पैर में एक बार खखल दिया था अतः उसे इंजेक्शन भी लगवाने पड़े थे।

अब श्रवण की दादी निर्भय होकर रहती थी, क्योंकि श्रवण ने समस्या हल कर दी थी।

अब वह न तो आइना लेकर और न ही दादी का मोबाइल लेकर भागती थी।

बच्चो, हमें सभी प्राणियों पर दया करनी चाहिए किन्तु वे ही हमारे ऊपर आक्रमण करने लगे

तो उसका उपाय भी उस प्राणी को ज्यादा कष्ट पहुँचाये बिना, खोज ही लेना चाहिए।

अन्य जानकारियों के लिए देखते रहें आपकी अपनी वेबसाइट

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