दादी कहे कहानी लघुकथा ; श्रीमती मनोरमा दीक्षित ( पूर्व प्राचार्या ) मंडला! Total Post View :- 388

दादी कहे कहानी लघुकथा ; श्रीमती मनोरमा दीक्षित ( पूर्व प्राचार्या) मण्डला!

नमस्कार दोस्तों ! दादी कहे कहानी एक लघुकथा है । जो श्रीमती मनोरमा द्वारा लिखे गए कहानी संग्रह कथा लोक से ली गई है । बच्चों को छोटी-छोटी कहानियां सुना कर उनका शिक्षाप्रद मनोरंजन करना।

बातों ही बातों में अच्छी सीख दे जाना । यही कहानी की एक बहुत बड़ी कला है। यह कहानी अवश्य ही बच्चों के लिए प्रेरणादाई होंगी, अवश्य पढ़ें और बच्चों को सुनाकर उनका संस्कारित मार्गदर्शन करें ।

दादी कहे कहानी लघुकथा श्रीमती मनोरमा दीक्षित पूर्व प्राचार्या मण्डला

दादी कहे कहानी लघुकथा

(श्रीमती मनोरमा दीक्षित, पूर्व प्राचार्य मंडला)

आज मेरी पोती नैना सोने का नाम ही नहीं ले रही थी। बस एक ही हठ “जब रोज कथा सुनाते हो दादी तो आज क्यों नहीं ?”

मैंने कहा- “बच्चा कैसी रिमझिम बरसात हो रही है और हाँ आज हमने गरमागरम डोसे खाये हैं, तो आँखें मुंद रही हैं

जब वह किसी तरह नहीं मानी तो मैंने बालहठ के सामने हथियार डाल दिये।

जब अकबर से सम्राट भी बालहठ पूरी नहीं कर सके तो मैं किस खेत की मूली हूँ।

अच्छा चलो आज मैं तुम्हें कई छोटी-छोटी कथा सुनाऊंगी, पर हाँ तुम बीच ही में सो नहीं जाना,

क्यों मंजूर है मेरी शर्त। नैना ने जोर से “हाँ” कह सहमति जताई।

उसकी आवाज सुन कथा सुनने अमूल्या, अनुष्का और अनुज भी आ गये ।

एक बार एक बहेलिया..

एक बार एक बहेलिया किसी पहुंचे हुए संत से दीक्षा लेने पहुंचा।

संत का नियम था कि गुरुदीक्षा में अहिंसा व्रत निभाने की प्रतिज्ञा कराते थे।

बहेलिया का गुजारा पक्षी के पकड़ने से ही चलता था। वह इसके लिए तैयार न हुआ।

निराश लौटते देख संत ने उसे सरल उपाय सुझाया। उसने कहा- अभी तुम कम से कम एक पक्षी पर दया का व्रत लो

उसने “कौआ” न मारने का व्रत लिया और अहिंसा धर्म में प्रवेश लिया। वह अहिंसा तत्व पर विचार करता रहा।

धीरे-धीरे उसकी अवधि बढ़ाता रहा। अब वह पूर्ण अहिंसाधारी संत वन दूसरा व्यवसाय करने लगा।

क्यों, अच्छी लगी यह कहानी, “हाँ” सबने सहमति जतायी।

(दादी कहे कहानी लघुकथा)

दिल्ली के का बादशाह का….

… अंगरक्षक उसका वफादार नौकर था।

उस दिन बादशाह ने ज्यादा चढ़ा ली थी और वह सद्गृहस्थों के घर में घुसकर अशिष्टता करने लगा।

इस पर अंगरक्षक ने न केवल उन्हें रोका, वरन् हाथ पकड़कर महल तक घसीट लाया और कमरे में बन्द कर दिया।

दूसरे दिन दरबार में नौकर की पेशी हुई। सभी अनुमान लगा रहे थे कि उसे कोई कड़ा दंड दिया जावेगा।

परन्तु ऐसा नहीं हुआ। राजा ने नौकर की बड़ी प्रशंसा की।

शुभचिंतक का यह कर्त्तव्य भी है कि मालिक को बुरी राह में चलने से रोके और उसे बादशाह ने मंत्री बना दिया।

देखो, कोई सोना नहीं, आज जितनी लघुकथा में सुनाऊंगी तुम्हें सुननी होगी।

विधाता के पास एक …

(दादी कहे कहानी लघुकथा)

सिद्ध पुरुष पहुॅचे देखा कि वे लोगों का भाग्य लिख रहे हैं। इसे वे सिद्ध पुरुष ध्यान से देखने लगे।

विधाता ने देखने से रोका और कहा- “यह लिखा तो जा रहा है पर उसे किसी को जानने जनाने पर रोक है।

प्रश्न किया गया कि- “ऐसा क्यों?” ब्रह्मा जी ने कहा- “बताने से बस अनर्थ ही अनर्थ है।

किसी को अच्छा भाग्य बता दिया जावेगा तो उसका पुरुषार्थ घट जावेगा और

दुर्भाग्य जानने से हताशा बढ़ जावेगी।” चलो और सुनो

(दादी कहे कहानी लघुकथा)

दिल्ली के बादशाह….

बहादुरशाह के पुत्रों को अंग्रेजों ने सरेआम फाँसी दी और उनका सिर काटकर थाल में रख बादशाह के सामने पेश किया।

बादशाह न तो अधीर हुए और न शोकाकुल ।

उन्होंने लापरवाही से कहा- ‘वीर पुरुष ऐसे ही दिन के लिए बच्चे पालते हैं।”

शोक और आघात के अवसर पर मनुष्य के धैर्य की परीक्षा होती है। बहादुरशाह का धैर्य वीर पुरूष के योग्य ही था।

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध…

संगीतज्ञ श्री श्याम शास्त्री मध्यरात्रि से ही कामाक्षा देवी के मंदिर में बैठकर रियाज करते थे।

एक दरबारी संगीतज्ञ के पुत्र को उनका संगीत बड़ा प्रिय था।

एक दिन वह श्याम शास्त्री से बोला- “आपके कंठ में तो जादू हैं, यदि आप चाहो तो मैं आपको राजदरबार का गायक बना सकता हूँ।”

शास्त्री जी मुस्कुराकर बोले “तब आपको इस कंठ में वह जादू नहीं मिलेगा।

कला जब पद, यश, अथवा धन में बिक जाती है, तब उसका जादू समाप्त हो जाता है।

अहिंसा, वफादारी, भाग्यवाद एवं धन, पद, यश में बिकी कला व्यर्थ है ।

इन संदेशों को बच्चों ने दादी से इन सत्य घटनाओं द्वारा सीखा था ।

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